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इस चंद्र ग्रहण (सोमवार-07 अगस्त 2017 ) का रक्षाबंधन पर क्या होगा प्रभाव आपकी राशि पर..??

जानिए रक्षाबंधन क्या ,क्यों और कैसे मनाये 2017  में  ???
इस चंद्र ग्रहण (सोमवार-07  अगस्त 2017 ) का रक्षाबंधन पर क्या होगा प्रभाव आपकी राशि पर..??
प्रिय पाठकों/मित्रों, हमारे देश भारत में सनातन धर्म के पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि के दिन रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है। यह त्यौहार भाई-बहन का एक-दूसरे के प्रति स्नेह, प्यार और अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है।यह तो सभी जानते हैं कि भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन का त्यौहार हर वर्ष हर्ष और उल्लासा के साथ श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। श्रावण मास को भगवान शिव की पूजा का माह मानते हुए धार्मिक रुप से बहुत महत्व दिया जाता है। चूंकि रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है इसलिये इसका महत्व बहुत अधिक हो जाता है।
अपराह्न का समय रक्षा बन्धन के लिये अधिक उपयुक्त माना जाता है जो कि हिन्दु समय गणना के अनुसार दोपहर के बाद का समय है। यदि अपराह्न का समय भद्रा आदि की वजह से उपयुक्त नहीं है तो प्रदोष काल का समय भी रक्षा बन्धन के संस्कार के लिये उपयुक्त माना जाता है।
भद्रा का समय रक्षा बन्धन के लिये निषिद्ध माना जाता है। हिन्दु मान्यताओं के अनुसार सभी शुभ कार्यों के लिए भद्रा का त्याग किया जाना चाहिये। सभी हिन्दु ग्रन्थ और पुराण, विशेषतः व्रतराज, भद्रा समाप्त होने के पश्चात रक्षा बन्धन विधि करने की सलाह देते हैं।
भद्रा पूर्णिमा तिथि के पूर्व-अर्ध भाग में व्याप्त रहती है। अतः भद्रा समाप्त होने के बाद ही रक्षा बन्धन किया जाना चाहिये। उत्तर भारत में ज्यादातर परिवारों में सुबह के समय रक्षा बन्धन किया जाता है जो कि भद्रा व्याप्त होने के कारण अशुभ समय भी हो सकता है। इसीलिये जब प्रातःकाल भद्रा व्याप्त हो तब भद्रा समाप्त होने तक रक्षा बन्धन नहीं किया जाना चाहिये।
कुछ लोगो का ऐसा मानना है कि प्रातःकाल में, भद्रा मुख को त्याग कर, भद्रा पूँछ के दौरान रक्षा बन्धन किया जा सकता है। द्रिक पञ्चाङ्ग की टीम को किसी भी हिन्दु ग्रन्थ और पुराण में इसका सन्दर्भ नहीं मिला और हम भद्रा के दौरान किसी भी रक्षा बन्धन मुहूर्त का समर्थन नहीं करते हैं।
इस बार रक्षाबंधन बहनों और भाईयों के लिए परीक्षा लेकर आएगा। क्योंकि मिलेंगे सिर्फ 2 घंटा 52 मिनट। ऐसा संयोग क्यों बना, जानिए…
रक्षाबंधन के पर्व पर इस बार भद्रा तथा चन्द्र ग्रहण का साया रहेगा। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा पर 7 अगस्त 2017 (सोमवार) को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा।भद्रा की समाप्ति और चंद्र ग्रहण का सूतक लगने के बीच के समय में रक्षाबंधन, श्रावणी उपाकर्म और श्रवण पूजन करना शुभ रहेगा।
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जानिए उज्जैन(मध्यप्रदेश) में इस चंद्रग्रहण/रक्षाबंधन पर रक्षा सूत्र/रक्षा बंधन का शुभ मुहूर्त–
रक्षा बन्धन अनुष्ठान का समय = ०५:५९ से १४:१०
अवधि = ८ घण्टे ११ मिनट्स
रक्षा बन्धन के दिन भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ = ६/अगस्त/२०१७ को १२:५८ बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त = ७/अगस्त/२०१७ को १४:१० बजे
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इस वर्ष 2017 में रक्षाबंधन (सोमवार-07  अगस्त 2017  ) के पर्व पर इस बार भद्रा तथा चन्द्र ग्रहण का साया रहेगा। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा पर 7 अगस्त को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा। लेकिन इस दिन ग्रहण होने की वजह से बहनों को राखी बांधने के लिए केवल 2 घंटे 47 मिनट का ही समय मिलेगा।खंडग्रास चन्द्रग्रहण पूरे देश में लगभग 2 घंटे तक दिखाई देगा। इसलिए इस बार राखी के दिन सूतक भी लगेगा।
