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नटनागर शोध संस्थान में निदेशक-कर्मचारियों का विवाद, लगे गड़बड़ी के आरोप

सीतामऊ स्थित नटनागर शोध संस्थान अधिकरियों और कर्मचारियों की आपसी विवाद सामने आया है. कुछ दिनों पूर्व निलंबित कर्मचारियों ने संस्थान में गड़बड़ी बताकर निदेशक मनोहरसिंह राणावत पर गंभीर आरोप लगाए थे. इसके बाद मंगलवार को राणावत ने प्रेस के माध्यम से आरोपों पर सफाई पेश की. कागज दिखाकर उन्होंने आरोपों को निराधार बताया. इस दौरान राणावत भावुक भी हो गए और रोकर बोले कि-में यहां नहीं आना चाहता था. डॉ रघुवीरसिंह जी के कहने पर मैं अजमेर जैसी जगह छोड़ सीतामऊ आया हूं.

नटनागर शोध संस्थान इन दिनों चर्चा में है. कुछ दिनों पहले निलंबित कर्मचारी हिमानी ओझा, ओमप्रकाश राणावत सहित अन्य दो कर्मचारियों ने प्रेसवार्ता में संस्थान पर गंभीर आरोप लगाए थे. आज इन्हीं आरोपों पर सफाई देते हुए राणावत भावुक हो गए. उन्होंने कहा कि 1776 में अजमेर से व्याख्याता के पद पर था और डाऊ रघुवीरसिंहजी के कहने के बाद यहां पर आया था. उनके निदेशक पद पर बने रहने को लेकर उठाए गए सवाल वपर उन्होंने कहा कि मैं शोधकर्ता के रूप में यहां आया था. 1980 में उपनिदेशक और 2012 में निदेशक बना. निदेशक की आयु राज्य शासन के आदेश और अन्य प्रक्रिया को पूरी कर 65 से 70 की गई है. डायरेक्टर को मैनेजिंग बोर्ड ही अपाइंट करता है. जिसमें संस्था अध्यक्ष, वाईस चेयरमेन, नामीनी, गोर्वमेंट नामीनी मिलाकर आठ लोग होते हैं. डायरेक्टर बनने के बाद भी मेरे वेेतन में कोई इजाफा नहीं हुआ है. सचिव के नाम से मुझे कोई अलग से पैसा नहीं मिलता है. उन्होंने यह भी कहा कि आरोप लगाने वालों के खिलाफ मैं मानहानी का दावा करने वाला हूं. जल्द ही उनके नोटिस उन तक पहुंच जाएंगे.

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि शासन से करीब सवा करोड़ अनुदान आता है. जिसमें अस्सी लाख सैलरी में बंट जाता है. इसकी सीए द्वारा ऑडिट कर शासन को रिपोर्ट भी भेजी जाती है. खरीदी में घोटाले के आरोप पर राणावत ने कहा सामान क्रय करने के लिए कमेटी है. जिसमें तीन अधिकारी और एक अकाउंटेंट होता है. टेंडर विज्ञप्ति निकाली जाती है और वेबसाइट पर भी कोटेशन दिए जाते हैं. जिस खरीदी में मुझ पर आरोप लगाए उसका कोटेशन खुद आरोप लगाने वाले ने ही खोला था. तीन लोगों के साइन होने के बाद खुद नरेंद्र जी द्वारा ही कोटेशन खोला गया और कागजी प्रक्रिया में हैंडराइटिंग भी उनकी ही है.

