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जानिए आखिर श्राद्ध क्या है..??

व्यक्ति का अपने पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन यही श्राद्ध कहलाता है। धर्म शास्त्रों की ऐसी मान्यता है सूर्य के कन्या राशि में आने पर परलोक से पितर अपने स्वजनों यानी पुत्र, पौत्रों के साथ रहने आ जाते हैं इसलिए इसे कनागत भी कहा जाता है। देवताओं से तुलना करने पर व्यक्ति के तीन पीढ़ी के पूर्वज गिने जाते हैं । इसमें पिता को वसु के समान, रुद्र दादा के समान तथा आदित्य को परदादा के समान माना गया गया है। श्राद्ध के समय सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक करने का विधान बताया गया है।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया की हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि जो स्वजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं चाहे वे किसी भी रूप में अथवा किसी भी लोक में हों, उनकी तृप्ति और उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, वह श्राद्ध है। माना जाता है कि सावन की पूर्णिमा से ही पितर मृत्यु लोक में आ जाते हैं और नवांकुरित कुशा की नोकों पर विराजमान हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में हम जो भी पितरों के नाम का निकालते हैं, उसे वे सूक्ष्म रूप में आकर ग्रहण करते हैं। केवल तीन पीढ़ियों का श्राद्ध और पिंड दान करने का ही विधान है। पुराणों के अनुसार मुताबिक मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। श्राद्ध पक्ष में मांसाहार पूरी तरह वर्जित माना गया है। श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है। तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से जानते हैं। श्राद्ध स्त्री या पुरुष, कोई भी कर सकता है। श्रद्धा से कराया गया भोजन और पवित्रता से जल का तर्पण ही श्राद्ध का आधार है।
ज्यादातर लोग अपने घरों में ही तर्पण करते हैं। श्राद्ध का अनुष्ठान करते समय दिवंगत प्राणी का नाम और उसके गोत्र का उच्चारण किया जाता है। हाथों में कुश की पैंती (उंगली में पहनने के लिए कुश का अंगूठी जैसा आकार बनाना) डालकर काले तिल से मिले हुए जल से पितरों को तर्पण किया जाता है। मान्यता है कि एक तिल का दान बत्तीस सेर स्वर्ण तिलों के बराबर है। परिवार का उत्तराधिकारी या ज्येष्ठ पुत्र ही श्राद्ध करता है। जिसके घर में कोई पुरुष न हो, वहां स्त्रियां ही इस रिवाज को निभाती हैं। परिवार का अंतिम पुरुष सदस्य अपना श्राद्ध जीते जी करने के लिए स्वतंत्र माना गया है। संन्यासी वर्ग अपना श्राद्ध अपने जीवन में कर ही लेते हैं। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। श्राद्ध का समय दोपहर साढे़ बारह बजे से एक बजे के बीच उपयुक्त माना गया है। यात्रा में जा रहे व्यक्ति, रोगी या निर्धन व्यक्ति को कच्चे अन्न से श्राद्ध करने की छूट दी गई है। कुछ लोग कौओं, कुत्तों और गायों के लिए भी अंश निकालते हैं। कहते हैं कि ये सभी जीव यम के काफी नजदीकी हैं और गाय वैतरणी पार कराने में सहायक है।
हिंदू धर्म ग्रंथों में मनुष्य के ऊपर तीन तरह के ऋण बताए गए हैं। देव, ऋषि तथा पितृ ऋण और इन सभी में पितृ ऋण के निवारण के लिए 15 दिनों के पितृ पक्ष में पितृ यज्ञ करने यानी श्राद्ध कर्म का वर्णन किया गया है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक के समय को पितृ पक्ष कहा जाता है और इसी 15 दिनों के अंदर श्राद्ध कर्म कर पितरों को जलदान, पिंड दान की प्रक्रिया की जाती है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया की श्राद्ध पितृ पक्ष के अंतिम दिन यानी अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में जानी जाती है। महालया अमावस्या पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों या पितरों की पुण्यतिथि का सही दिन ज्ञात नहीं होता है। ऐसे पूर्वजों को इस दिन श्रद्धांजलि और भोजन समर्पित कर याद किया जाता है।
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महालय अमावस्या —
पितृ पक्ष के सबसे आखिरी दिन को महालय अमावस्या के नाम से जाना जाता है. इसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहते हैं. क्योंकि इस दिन उन सभी मृत पूर्वजों का तर्पण करवाते हैं, जिनका किसी न किसी रूप में हमारे जीवन में योगदान रहा है. इस दिन उनके प्रति आभार प्रक्रट करते हैं और उनसे अपनी गलतियों की माफी मांगते हैं. इस दिन किसी भी मृत व्यक्ति का श्राद्ध किया जा सकता है. खासतौर से वह लोग जो अपने मृत पूर्वजों की तिथि नहीं जानते, वह इस दिन तर्पण करा सकते हैं.
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जानिए इस वर्ष 2018 में कौन सा श्राद्ध किस दिन ओर कब करें ?