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खंडग्रास चंद्र ग्रहण का समय– पंडित दयानन्द शास्त्री  ने बताया कि रक्षाबंधन पर सोमवार को उज्जैन में खण्डग्रास चन्द्र ग्रहण समय–
चन्द्र ग्रहण प्रारम्भ – २२:५२:५४
चन्द्र ग्रहण समाप्त – ००:४८:०९ – ८th, अगस्त को
स्थानीय ग्रहण की अवधि – ०१ घण्टा ५५ मिनट्स १५ सेकण्ड्स
उपच्छाया से पहला स्पर्श – २१:२०:०१
प्रच्छाया से पहला स्पर्श – २२:५२:५४
परमग्रास चन्द्र ग्रहण – २३:५०:२७
प्रच्छाया से अन्तिम स्पर्श – ००:४८:०९ – ८th, अगस्त को
उपच्छाया से अन्तिम स्पर्श – ०२:२०:५५ – ८th, अगस्त को
खण्डग्रास की अवधि – ०१ घण्टा ५५ मिनट्स १४ सेकण्ड्स
उपच्छाया की अवधि – ०५ घण्टे ०० मिनट्स ५४ सेकण्ड्स
चन्द्र ग्रहण का परिमाण – ०.२५
उपच्छाया चन्द्र ग्रहण का परिमाण – १.२९
सूतक प्रारम्भ – १२:३२:३०
सूतक समाप्त – ००:४८:०९ – ८th, अगस्त को
बच्चों, बृद्धों और अस्वस्थ लोगों के लिये सूतक प्रारम्भ – १९:०८:५६
बच्चों, बृद्धों और अस्वस्थ लोगों के लिये सूतक समाप्त – ००:४८:०९ – ८th, अगस्त को
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भद्रा 7 अगस्त को दोपहर 11.29 बजे तक रहेगी। इसलिए रक्षाबंधन, श्रावणी उपाकर्म और श्रवण पूजन प्रातः 11.30 से दोपहर 1.39 के मध्य संपन्न करें।
पंडित दयानन्द शास्त्री  ने बताया कि  इस वर्ष रक्षाबंधन पर चंद्रग्रहण का योग 9 वर्षों बाद बन रहा है। इससे पहले आखिरी बार 16 अगस्त 2008 में भी रक्षाबंधन पर खंडग्रास चंद्रग्रहण हुआ था।
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राखी के लिए शुभ मुहुर्त चंद्रग्रहण रात 10.53 बजे से शुरू होगा।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री का कहना है कि चंद्रग्रहण से 9 घंटे पहले यानी दोपहर 1.53 बजे से सूतक लग जाएगा।
सुबह 11.04 बजे तक भद्रा काल का असर रहेगा।  चूंकि सूतक और भद्रा दोनों में ही शुभ कार्य वर्जित हैं, इसलिए इन दोनों के बीच का समय राखी बांधने के लिए शुभ है।
ऐसे समझें ग्रहण का स्पर्श–रात्रि 10.52 बजे
स्थानीय ग्रहण की अवधि – ०१ घण्टा ५५ मिनट्स १५ सेकण्ड्स
उपच्छाया से पहला स्पर्श – २१:२०:०१
प्रच्छाया से पहला स्पर्श – २२:५२:५४
परमग्रास चन्द्र ग्रहण – २३:५०:२७
प्रच्छाया से अन्तिम स्पर्श – ००:४८:०९ – ८th, अगस्त को
उपच्छाया से अन्तिम स्पर्श – ०२:२०:५५ – ८th, अगस्त को
खण्डग्रास की अवधि – ०१ घण्टा ५५ मिनट्स १४ सेकण्ड्स
उपच्छाया की अवधि – ०५ घण्टे ०० मिनट्स ५४ सेकण्ड्स
चन्द्र ग्रहण का परिमाण – ०.२५
उपच्छाया चन्द्र ग्रहण का परिमाण – १.२९
सुबह 11.05 बजे से लेकर 1.52 मिनट तक आप रक्षा बंधन का त्योहार मना सकते हैं। आखिर भद्रा में क्यों नहीं बांधी जाती राखी? ऐसा कहा जाता है कि सूपनखा मे अपने भाई रावण को भद्रा में राखी बांधी थी, जिसके कारण रावण का विनाश हो गया, यानी कि रावण का अहित हुआ। इस कारण लोग मना करते हैं भद्रा में राखी बांधने को।
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जानिए आपकी राशियों पर इस चंद्र ग्रहण का क्या होगा प्रभाव—
मकर राशि, श्रवण नक्षत्र में होगा चंद्रग्रहण 7 और 8 अगस्त की मध्यरात्रि में हो रहा यह चंद्रग्रहण भारत समेत एशिया के अधिकांश देशों, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय देशों, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में दिखाई देगा।
यह चंद्रग्रहण मकर राशि और श्रवण नक्षत्र में होगा। इसलिए अलग-अलग राशियों पर ग्रहण का अलग-अलग प्रभाव पड़ेगा।
इस ग्रहण के प्रभाव से मेष, सिंह, कन्या, वृश्चिक और मीन ये पांच राशियों की किस्मत चमकने वाली है। इन राशियों वाले लोग यदि बेरोजगार हैं तो इन्हें उच्च पद वाली नौकरी मिलेगी। अविवाहित हैं तो विवाह पक्का हो जाएगा, संतान नहीं है तो संतान की प्राप्ति होगी और यदि धन की कमी से जूझ रहे हैं तो धन की प्राप्ति होगी।
