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प्रश्न सिंधिया के पार्टी छोड़ने का नही,कांग्रेस की सोच, शैली व व्यवस्था का है – Narendra Nahata

ज्योतिरादित्यसिंधिया जी के कांग्रेस छोड़नेके पश्चात् उनकेपरिवार के कांग्रेस केसाथ रिश्तों को लेकरबहुत चर्चा सोशलमीडिया पर है, बात 1857 तक जापहुँची है। जब जब दोनोंपार्टियों में सिंधिया परिवारका आतंरिक विरोधहुआ सबने सुभद्रा कुमारीचौहान का उल्लेखकर अपनी बातकही। पर इस सचाईको सबने नकारा कि यह सबहोते हुए दोनोंपार्टियों ने उस परिवार का साथ लेने मेंपरहेज नहीं किया। इस समकालीन इतिहास कोभी सही परिप्रेक्ष्य मेंदेखा जाना चाहिए। स्वर्गीय जीवाजी राव सिंधिया , ग्वालियर केतत्कालीन महाराज और ज्योतिरादित्य सिंधिया केदादा विचारधारा से हिन्दू महासभाके नज़दीक थे। गाँधी जी कीहत्या के षड्यंत्र मेंभी ग्वालियर काउल्लेख आता हीहै। पंडित जवाहर लालनेहरू इस बातको अच्छी तरहजानते थे। वे यहभी मानते होंगेकि इस परिवारका प्रभाव जनमानस पर है। इस समस्या कासमाधान उन्हें ग्वालियर कीतत्कालीन महारानी श्रीमती विजय राजे सिंधिया मेंदिखा। श्रीमती सिंधिया महारानी अवश्य थी परन्तुवे एक मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि कीथी और कांग्रेस कीसोच में फिटबैठती थी। पंडित जीने उन्हें तैयारकिया और अपनेपति की असहमतिके बावजूद उनने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहणकी । वेगुना से कांग्रेस कीसांसद बनी। परन्तु उसजमाने के कांग्रेस केदिग्गज नेताओं केसामने उनके व्यक्तित्व छोटाही था ।उननेकोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहींपाली। वे महल सेसीमित राजनीति करतीरही। वर्ष १९६७ मेंपंडित द्वारिका प्रसादमिश्रा मुख्य मंत्रीथे।कांग्रेस के भीतर औरबाहर उनका पूर्व मध्यभारत इलाके मेंप्रबल विरोध था।उन्ही दिनों सरकार केखिलाफ मध्य प्रदेश मेंछात्र आंदोलन अपने उरूजपर था। उसका गर्भकेंद्र भी ग्वालियर हीथा। इस विरोध सेनिपटने के लिएमिश्र जी नेसामंतवाद के खिलाफ नारा दिया। श्रीमती सिंधिया कांग्रेस के बाहर होगई। कांग्रेस बहुत कम बहुमतसे चुनाव जीतगई , पर मिश्रजी लम्बे समयतक मुख्य मंत्रीनहीं रह सके। ठाकुर गोविंद नारायणसिंह ने कांग्रेस विधायकों केसाथ कांग्रेस पार्टीछोड़ दी। श्रीमती सिंधिया के नैतृत्व मेंलोक सेवक दलबना और जनसंघ के साथमिल कर संयुक्त विधायकदल की सरकारबन गई। उन्हीदिनों उनके पुत्र श्रीमाधव राव सिंधिया लंदनसे शिक्षा खत्मकर लौटे थे। राजकुमार का आभा मंडलउन के पासथा। वे स्वयं तोचुनाव नहीं लड़सकते थे परन्तु ग्वालियर केराजकुमार को जन संघके निशान दीपक केबिल्ले के साथदेख कर जनताभाव विभोर थी।