पहला श्राद्ध

(24 सितंबर 2018, सोमवार)

तिथि – पूर्णिमा

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:48 से 12:36 तक
रौहिण मुहूर्त = 12:36 से 13:24 तक
अपराह्न काल = 13:24 से 15:48 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई हो।


दूसरा श्राद्ध

(25 सितंबर 2018, मंगलवार)
तिथि – प्रतिपदा

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:48 से 12:36 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:36 से 13:24 तक
अपराह्न काल = 13:24 से 15:47 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु प्रतिपदा तिथि को हुई हो। नानी-नाना का श्राद्ध भी इस दिन किया जा सकता है।


तीसरा श्राद्ध

(26 सितंबर 2018, बुधवार)
तिथि – द्वितीय

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:48 से 12:36 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:36 से 13:23 तक
अपराह्न काल = 13:23 से 15:46 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु द्वितीय तिथि को हुई हो।


चौथा श्राद्ध

(27 सितंबर 2018, गुरुवार)
तिथि – तृतीय

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:48 से 12:35 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:35 से 13:23 तक
अपराह्न काल = 13:23 से 15:45 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु तृतीय तिथि को हुई हो।


पांचवा श्राद्ध

(28 सितंबर 2018, शुक्रवार)
तिथि – चतुर्थी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:47 से 12:35 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:35 से 13:22 तक
अपराह्न काल = 13:22 से 15:44 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु चतुर्थी तिथि को हुई हो।


छठा श्राद्ध

(29 सितंबर 2018, शनिवार)
तिथि – पंचमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:47 से 12:34 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:34 से 13:22 तक
अपराह्न काल = 13:22 से 15:43 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु पंचमी तिथि को हुई हो। यह श्राद्ध उन परिवारजनों के लिए भी किया जाता है जिनकी मृत्यु कुवारेंपन में हुई हो। इसलिए इसे कुंवारा पंचमी श्राद्ध भी कहा जाता है।


सातवां श्राद्ध

(30 सितंबर 2018, रविवार)
तिथि – षष्ठी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:47 से 12:34 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:34 से 13:21 तक
अपराह्न काल = 13:21 से 15:43 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु षष्ठी तिथि को हुई हो।


आठवां श्राद्ध

(1 अक्टूबर 2018, सोमवार)
तिथि – सप्तमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:47 से 12:34 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:34 से 13:21 तक
अपराह्न काल = 13:21 से 15:42 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु सप्तमी तिथि को हुई हो।


नौवां श्राद्ध

(2 अक्टूबर 2018, मंगलवार)
तिथि – अष्टमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:46 से 12:33 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:33 से 13:20 तक
अपराह्न काल = 13:20 से 15:41 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु अष्टमी तिथि को हुई हो।


दसवां श्राद्ध

(3 अक्टूबर 2018, बुधवार)
तिथि – नवमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:46 से 12:33 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:33 से 13:20 तक
अपराह्न काल = 13:20 से 15:40 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु नवमी तिथि को हुई हो। इस दिन को मुख्य रूप से माताओं और परिवार की सभी स्त्रियों के श्राद्ध के लिए भी उचित माना जाता है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहा जाता है।


ग्यारहवां श्राद्ध

(4 अक्टूबर 2018, गुरुवार)
तिथि – दशमी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:46 से 12:32 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:32 से 13:19 तक
अपराह्न काल = 13:19 से 15:39 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु दशमी तिथि को हुई हो।


बारहवां श्राद्ध

(5 अक्टूबर 2018, शुक्रवार)
तिथि – एकादशी (ग्यारस श्राद्ध)

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:32 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:32 से 13:19 तक
अपराह्न काल = 13:19 से 15:39 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु एकादशी तिथि को हुई हो।


