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कमलनाथ जी! आपका समय शुरू होता है अब – प्रकाश भटनागर

मसला संजीदा है, लेकिन अधिक गंभीरता माहौल को कई बार बोझिल बना देती है। आज अगर यह कहूंगा कि ‘बुढ़िया मर गई गम नहीं, मगर मौत ने घर देख लिया’ तो सत्तासीन लोगों को बुरा लग सकता है। इसलिए आज अपनी बात कुछ गुनगुनाते अंदाज में रखने का मूड बनाया है। हिंदी फिल्मों के पुराने दो गाने हैं। एक है, ‘तू छुपी है कहां, मैं तड़पता यहां।’ दूसरा, ‘निसुल्ताना रे, प्यार का मौसम’ आया। इन गानों में एक समानता है। बीच में एक से अधिक बार गायक सहित साजिंदे भी पूरी तरह खामोश हो जाते हैं। लगता है कि गाना खत्म हो गया है। लेकिन फिर अचानक पहले गायक और फिर वादक सक्रिय हो उठते हैं। मध्यप्रदेश में चल रहे राजनीतिक घमासान का मामला भी ऐसा ही है। कांग्रेस अपने और निर्दलीय विधायकों के छिप जाने से परेशान दिख रही है। जो तलाश लिये गये, उनके तीखे तेवर भी सरकार और मुख्यमंत्री को सांसत में डाले हुए हैं। इधर, भाजपा खेमे के हाव-भाव देखकर लग रहा है कि वह प्यार के मौसम का गीत गुनगुना रही है

ताकि अपनों के बीच खुशी का संचार हो जाए और परायों के बीच मौजूद नाराजों को इस मौसम का आनंद उठाने के लिए आमंत्रित भी कर लिया जाए। परसों की देर रात से लेकर आज की शाम तक के हालात पर गौर करें। दिग्विजय सिंह का तो यह कहते हुए तालू ही छिल गया होगा कि कांग्रेस तथा निर्दलीय विधायकों को भाजपा ने बंधक बनाया। उन्हें पच्चीस से पैंतीस करोड़ रुपए देकर खरीदने का जतन किया गया। गये विधानसभा चुनाव से पहले अपनी ही पार्टी को तेल लेने भेजने वाले जीतू पटवारी भी शायद आज किसी दर्द-निवारक तेल का ही जुगाड़ कर रहे होंगे। बुधवार का सारा दिन वह यही चीख-चीखकर अपना गला दुखाते रहे कि विधायकों के साथ मारपीट की गयी है। लेकिन जिनके लिए ऐसा कहा जा रहा है, वे विधायक इन दावों से ठीक उलट बात कह रहे हैं। बसपा वाले संजीव कुशवाहा ने तो कल ही कह दिया था न उन्हें बंधक बनाया गया तथा न ही भाजपा ने उनसे संपर्क किया है। इसी दल की रामबाई ने आज दो-टूक कहा कि यदि कोई उन पर हमला करेगा तो वह स्वयं ही उसका हाथ तोड़ देने में सक्षम हैं। सपा के राजेश शुक्ला ने भी इसी तरह की बात कही है।

हैरत तो यह कि कांग्रेस के ही ऐदल सिंह कंसाना, रणवीर जाटव एवं कमलेश जाटव ने भी दिग्विजय या जीतू के सुर में सुर नहीं मिलाए हैं। आज जिन निर्दलीय सुरेन्द्र सिंह शेरा से कर्नाटक में संपर्क हुआ उन्होंने भी ऐसी कोई बात नहीं कही। बताया कि वे किसी मांगलिक कार्य के सिलसिले में वहां गये हुए हैं। शेरा ने मजेदार बात कहीं। कहा, मैं तो सरकार के साथ हूं, सरकार मेरे साथ नहीं है। खरीद फरोख्त पर बसपा के संजीव कुशवाहा ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया, अगर भाजपा से भाव-ताव किया है तो कांग्रेस बताए 14 महीने पहले उनका समर्थन हासिल करने के लिए उन्होंने क्या आफर किया था? यानी जो लोग फिलहाल ‘लौटके घर को आए’ वाली श्रेणी में दिख रहे हैं, और वे जो ‘लौटके घर न आए’ वाली पंगत में हैं, सभी के सभी कांग्रेस और दिग्विजय सिंह के तमाम आरोपों पर रत्ती भर सहमति जताने को राजी नहीं हुए हैं। बेचारे कमलनाथ। बुधवार को अपनी आदत से समझौता करने को मजबूर हो गये।

