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पूरे साल पेड़ो की कटाई पर कुछ दिनों का वृक्षारोपण, आखिर कैसे हो पर्यावरण संतुलन

सीतामऊ। पर्यावरण से पृथ्वी का गहरा नाता है। इस रिश्ते की डोर को सबसे मजबूती से जिसने बांधे रखा है वह पेड़ हैं। लेकिन पेड़ो की बेहिसाब कटाई से हम जंगलों के बीच अगर छांव को तरसते हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि इन हालातों के जनक भी हम ही हैं। प्रदेश में पेड़ लगाने का अभियान छेड़ने वाली सरकार भी अब हरियाली को लेकर चिंतित दिखाई देती है। और हर बार सरकार बेवजह पेड़ काटने और कटवाने वालों पर सख्त कार्रवाई के निर्देश देती है पर सरकार के इस आदेश पर अमल करने वाले महकमे की पड़ताल करें तो साफ होता है कि उसके पास सरकारी आदेश को जमीन पर उतारने के लिए कोई नीति और नीयत नहीं है। यही वजह है कि जब वन महकमे के हुक्मरानों से पेड़-पौधे लगाने के बारे में बातचीत की जाती है तब उनके दावे इतने बढ़-चढ़कर होते हैं लेकिन उन पर विश्वास कर पाना आसान नहीं होता। वही इसके तबाही के जिम्मेदार हम भी है हमे भी मकान बनाना हो या सड़क, अपने निजी हित के लिए अंधाधुंध रफ्तार से पेड़ काटे जा रहे हैं। पेड़ काटने के नियम हैं और आवासीय इलाकों में चालीस प्रतिशत क्षेत्र पेड़-पौधों के लिए छोड़ा जाना चाहिये। लेकिन, पर्यावरण संरक्षण के ये नियम केवल कागजी हैं। लोग सोचते हैं एक पेड़ कट जाने से भला पर्यावरण पर कौन सी आफत आ जायेगी। दूसरी और वन विभाग पुराने पेड़ बचाने की बजाय नये लगाने की योजनाओं पर ज्यादा जोर देता है कटते पेड़ो के कारण ग्लोबल-वार्मिग की समस्या से पर्यावरण असंतुलन खतरा बढ़ गया है। अंधाधुंध काटे जा रहे वृक्षों से सिमट रहे जंगल इसका प्रमुख कारण है। फिर भी कोई इस ओर ध्यान देने को तैयार नहीं हैं। लिहाजा बढ़ती आबादी के कारण न केवल हरियाली गुम हो रही है, बल्कि सांस लेने के अनुकूल वायु व पीने को शुद्ध जल भी नसीब नहीं हो रहा है। ऐसा नहीं कि पर्यावरण संतुलन के लिए सरकारी योजनाएं नहीं हैं। इसको लेकर तमाम योजनाएं बनी हैं, बावजूद धरती सूनी ही है।

नगरीय सीमा में दस आरामशीने संचालित है जिन पर हजारों टनों से लकड़ी स्टाक पड़ी है और आरामशीन संचालक नगरीय सीमा से लगे जंगल में सैकड़ो टन लड़की स्टाक कर रखी है आखिकार इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है अगर एक आरामशीन संचालक इतनी लकड़ी स्टाक की है तो उसने पेड़ कितने काटे होंगे और इसमे वनविभाग के अधिकारियों की मिलीभगत कहे या उनकी कार्यवाही में लापरवाही। आखिरकार नुकसान तो पर्यावरण का ही हुआ है अगर यही मंजर रहा तो इस हरी भरी धरती को जल्द रेगिस्तान बनने से कोई नही रोक सकता।

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