तेरहवां श्राद्ध

(6 अक्टूबर 2018, शनिवार)
तिथि – द्वादशी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:32 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:32 से 13:18 तक
अपराह्न काल = 13:18 से 15:38 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु द्वादशी तिथि को हुई हो। इस दिन उन लोगों का श्राद्ध भी किया जाता है जिन्होंने मृत्यु से पूर्व सन्यास ले लिया हो।


चौदहवां श्राद्ध

(7 अक्टूबर 2018, शनिवार)
तिथि – त्रयोदशी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:31 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:31 से 13:18 तक
अपराह्न काल = 13:18 से 15:37 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु त्रयोदशी तिथि को हुई हो। घर के मृत बच्चों का श्राद्ध करने के लिए भी इस दिन को शुभ माना जाता है।


पंद्रहवां श्राद्ध

(7 अक्टूबर 2018, रविवार)
तिथि – चतुर्दशी

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:31 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:31 से 13:18 तक
अपराह्न काल = 13:18 से 15:37 तक
किसके लिए : चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध केवल उनकी मृतजनों के लिए करना चाहिए जिनकी मृत्यु किसी हथियार से हुई हो, उनका क़त्ल हुआ हो, जिन्होंने आत्महत्या की हो या उनकी मृत्यु किसी हादसे में हुई हो। इसके अलावा अगर किसी की मृत्यु चतुर्दशी तिथि को हुई है तो उनका श्राद्ध अमावस्या श्राद्ध तिथि को ही किया जाएगा।


सोलहवां और अंतिम श्राद्ध

(8 अक्टूबर 2018, सोमवार)
तिथि – अमावस्या

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त = 11:45 से 12:31 तक
रोहिण मुहूर्त = 12:31 से 13:17 तक
अपराह्न काल = 13:17 से 15:36 तक
किसके लिए : जिनकी मृत्यु अमावस्या तिथि, पूर्णिमा तिथि और चतुर्दशी तिथि को हुई हो। इसके अतिरिक्त जिन लोगों को अपने मृत परिवारजनों की तिथि याद नहीं रहती उनका श्राद्ध भी इसी दिन किया जा सकता है। क्योंकि इसे सर्व पितृ अमावस्या भी कहते है।