वे चुनाव केदौरान बूथ दरबूथ घूमते रहे। कांग्रेस के उम्मीदवार वरिष्ठनेता गौतम शर्मा कीजमानत जप्त हुई। मध्य भारत मेंकांग्रेस लगभग साफ़ होगई। परन्तु तब तकश्रीमती सिंधिया जन संघ केसाथ नहीं जानाचाहती थी। तब जनसंघ के प्रतिझुकाव श्री माधवराव सिंधिया औरउनके सलाहकार सरदारआंग्रे का था।संविद सरकार लंबीनहीं चल पाईl कांग्रेस केविधायक पार्टी मेंलौट गए। राज माता जन संघ मेंचली गई। भारतीय जनसंघ मध्य भारतमें स्थापित होगई। श्री श्यामा चरणशुक्ल मुख्य मंत्रीबने। वे हमेशा सार्वजनिक रूपसे इस बातको कहा करतेथे कि मिश्र जीकी निजी नाराज़गी केचलते मध्य भारतमें कांग्रेस कमजोरहुई और जनसंघ स्थापित होगई। उनकी बात इसतथ्य से स्थापित होतीहै कि मध्य भारतमें सामंतवाद कानारा देने वालेपंडित मिश्र जीने रीवा केसाथ अनेक छोटेबड़े महाराजाओ केसाथ चुनावी समझौताकिया था । वर्ष 1977 में आपात काललगा । तबग्वालियर की महारानी राजमाता होचुकी थी। उन्हें गिरफ्तार करलिया गया। इस बातने उनके औरइंदिरा जी केरिश्तों में तल्खी भरदी। 1980 में इंदिराजी के खिलाफ रायबरेली सेचुनाव लड़ी और हारगई। आपात काल केदौरान सिंधिया जीनेपाल चले गए। लौटे तो 1977 में निर्दलीय और1980 मेंकांग्रेस समर्थन से निर्दलीय केरूप में गुनाके सांसद बने। राज माता तबतक जन संघऔर बाद मेंभाजपा की राजमाता बन चुकीथी। कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाईकांग्रेस को बहुत महँगीपड़ी। 1984 के लोक सभाचुनाव में श्रीमाधव राव सिंधिया को नाटकीय तरीके से अटल जी केखिलाफ चुनाव लड़ने ग्वालियर भेज दिया गया। यह निर्णय जिसभी सोच सेलिया गया , उल्टापड़ा। सिंधिया जी न केवलजीते , केंद्रीय मंत्रीभी बने। 1995 के आसपासजैन हवाला डायरीमंदिर के बाददूसरा बड़ा चुनावीमुद्दा बन गई। एक तथ्य भविष्यमें राजनीति विज्ञान औरकानून के शोधार्थियों केलिए शोध काविषय होगा किचुनाव तक सर्वोच्च न्यायालय जल्दीजल्दी तारीख लगातारहा। मुद्दा जिन्दा रहा। चुनाव में कांग्रेस हारगई। चुनाव केबाद तारीख़े लंबी लगने लगीऔर अंततः सर्वोच्च न्यायालय नेअपील ख़ारिज कर दी।परकांग्रेस का नुकसान तो होही चुका था। नरसिंहराव जी नेअपनी आदत केमुताबिक या किसी रणनीतिके तहत ‘कानून अपना काम करेगा’ केवाक्य को जुमलाबना लिया। सिंधिया जीने नाराज़ होकरकांग्रेस छोड़ दी औरविकास कांग्रेस बनाली, अर्जुन सिंह जीने तिवारी कांग्रेस। दोनों कीलड़ाई नरसिंह रावजी से थी। दोनों ने कांग्रेस मेंलौटने के अवसरजिन्दा रखे। परिस्थितियां बदलतेही दोनों की पार्टी में घरवापसी हो गई lलेकिन 1996 की सरकार चली गई , भारतीयजनता पार्टी कीसरकार बनी ,अटलजी प्रधानमंत्री बने। फिर कांग्रेस कीआंतरिक लड़ाई कांग्रेस कोमहंगी पड़ी । प्रसंग वैसा हीहै पर श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया केसमय राजनीति बदलचुकी है ।