कहां तो तीन सेकंड से अधिक का समय वे किसी विधायक तक को नहीं देते थे और कहां कल दिल्ली से लाये गये छह विधायकों से तीन-तीन घंटे चर्चा करते रहे। सूत्रों के इस दावे में कोई खोट नहीं दिखता कि यह सारी मंत्रणा दिग्विजय और पटवारी के शब्द इन विधायकों के मुंह में डालने की गरज से की गयी थी। लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। नतीजा यह कि तीन-तीन बार मुख्यमंत्री की पत्रकार वार्ता का कार्यक्रम बनता बिगड़ता रहा और तीनों ही मर्तबा मामला टांय-टांय फिस हो गया। विवश मुख्यमंत्री को महज कागजी बयान जारी कर काम चलाना पड़ गया। यहां तो मीर याद आ गये। उन्होंने लिखा था, ‘यारों मुझे मुआफ करो मैं नशे में हूं। अब जाम दो तो खाली ही दो, मैं नशे में हूं।’ सरकार को आंख दिखा रहे यह सभी विधायक भी तो ऐसे भरे पेट वाले नशे की चपेट में दिख रहे हैं, जिसके चलते अब वे खाली जाम ही ले पाने की स्थिति में रह गये हैं। तो क्या ये दिल्ली यात्रा के दौरान किसी ‘..और बाकी काम हो जाने के बाद’ वाली स्थिति को सामने दिखा रहा है। लगता है कि बाजी अभी भाजपा के हाथ से फिसली नहीं है।

कांग्रेस को समझ में आ रहा हो तो दिग्विजय सिंह का खेल जरूर बिगड़ गया। बुधवार को कांग्रेस के बेहद आक्रामक होते ही शिवराज सिंह चौहान दिल्ली से भोपाल आए। मीडिया से बात की। फिर व्हाया आगर-मालवा एक बार फिर दिल्ली रवाना हो गये। यहां तक कि गुरूवार को अपने जन्मदिन के लिए भी वे भोपाल में नहीं रहे। आज दिल्ली में सारा दिन दिग्गज नेताओं से उनकी मुलाकात का सिलसिला चला। यानी कुछ खिचड़ी तो अब भी पक ही रही है। हां, एक बात खटकती है। वह यह कि ऐसी सारी गहमागहमी के बावजूद नरोत्तम मिश्रा आज भोपाल में ही रहे। इसे भाजपा में प्रदेश के नेतृत्व को लेकर ऊहापोह से जोड़कर देखा जा सकता है? तो साहब। कांग्रेस के लिए ‘तू छुपी है कहां, मैं तड़पता यहां’ वाला गाना गाने का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है। निर्दलीय शेरा सहित कांग्रेसी बिसाहूलाल सिंह, हरदीप डंग और रघुराज कंसाना तो यह लाइनें लिखने तक कांग्रेस को तड़पा ही रहे हैं। अब लौटने के बाद उनका रुख भी बाकी छह विधायकों जैसा ही रहा तो फिर सत्तारूढ़ दल के लिए ‘…तेरे बिन चांद की फीकी है चांदनी, मेरे गीतों को छोड़ चली रागिनी’ वाले हालात ही बन जाएंगे। इसी तरह ‘निसुल्ताना रे प्यार का मौसम आया’ वाले भाजपाई गीत के आए वक्फे को पूर्ण विराम न समझ लें। सोलह मार्च से पहले-पहले इस गीत का अगला हिस्सा भी बजना तय है। कमलनाथ जी। यह कौन बनेगा करोड़पति का सियासी रूपांतरण है। जिसके प्रायोजक आपके राजनीतिक सहोदर दिग्विजय सिंह हैं और खुद आप का समय शुरू होता है अब।

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