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जानिए क्यों आवश्यक है श्राद्ध करना.???
हिंदू धर्म शास्त्रों में इस बात का उल्लेख है कि पितृ पक्ष में तर्पण व श्राद्ध करने से व्यक्ति के पूर्वज प्रसन्न होते हैं और उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं इससे घर के अंदर सुख शांति का वातावरण बनता है। इसके साथ ही समृद्धि भी होती है । इसके साथ यह भी मान्यता है कि अगर पितृ नाराज हो जाएं तो ऐसे व्यक्ति को जीवन में कई तरह की समस्याओं का सामना भी करना होता है। पितरों के रुष्ट होने से धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का सामना मनुष्य को करना होता है। संतानहीनता के मामलों में यह कहा जाता है कि ज्योतिषी से कुंडली के पितृ पक्ष (घर) को दिखवा लें और उसका समन भी करें। ज्योतिषी पितृदोष को देखकर पितृ दोष शमन की व्यवस्था करा देते हैं। पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करनी चाहिए। माना जाता है कि यमराज 15 दिनों के लिए प्रत्येक वर्ष श्राद्ध पक्ष दौरान सभी जीवो को मुक्त कर देते हैं। जिससे यह सभी जीव अपने स्वजनों के पास पहुंचकर तर्पण, भोजन इत्यादि ग्रहण कर पाते हैं। शास्त्रों में ऐसा वर्णित है कि पितर ही अपने कुल की रक्षा करते हैं।
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कैसे जाने पितृदोष का असर/प्रभाव–
(यदि जन्म कुंडली में पितृ दोष हो तो घर और परिवार पर कैसा रहेगा असर)
  • घर का मुखिया बीमार रहता है, रसोई घर के आस – पास वाली दीवारों में दरार आ जाते है । जिस घर में पितृ दोष हावी होता है उस घर से कभी भी मेहमान संतुष्ट होकर नहीं जायेंगे चाहे आप कुछ भी क्यूँ न कर ले या फिर कितनी ही खातिरदारी कर ले , मेहमान हमेशा नुक्स निकाल कर रख देंगे यानी की मोटे तौर पर आपकी इज्ज़त नहीं करेंगे ।
    • पितृ दोष कही न कही अनेको दोषों को उत्पन्न करने वाला होता है जैसे की वंश न बढ़ने का दोष , असफलता मिलने का दोष , बाधा दोष और भी बहुत कुछ । तो इन दिनों में की गयी पूजा और तर्पण अगर विधि विधान और मन लगाकर किया जाए तो अच्छे फल देने वाली सिद्ध होती है ।
    •  बालो पर सबसे पहले प्रभाव पड़ता है , जैसे की , समय से पहले बालों का सफ़ेद हो जाना , सिर के बीच के हिस्से से बालों का कम होना , हर कार्य में नाकामी हाथ लगाना , घर में हमेशा कलह रहना , बीमारी घर के सदस्यों को चाहे छोटी हो या बड़ी घेरे रखती है , यह सब लक्षण पितृ दोष घर में है इसको बताते है । और अगर घर में पितृ दोष है तो किसी भी सदस्य को सफलता आसानी से हाथ नहीं लगती
    • पितृ दोष कुंडली में है अगर , तो कुंडली के अच्छे गृह उतना अच्छा फल जितना उन्हें देना चाहिए ।
    • घर के सभी लोग आपस में झगड़ते है , घर के बच्चों के विवाह देरी से होते है , और काफी दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है विवाह करने में, घर में धन ना के बराबर रुकेगा अगर पितृ दोष हावी है तो, बीमारी या फिर क़र्ज़ देने में धन चला जायेगा जुडा हुआ धन , पुरानी चीजे ठीक कराने में धन निकल जायेगा पर रकेगा नहीं ।
    • परिवार की मान और प्रतिष्ठा में गिरावट आती है, पितृ दोष के कारण घर में पेड़-पौधे या फिर जानवर नहीं पनप पाते । घर में शाम आते आते अजीब सा सूनापन हो जायेगा जैसे की उदासी भरा माहौल, घर का कोई हिसा बनते बनते रह जायेगा या फिर बने हुए हिस्से में टूट-फुट होगी, उस हिस्से में दरारे आ जाती है ।
  • घर में चीजे और साधन होते हुए भी घर के लोग खुश नहीं रहते । जब पैसे की जरुरत पड़ती है तो पैसा मिल नहीं पाता । ऐसे घर के बच्चों को उनकी नौकरी या फिर कारोबार में स्थायित्व लम्बे समय बाद ही हो पाता है , बच्चा तेज़ होते हुए भी कुछ जल्दी से हासिल नहीं कर पायेगा ऐसी परिस्थितियाँ हो जायेंगी ।
  •  जिस घर में पितृ दोष होता है उस घर में भाई-बहन में मन-मुटाव रहता ही रहता है , कभी कभी तो परिस्थितियाँ ऐसी हो जाती है की कोई एक दूसरे की शकल तक देखना पसंद नहीं करता । पति-पानी में बिना बात के झगडा होना भी ऐसे घर में स्वाभाविक है जिस घर में पितृ दोष हो ।
  • ऐसे घर के लोग जब एक दूसरे के साथ रहेंगे तो हमेशा कलेश करके रखेंगे परन्तु जैसे ही एक दुसरे से दूर जायेंगे तो प्रेम से बात करेंगे ।
  •  घर में स्त्रियों के साथ दुराचार करना , उन्हें नीचा दिखाना , उनका सम्मान न करने से शुक्र गृह बहुत बुरा फल देता है जिसका असर आने वाली चार पीड़ियों तक रहता है । तो शुक्र गृह भी पित्र दोष लगाता है कुंडली में ।
  •  जिस घर में जानवरों के साथ बुरा सुलूक किया जाता है उस घर में पितृ दोष आना स्वाभाविक है । और जो जानवरों के साथ बुरा सुलूक करते है वह ही नहीं अपितु उनका पूरा परिवार और उनकी संतान पर पितृ दोष के बुरे प्रभाव के हिस्सेदार जाने-अनजाने में बन जाते है |
  •  जिस घर में विनम्र रहने वाले व्यक्ति का अपमान होता है वह घर पितृ दोष से पीड़ित होगा , साथ में जो लोग कमजोर व्यक्ति का अपमान करेंगे वह भी पितृ दोष से प्रभावित होंगे ।
  •  जमीन हथियाने से , हत्या करने से पित्र दोष लगेगा ।
  •  जो लोग समाज-विरॊधि काम काम करेंगे उनका बृहस्पति खराब होकर उनकी कई पीड़ियों तक पितृ दोष देता रहता है ।
  •  बुजुर्गों का अपमान जहा हुआ वह समझिये पितृ दोष आया ही आया ।
    •  घर में पितृ दोष होगा तो घर के बच्चे की शिक्षा , दिमाग , बाल , व्यवहार पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता ।
    • जिन जातकों को पितृ दोष होता है उनके लिए इस दिन का बहुत महत्व है , बहुत से कारण होते है की हमारे अपने पितरों से सम्बन्ध अच्छे नहीं हो पाते , कारण , आपके जीवन में रुकावटें , परेशानियाँ और क्या नहीं होता ।
  •  सीड़ियों के निचे रसोई या फिर सामान इक्कठा करने का स्टोर बनाने से पितृ दोष लगता है ।
  • मित्र या प्रेमी को दोख देने से पितृ दोष लगता है , शेर-मुखी घर में रहने वाले लोगो को पितृ दोष के दुष्प्रभाव झेलने पड़ते है । {शेर-मुखी ऐसा घर होता है जो शुरू शुरू में चौड़ा होता है परन्तु जैसे जैसे आप घर के अंदर जाते जायेंगे वह पतला होता चला जाता है |
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जानिए पितृदोष निवारण के सरल और असरकारी उपाय —

