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उबाऊ होता है यह इंतजार…..

सर्वोच्च अदालत का फैसला आने के बाद अब जाकर कहीं राहत मिली। इंतजार करना हमेशा से एक बोरिंग काम है। राजनीतिक घटनाक्रम भले ही कितना भी मनोरंजन करें पर इंतहा तो इंतजार की होती ही है ना। तो बेंगलुरू से लेकर भोपाल। सुप्रीम कोर्ट से लेकर राजभवन। मुख्यमंत्री निवास से भाजपा प्रदेश मुख्यालय। परेशान कर दिया इन सबके बीच कयासों से वास्तविकता के बीच तक दौड़ लगवा-लगवाकर। मुएं कंप्यूटर का की बोर्ड हांफ गया। हाथ की अंगुलियां दुख गयीं। लगातार सोचते-विचारते दिमाग की नसें पक चुकी हैं। अखबार छाप-छापकर पस्त हैं। टीवी चैनल दिखा-दिखा के अघा गये। लेकिन मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार रहेगी या जाएगी, यह सस्पेंस गुरूवार की शाम तक लंबा खींच गया। मुझे याद आया कि इराक और ईरान के बीच लगातार आठ साल युद्ध लड़ा गया। तब एक अखबार ने कार्टून छापा था। मुक्केबाजी की रिंग में इराक और ईरान नामक दो योद्धा आपस में मुकाबला कर रहे हैं। इसे देखने के लिए एक भी दर्शक मौजूद नहीं है

स्टेडियम का चौकीदार भी रवानगी लेते हुए उनसे कह रहा है कि जब मुकाबला पूरा हो जाए तो कृपया स्टेडियम का ताला लगाकर वहां से चले जाएं। मध्यप्रदेश का नाटक आठ साल लम्बा तो होने से रहा, लेकिन उबाऊ होने की हद तक खिंचता गया। कांग्रेस के बागी विधायक कहते हैं कि सरकार में नहीं रहेंगे। लेकिन ऐसा साक्षात करने के लिए वे भोपाल नहीं आ रहे। कलमनाथ और दिग्विजय सिंह लगातार दावा कर रहे हैं कि बहुमत उनके पास है। इसे साबित करने के लिए जरूरी फ्लोर टेस्ट से वे कतराते रहे। राज्यपाल लालजी टंडन, मुख्यमंत्री नाथ और विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति के बीच पत्राचार की त्रिवेणी बहती रही। सुप्रीम कोर्ट में अभिषेक मनु सिंघवी, कपिल सिब्बल और मुकुल रोहतगी अपने-अपने स्तर पर कानून की रबर खींचने में मसरूफ हैं। इस सबके बीच हो यह रहा है कि प्रदेश में बजट जैसी बेहद महत्वपूर्ण एवं आम जनता से सीधा सरोकार रखने वाली प्रक्रिया अधर में लटक गयी थी।

श्यामला हिल्स, निशात एंक्लेव तथा 74 बंगले आदि जगह के मंत्री निवास ‘साजन बिना सुहागन’ वाली स्थिति में दिख रहे हैं। कोरोना के नाम पर राज्य का विधानसभा भवन सन्नाटे से घिरा हुआ है। विधायक विश्राम गृह में लोग कम, प्रश्न चिन्ह ज्यादा नजर आने लगे हैं। इस सबके बीच आज सुबह जिस मामले से साक्षात्कार हुआ, वह भीतर तक दहला गया। एक मंत्री बंगले के बाहर सत्तर साल के आदमी को बैठा देखा। परिवेश से वह गरीब, चेहरे से दुर्भाग्यशाली तथा हाव-भाव से परेशान दिख रहा था। मैंने वजह पूछी तो उसने बताया कि छतरपुर से मंत्री से मिलने आया है। बीते चार दिन से रोज वहां आता है। जहां उसे पता चलता है कि माननीय मंत्री जी प्रवास पर हैं। मैं उस शख्स की परेशानी का खुलासा नहीं करुंगा। क्योंकि इससे प्रतीत होगा कि किसी खास मंत्री के ही बारे में यह लिखा जा रहा है। हां, उसकी परेशानी इतनी बड़ी भी नहीं कि यूं घर से सैंकड़ों किलोमीटर दूर उसे भटकना पड़े।

मामूली-सा काम, जो मंत्री के दस्तखत की बजाय संबंधित अधिकारी को एक फोन मात्र लगा देने से पूरा हो सकता है। क्या यह कहना गलत होगा कि बीते कुछ दिन की इस उथल-पुथल के चलते आम जनता विभिन्न स्तर पर ऐसे ही परेशानी का सामना कर रही होगी। मंत्री सरकार बचाने में मसरूफ हैं। विधायक (फिर वे चाहे किसी भी दल के हों) विधानसभा क्षेत्र को छोड़कर अपने-अपने दल के लिए क्षेत्ररक्षण में जोत दिये गये हैं। ज्यादातर जन प्रतिनिधियों ने राज्य से आंख मूंद ली है। वे प्रदेश के सियासी तालाब में मची हलचल के बीच यह जतन करने में जुट गये हैं कि मछली की आंख पर कैसे निशाना लगाया जा सके। कुल मिलाकर आलम यह कि हर ओर अनिश्चय है। जनता परेशान है और सरकार के नाम पर केवल नियुक्ति तथा तबादले वाले खेल खेले जा रहे हैं। भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने मामले को दो दिन से ज्यादा लंबा नहीं खींचा। अब प्रक्रियाओं का मकड़जाल ऐसा है कि किसी भी मामले को भी आसानी से लम्बा खींचा जा सकता है।

निर्भया कांड की दोषियों को एक के बाद एक मिलीं लाइफ लाइन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। लम्बे इंतजार के बाद ले-देकर वह समय आया है, जब उम्मीद है कि गुरूवार सुबह चारों दरिंदों को फांसी पर लटका दिया जाए। निर्भया कांड का जिक्र यूं कि इसके जरिये कानून-व्यवस्था की लम्बी प्रक्रिया वाले उस पहलू को समझाया जा सके, जिसके तहत प्रदेश की सरकार का मामला भी खींचने का जतन हो रहा था। खेर, सुबह निर्भया के अरोपियों को फांसी हो जाएगी और शाम को कमलनाथ सरकार का भविष्य भी स्पष्ट हो जाएगा। वैसे, मुख्यमंत्री बहुमत के लिए इतने ही आश्वस्त हैं तो क्यों नहीं वे मंत्रियों से कहते कि भोपाल आकर वह काम करें, जिसके लिए उन्हें जिम्मेदारी दी गई है? बेंगलुरू में उन बागियों को मनाने के लिए दिग्विजय सिंह के साथ आधी केबिनेट भेज दी भला। वैसे फैसला आने के बाद शाम को नरोत्तम मिश्रा ने सटीक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, ‘अब हवाएं ही करेंगी रोशनी का फैसला, जिस दिए में तेल होगा, वो दिया जलता रहेगा।’ तो अब किस दिए में तेल है और किसका खत्म हो रहा है, यह बताने की अलग से जरूरत तो लगती नहीं। नाई-नाई बाल कितने……और कर लेते हैं शुक्रवार शाम तक इंतजार।

प्रकाश भटनागर

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