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खुलासा: 70वर्ष की आयु में भी सरकारी कर्मचारी सेवा निवृत्त नहीं हुआ

नटनागर शोध संस्थान में चल रही गड़बडि़यों उजागर

-संस्थान के पूर्व कर्मचारियों ने प्रेस वार्ता में किया खुलासा

मंदसौर। नटनागर शोध संस्था सीतामउ के पूर्व कर्मचारियों नरेंद्रकुमार कछावा, ओमप्रकाश रामावत, राजनरायण द्विवेदी, हिमानी ओझा, चंद्रशेखर, दयाराम गेहलोत आदि ने गुरूवार को जिला मुख्यालय पर आयोजित एक प्रेस वार्ता में संस्था व संस्था के उप निदेशक डॉ मनोहरसिंह राणावत पर कई कई गंभीर आरोप लगाए। संस्था में चल रहे भ्रष्टाचार, अनियमितताओं, बिना सूचना या नोटिस के कर्मचारियों को नौकरी से निकालने, खरीदी में अनियमितताओं आदि गंभीर मामलों में ली गई इस इस प्रेस वार्ता में कर्मचारियों ने कहा कि आम तौर पर 62 साल की आयु में सरकारी कर्मचारी सेवा निवृत्त हो जाता है, लेकिन जुलाई 2011 में सेवानिवृत्त होने वाले उप निदेशक राणावत 70 की आयु में भी यहीं काबिज है। हालांकि यूजीसी के 16 अप्रैल 2010 के आदेश के तहत संस्था ने रिक्त पदों की सेवा निवृत्ति 65 कर दी थी, लेकिन राणावत तो अब 70 के हो चले हैं। खास बात यह है, कि इस पूरे मामले में वल्लभ भवन भोपाल के आदेश पत्र भी फर्जी लगा दिया गया। दरअसल राणावत को यहां 70 की आयु में भी सेवा देन पर जो आदेश पत्र बताया गया है वह उच्च शिक्षा विभाग मंत्रालय वल्लभ भवन की ऑन लाइन साईड पर है नहीं और जब इसकी जांच की गई तो पता चला कि वल्लभ भवन के अन्य किसी आदेश पर कागज रखकर बीच में इस संदर्भ का आदेश फर्जी तरिके से टाईप किया हुआ है। इसे फोटो कॉपी की भाषा में चिड़ीया बैठाना भी कहते हैं। राणावत के वेतनमान पर भी सवाल खड़े कि उन्होंने बताया कि उच्च शिक्षा विभाग के पत्र एफ 45/12/78/9/20 दिनांक 13 फरवरी 1980 उन्नीस पद स्वीकृत शत प्रतिशत अनुदान वर्ष 2018-2019 रूपए 1.26 करोड़ सालाना बजट वाली इस संस्था में उप निदेशक राणावत 70 की आयु में भी वेतनमान 37000-67000 में 1.65 लाख किस नियम से ले रहे हैं। इसी तरह राणावत नियमों को तांक पर रखकर संस्था के दो पदों पर एक साथ आसिन है, जिनमे सचिव व उपनिदेशक पद शामिल है।

संस्था के प्रतिलिपिकार, स्टेनोटायपिस्ट, लिपिक, लेखापाल को 60 वर्ष में सेवानिवृत्त किया। जबकि 62 और बाद में यूजीसी के आदेशानुसार इन्हें 65 की आयु में सेवा निवृत्त करना था। एसे में भ्रम यह भी पैदा हो रहा है, कि संस्था में कौन से सेवा नियम लागू हैं। इतना ही नहीं बल्कि इन कर्मचारियों की अंशदान राशि नियुक्ति दिनांक से ईपीएफओ क्यों जमा नहीं किए इसकी भी जांच की जाना चाहिए। इस मामले में खुद ईपीएफओ कार्यालय भी आशंका के घेरे में आ रहा है। संस्था के टायपिस्ट कम लिपिक को अज्ञात कारणों से अचानक निलंबित कर दिया गया व पुस्तकालयाध्यक्ष को टरमिनेट कर दिया। जबकि इस संदर्भ में दोनों को न कोई नोटिस दिया गया न कोई जानकारी। इसी तरह कार्यभारी भृत्य दयाराम गेहलोत व चंद्रशेखर गेहलोत को बिना किसी कारण 1 जनवरी 2019 से पद से हटा दिया गया। जबकि दोनों की सेवा यहां 12 व 14 साल की हो चुकी थी। बावजूद इसके इन्हें अब तक नियुक्ति पत्र तक नहीं दिया गया। एसे में बिना नियुक्ति आदेश के पदमुक्त करने की जांच भी होना चाहिए।