वृषभ, कर्क और धनु राशि वालों के लिए ग्रहण मिश्रित फलदायी रहेगा। यानी उनके कुछ काम अच्छे होंगे तो कुछ में बाधाएं भी आएंगी।
यह चंद्र ग्रहण चूंकि ग्रहण मकर राशि पर है इसलिए मकर के साथ मिथुन, तुला और कुंभ राशियां बुरे प्रभाव से गुजरेंगी। इन राशि वालों को मानसिक कष्ट का सामना करना पड़ेगा। स्वास्थ्य खराब होगा, धन की हानि होने के संकेत हैं।
इन राशि वाले भगवान शिव की विशेष आराधना पूजा करें। ग्रहण काल में ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करना सभी राशि वालों के लिए शुभ रहेगा।
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जानिए इस चंद्र ग्रहण(सोमवार–07  अगस्त 2017 ) का प्रभाव–
ग्रहण के समय मकर राशि स्थित चंद्रमा पर सूर्य व नीच राशि में स्थित मंगल और शनि की कुदृष्टि रहेगी जो कि अराजकता, लूटपाट, अपहरण व फसलों के लिए नुकसानदेह होगी। साथ ही अनाज, चावल, तेल आदि में तेजी रहेगी। यवन राष्ट्रों में प्राकृतिक प्रकोप, असामाजिक तत्वों का बोलबाला रहेगा। इसके साथ ही पर्वतीय भाग जैसे कि कश्मीर, भूटान, अरूणाचल प्रदेश में भी प्राकृतिक आपदाएं आ सकती हैं। राजनीतिज्ञों में आपसी मनमुटाव देखने को मिलेगा।
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भविष्यपुराण में आया है कि रक्षाबंधन के दिन राजा को पूजापाठ, मन्त्रों द्वारा अपने दाहिने हाथ में रक्षासूत्र बंधवाया करते थे। भविष्यपुराण और पौराणिक कथाओं के साथ यह त्यौहार भाई-बहन के त्यौहार का प्रतीक बन गया है। रक्षाबंधन के दिन बहन अपने भाई की दहिनी कलाई पर राखी बांधती है, भाई के मस्‍तक पर तिलक लगाती है, आरती उतारती है और अपने भाई की लम्‍बी आयु की प्रर्थाना करती है। उसका भाई सुखी-सम्‍पन रहे इसकी ईश्वर से कामना करती है।
भाई का अपनी बहन से रक्षा का वादा
भाई भी रक्षाबंधन दिन के दिन अपनी बहन से वादा करता है कि वह उसकी हर प्रकार से सहायता करेगा और उसकी रक्षा करेगा। रक्षा बंधन भाई-बहन के प्यार का त्योहार है, एक मामूली सा धागा जब भाई की कलाई पर बंधता है, तो भाई भी अपनी बहन की रक्षा के लिए अपनी जान न्योछावर करने को तैयार हो जाता है।
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कैसे होती है रक्षाबंधन की तैयारी
चूंकि इस दिन का बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने के लिये साल भर इंतजार करती हैं इसलिये इसकी तैयारी भी वे पूरे जोर-शोर से करती हैं। बहनों में इस दिन गजब का उल्लास देखने को मिलता है। अपने भाई के हाथ पर राखी बांधे बिना अन्न का निवाला तक ग्रहण नहीं करती। वे प्रात: साफ सफाई कर घर में सजावट करती हैं। स्नान-ध्यान कर अगरबत्ती व धूप जलाती हैं एवं स्वादिष्ट व्यंजंन बनाती हैं। फिर फल, फूल, मिठाई, रोली, चावल और राखी एक थाल में रखकर उसे सजाती हैं। इसके बाद शुभ मुहूर्त के समय अपने भाई की लंबी उम्र और मुसीबतों से भाई की रक्षा की कामना करते हुए दायें हाथ पर राखी बांधती हैं। बदले में भाई भी अपनी बहन को हर संभव सुरक्षा का वचन देता है। वर्तमान में तो भाई कीमती भेंट भी बहनों को देते हैं।
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उपाकर्म संस्कार और उत्सर्ज क्रिया—
श्रावण पूर्णिमा यानि रक्षाबंधन के दिन ही प्राचीन समय में ऋषि-मुनि अपने शिष्यों का उपाकर्म कराकर उन्हें विद्या-अध्ययन कराना प्रारंभ करते थे। उपाकर्म के दौरान पंचगव्य का पान करवाया जाता है तथा हवन किया जाता है। उपाकर्म संस्कार के बाद जब जातक घर लौटते हैं तो बहनें उनका स्वागत करती हैं और उनके दांएं हाथ पर राखी बांधती हैं। इसलिये भी इसका धार्मिक महत्व माना जाता है। इसके अलावा इस दिन सूर्य देव को जल चढाकर सूर्य की स्तुति एवं अरुंधती सहित सप्त ऋषियों की पूजा भी की जाती है इसमें दही-सत्तू की आहुतियां दी जाती हैं। इस पूरी क्रिया को उत्सर्ज कहा जाता है।
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जानिए क्या हैं रक्षाबंधन का इतिहास—
प्रिय पाठकों/मित्रों, रक्षाबंधन का इतिहास लगभग 6 हजार साल पुराना है। रक्षाबंधन का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है।