थंब इप्रेशन मशीन में घपले के आरोप में उन्होंने कहा कि इसकी भी विज्ञप्ति और कोटेशन निकाले गए थे. जिसकी प्रक्रिया नरेंद्र कच्छारा ने ही पूरी की थी. मैं किसी भी पार्टी को जानता तक नहीं हूं. नटनागर शोध संस्थान द्वारा जो सामग्री क्रय की जाती है उसके लिये एक क्रय समिति का गठन किया गया है जिसमें संस्थान के चार सदस्य डा. रेखा दिवेटी वरिष्ठ शोध अधिकारी, डा. सहदेवसिंह चैहान, सहायक शोध अधिकारी डा. राजेन्द्र चव्हाण, सहायक शोध अधिकारी (मराठा इतिहास) एवं नरेन्द्रकुमार कच्छारा, लेखापाल इन चारों सदस्यों की सहमति द्वारा ही कोई भी सामग्री क्रय की जाती है. कोटेशन पर तीनों अधिकारियों के हस्ताक्षर उपरान्त स्वयं लेखापाल नरेन्द्रकुमार कच्छारा के अनुमोदन उपरान्त निदेशक एवं अध्यक्ष के हस्ताक्षर होते है, तो फिर खरीदी में भ्रष्टाचार का प्रश्न ही नहीं उठता और निदेशक का नाम इसमें द्वेषता के कारण बदनाम करने के लिये लिया जा रहा है. पीएफ के लिए हिमानी ओझा द्वारा लगाए गए आरोप पर उन्होंने कहा कि पीएफ सीधे अकाउंट में ही जाता है.

नटनागर शोध संस्थान सीतामउ जो कि एक राष्ट्रीय धरोहर है। इसका संरक्षण करना हम सबका दायित्व है। वर्तमान में इस संस्थान का नाम देश ही नहीं विदेशों में भी प्रचलित है। हम सबको मिलकर इसे आगे बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।

यह बात श्री नटनागर शोध संस्थान सीतामउ के निदेशक एवं मानसेवी सचिव मनोहरसिंह राणावत ने मंगलवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए कही आपने बताया कि शोध संस्थान मप्र रजिस्ट्रीकरण अधि. के तहत पंजीकृत होकर विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से स्थाई संबंद्धता प्राप्त है तथा उच्च शिक्षा विभाग मप्र शासन से शत प्रतिशत अनुदान प्राप्त संस्था है। संस्था अशासकीय अनुदान प्राप्त शिक्षण संस्थान की श्रेणी में आता है। संस्थान के संस्थापक रघुवीरसिंह जी के सामने तीन बार शोध संस्थान को अन्य संस्थानों में विलय करने के प्रस्ताव भी मिले थे एवं विलय को लेकर उन्हें ब्लेंक चेक देने का ऑफर भी दिल्ली से दिया गया था। तब महाराज कुमार ने तत्कालिन मानव संसाधन मंत्री को यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया था कि दिल्ली में राजनीति होती है रिसर्च नहीं। रिसर्च के लिए तो सीतामउ में ही आना पड़ेगा।

विगत् दिनों कुछ लोगों द्वारा संस्थान को बदनाम करने का षड़यंत्र रचा जा रहा है। संस्थान व निदेशक पर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे है। आरोप लगाने वालों पर मैं शिघ्र ही मान हानि का प्रकरण दर्ज कर रहा हूं। आपने कहा कि संस्थान के निदेशक पद की सेवानिवृत्ति आयु 65 के स्थान पर 70 वर्ष करने की अनुमति भी प्रबंध मंडल द्वारा पारित प्रस्ताव पर मप्र शासन द्वारा सशर्त प्रदान की गई थी। यही नहीं संस्थान द्वारा शैक्षणिक पदों को नियमानुसार यूजीसी वेतनमान दिया जा रहा है। आपने कहा कि बॉयलाज के अनुसार प्रबंध संचालक बोर्ड ने मुझे ही मानसेवी सचिव नियुक्त किया है। यह कोई लाभ का पद नहीं है। संस्थान द्वारा क्रय विक्रय के लिए गठित कमेटी बना रखी है और सारी खरीदी टेण्डर प्रक्रिया से ही होती है।

संस्थान से 1976 से जुडे श्री राणावत ने कहा कि वे महाराज कुमार के असीम प्रेम और स्नेह के कारण अजमेर जैसी जगह पर व्याख्याता का कार्य छोड़कर सीतामउ जैसी छोटी जगह आया हंू। यह कहते हुए वे पत्रकारवार्ता के दौरान कई बार भावुक भी हुए। जो संस्थान के प्रति उनका स्नेह दर्शाता है।

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