संस्था की पुस्तकालयाध्यक्ष हिमानी ओझा ने बताया कि उन पर चोरी जैसा गंभीर आरोप लगाते हुए संस्था ने सीतामउ थाने पर झुठी रिपोर्ट दर्ज करवाई। दरअसल उन पर आरोप लगाया था कि उनने संस्था के आवश्यक दस्तावेजों की चोरी की है। जबकि अब तक पुलिस ने पुस्तकालयाध्यक्ष से एसा कोई दस्तावेज बरामद नहीं किया। एसे में यह रिपोर्ट स्वतः झुठी साबित हो रही है। कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया गया कि संस्था के जिम्मेदार प्रदेश सरकार से मिलने वाले सालाना 1.26 करोड़ के अनुदान राशि का दुरूपयोग करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वर्तमान में यहां 7 कर्मचारियों के वेतन पर 80 लाख रूपए खर्च होना बताया जा रहा है। जो वस्तु 2 रूपए में आसानी से मिल सकती है वही वस्तु यहां 8 रूपए में खरीदी जा रही है। इसी तरह अपने निजी खर्च के बिल भी संस्था में लगा-लगाकर भ्रष्टाचार की चरम सीमा को पार किया जा रहा है। संस्था कर्मचारियों ने बताया कि संस्था के लिपिक राजनारायण द्विवेदी, लेखापाल नरेंद्रकुमार कछारा ने सेवा निवृत्ति के बाद ओमप्रकाश रामावत टायपिस्ट कम लिपिक के निलंबन एवं पुस्कालयाध्यक्ष हिमानी ओझा के टर्मिनेट के पश्चात उच्च न्यायालय खंडपीठ इंदौर में पेंशन व अन्य मांगों के लिए प्रकरण भी विचाराधीन है। कर्मचारियों ने कलेक्टर से मांग की कि द्वारा बताए गए तमाम बिंदुओं की जांच कर संस्था में पर्यवेक्षक की नियुक्ति की जाए, प्रदेश का गौरव नटनागर शोध संस्था भ्रष्टाचार मुक्त हो सके।

एशिया की बड़ी शोध संस्थाओं में से एक

कर्मचारियों ने बताया कि सीतामउ स्थित नटनागर शोध संस्था न सिर्फ एक मामुली शोध संस्था है। बल्कि नटनागर शोध संस्थानों का प्रदेश की इतिहास विषय की सबसे बड़ी व एशिया की 10 बड़ी शोध संस्थाओं में शुमार है। एसे में यह संस्था न सिर्फ सीतामउ बल्कि पूरे मंदसौर जिले के लिए गौरव का कारण है, किंतु बिते कुछ सालों में यहां पदस्थ आला हुक्मारानों की हिटलरशाही के चलते जिले के इस गौरव की इज्जत सरे बाजार उछल रही है। इन सबका दोषी कर्मचारियों ने यहां पदस्थ उप निदेशक मनोहरसिंह राणावत को ठहराया है।

18 देश जुड़े पर स्थानीय को लाभ नहीं

कर्मचारियों ने यह भी आरोप लगाया कि कहने को इस संस्थान से 18 देशों के लोग जुड़े हुए हैं, लेकिन सीतामउ के स्थानीय लोगों को संस्थान का कोई लाभ नहीं मिलता अपितु इतनी बड़ी शोध संस्थान सीतामउ में है। खुद सीतामउ के कई नागरिक इस बात से अंजान है, जिसका महज एक कारण यहां के आला हुक्मारानों की तानाशाही। जबकि नटनागर शोध संस्थान के रास्ते स्थानीय इतिहास के विद्यार्थियों के लिए भी हमेशा खुले रहने चाहिए। तब जाकर तो डॉ रघुवीरसिंह के सपने के अनुसार सीतामउ और मंदसौर जिले से भी इतिहास के कई बड़े शोधक देश-दुनिया में सीतामउ व मंदसौर का नाम रोशन करेंगे।

नटनागर शोध संस्थान के सेवानिवृत्त लेखापाल एवं अन्य अधिकारियों द्वारा मुझ पर जो भी आरोप लगाए गए है वे सभी आरोप झूठे है। मैं 70 वर्ष की आयु में संस्थान में कार्यरत हूं। संस्थान की मेनेजिंग एवं जनरल बोर्ड के पत्र के आधार पर ही शासन ने मेरी सेवा बढ़ाई थी। शासन का पत्र भी मेरे पास है। मैं 15 जनवरी को मंदसौर में प्रेस कांफ्रेंस कर पूरे प्रमाणों के साथ अपनी बात रखूंगा।– डॉ. मनोहरसिंह राणावत, निर्देशक, नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ

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