रक्षाबंधन के त्यौहार की उत्पत्ति धार्मिक कारणों से मानी जाती है जिसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में, कहानियों में मिलता है। इस कारण पौराणिक काल से इस त्यौहार को मनाने की यह परंपरा निरंतरता में चलती आ रही है। चूंकि देवराज इंद्र ने रक्षासूत्र के दम पर ही असुरों को पराजित किया, चूंकि रक्षासूत्र के कारण ही माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को राजा बलि के बंधन से मुक्त करवाया, महाभारत काल की भी कुछ कहानियों का उल्लेख रक्षाबंधन पर किया जाता है अत: इसका त्यौहार को हिंदू धर्म की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
आइये जानते हैं रक्षांधन के धार्मिक महत्व को बताने वाले अन्य पहलुओं के बारे में—
पहला उदाहरण– रक्षाबंधन की शुरुआत का सबसे का सबसे पहला साक्ष्य रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूँ हैं। मध्यकालीन युग के समय राजपूत और मुस्लिमों के बीच संग्राम चल रहा था। रानी कर्णावती चितौड़ के राजा की विधवा थीं। मध्यकालीन युग के समय गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपने राज्‍य के प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूँ को राखी भेजी थी। तब हुमायूँ ने रानी कर्णावती की रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था।
दूसरा उदाहरण- अलेक्जेंडर को और पुरू के बीच का माना जाता है। कहा जाता है कि हमेशा विजयी रहने वाला अलेक्जेंडर भारतीय राजा पुरू की शक्ति से काफी विचलित था। इस बात से अलेक्जेंडर की पत्नी बहुत ही चिंता में थी। अलेक्जेंडर की पत्नी ने रक्षाबंधन के भारतीय त्योहार के बारे में सुना रखा था। एक दिन अलेक्जेंडर की पत्नी ने भारतीय राजा पुरू को राखासुत्र भेजा और तब जाकर युद्ध की स्थिति समाप्त हुई थी। क्योंकि भारतीय राजा पुरू ने अलेक्जेंडर की पत्नी को बहन मान लिया था।
तीसरा उदाहरण- महाभारत के पौराणिक इतिहास के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और द्रोपदी को माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था। क्‍योंकि युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली में चोट लग गई थी और उसमें से खून बह रहा था। इसे देखकर द्रोपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर श्रीकृष्ण की अँगुली में बाँधा दिया था, जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। उसी समय से भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए और भरी सभा में उनका चीरहरण हो रहा था, तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई थी।
चौथा उदाहरण- एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने भगवान वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा माँगने पहुँचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश, पाताल और धरती नापकर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकनाचूर कर देने के कारण यह त्योहार बलेव नाम से भी प्रसिद्ध है। कहते हैं एक बार बाली रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर राजा बलि को रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार स्‍वरूप अपने पति भगवान विष्णु को मांग लिया। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। विष्णु पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिये फिर से प्राप्त किया था। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
राखासुत्र कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक की हो सकती है। राखी सामान्यत तौर बहनें अपने भाईयों को ही बाँधती हैं, लेकिन ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित सम्बंधियों को भी बाँधी जाती है।

Post source : पंडित दयानन्द शास्त्री, (ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)

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