ज्योतिष में पितृदोष का बहुत महत्व माना जाता है। प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में पितृदोष सबसे बड़ा दोष माना गया है। इससे पीड़ित व्यक्ति का जीवन अत्यंत कष्टमय हो जाता है।

जिस जातक की कुंडली में यह दोष होता है उसे धन अभाव से लेकर मानसिक क्लेश तक का सामना करना पड़ता है। पितृदोष से पीड़ित जातक की उन्नति में बाधा रहती है।

आमतौर पर पितृदोष के लिए खर्चीले उपाय बताए जाते हैं लेकिन यदि किसी जातक की कुंडली में पितृ दोष बन रहा है और वह महंगे उपाय करने में असमर्थ है तो भी परेशान होने की कोई बात नहीं।

पितृदोष का प्रभाव कम करने के लिए ऐसे कई आसान, सस्ते व सरल उपाय भी हैं जिनसे इसका प्रभाव कम हो सकता है।

1. कुंडली में पितृ दोष बन रहा हो तब जातक को घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने स्वर्गीय परिजनों का फोटो लगाकर उस पर हार चढ़ाकर रोजाना उनकी पूजा स्तुति करना चाहिए। उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है।

2. अपने स्वर्गीय परिजनों की निर्वाण तिथि पर जरूरतमंदों अथवा गुणी ब्राह्मणों को भोजन कराए। भोजन में मृतात्मा की कम से कम एक पसंद की वस्तु अवश्य बनाएँ।

3. इसी दिन अगर हो सके तो अपनी सामर्थ्यानुसार गरीबों को वस्त्र और अन्न आदि दान करने से भी यह दोष मिटता है।

4. पीपल के वृक्ष पर दोपहर में जल, पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल, काले तिल चढ़ाएं और स्वर्गीय परिजनों का स्मरण कर उनसे आशीर्वाद मांगें।

5. शाम के समय में दीप जलाएं और नाग स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र या रुद्र सूक्त या पितृ स्तोत्र व नवग्रह स्तोत्र का पाठ करें। इससे भी पितृ दोष की शांति होती है।

6. सोमवार प्रात:काल में स्नान कर नंगे पैर शिव मंदिर में जाकर आक के 21 पुष्प, कच्ची लस्सी, बिल्वपत्र के साथ शिवजी की पूजा करें। 21 सोमवार करने से पितृदोष का प्रभाव कम होता है।

7. प्रतिदिन इष्ट देवता व कुल देवता की पूजा करने से भी पितृ दोष का शमन होता है।

8. कुंडली में पितृदोष होने से किसी गरीब कन्या का विवाह या उसकी बीमारी में सहायता करने पर भी लाभ मिलता है।

9. ब्राह्मणों को प्रतीकात्मक गोदान, गर्मी में पानी पिलाने के लिए कुंए खुदवाएं या राहगीरों को शीतल जल पिलाने से भी पितृदोष से छुटकारा मिलता है।

10. पवित्र पीपल तथा बरगद के पेड़ लगाएं। विष्णु भगवान के मंत्र जाप, श्रीमद्‍भागवत गीता का पाठ करने से भी पित्तरों को शांति मिलती है और दोष में कमी आती है।

11. पितरों के नाम पर गरीब विद्यार्थियों की मदद करने तथा दिवंगत परिजनों के नाम से अस्पताल, मंदिर, विद्यालय, धर्मशाला आदि का निर्माण करवाने से भी अत्यंत लाभ मिलता है।

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