अमेरिका में ग्रीन पार्टीके संस्थापक राल्फ नादेर ने अपने पितासे कहा मुझे लगता हैअब हमें तीसरीपार्टी बनानी पड़ेगी। पिता ने जवाब दिया, नहीं हम दूसरीमें सेटल होजाएंगे। मुझे लगता हैउनके पुत्र आर्यमन नेयदि यही सवालकिया होगा तोजवाब भी यहीरहा होगा। इस बारतीसरी पार्टी नहींबनी। दोनों बार कीतरह यह भीकांग्रेस की अंदरूनी कलह ही थी। तबदोनों नेता जानतेथे कि विचारधारा से उनका किसीऔर दल में समायोजित होना मुश्किल होगा.उनने सम्भावनाये जीवितरखी। ज्योतिरादित्य जीशायद जानते थेकि अब भारतीयजनता पार्टी कोउनकी इतनी जरूरतनहीं है जितनीउनकी दादी कीथी। तीसरी पार्टी बनाकर उनके पिताभी एक सीटही जीत सकेथे। इस बार तोवह सीट पहलेसे ही भारतीयजनता पार्टी केपास है। दूसरा बड़ाकारण यही हैकि अब कांग्रेस में विचार धारा गौण हो गई।नेता की पहचानविचार धारा सेनहीं रही है। निजी मान सम्मान और हित महत्वपूर्ण होगए है ।सिंधिया जी औरउनके मित्रो नेभी यही कहा। उनका सम्मान नहींरहा था। प्रतिरक्षा में दूसरे नेताओं का भी तर्क यही हैहम तो सबदेने को तैयारथे रुके क्योंनहीं। सारी बात लेन देन की ही थी। अच्छा लगता यदिसिंधिया जी कहते धारा 370 या नागरिकता संशोधनरजिस्टर या ऐसे हीकिसी मुद्दे केसमर्थन में यापार्टी के स्टैंडसे नाराज वेभाजपा में जारहे है। ऐसा तोनहीं हुआ। बात निजीपसंद और मानसम्मान पर आकर टिकगई है. काँग्रेस स्वयंही इसके लिएजवाबदार है। इन वर्षो मेंअलग अलग संदर्भमें देश में सेक्युलर राजनीति के शुभ चिंतको ने कांग्रेस कीअसफलताका एक ही कारणबताया , कांग्रेस काविचार धारा सेहटना , व्यक्ति परकराजनीति करना। पर कांग्रेस हैकि सुनने और सोचनेको तैयार नहींहै। सत्ता की सुविधाने ही हीहमें इतना कमजोरबना दिया कि हम कोई भीसमझौता करने कोतैयार हो जातेहै। वर्ना क्या ग्वालियर मेंकांग्रेस जैसे राजनैतिक दल का बोर्ड संगठनके कार्यालय सेउठ कर महल के किसीकोने में लगना चाहिएथा । कांग्रेस नेअपने ही हाथों अपने को ग्वालियर महल मेंकैद कर लिया। 135 सालपुरानी पार्टी कीप्रजातांत्रिकसरकार की एकमंत्री कहे किमहाराज कहे तोमहल में झाड़ूभी लगा लूंगीया कुए मेंकूद कर मरजाउंगी। अब किसी काँग्रेसी कोयह भाषा नहींकचौटती। हर नेता ऐसीही भाषा सुननाचाहता है। बोलते रहो, सत्ता बनी रहनाचाहिए। हम एक राजनैतिक दलके कार्यकर्ता नहींरहे , मानसिक क्रीतदास हो गएहै। क्या सिंधिया जीको भाजपा ऐसीही सुविधा देगी। राज माता की स्थितिभिन्न थी। तब वे उतनेमजबूत भी नहींथे। पर अब तोसबने देखा यहछूट तो उनने उनकी भुआ को भीनहीं दी। वे मुख्यमंत्री बन गईपर पार्टी सेछोटी ही रही। तब तीसरी पीढ़ीको यह सुविधामिलेगी क्या ? मुझे याद हैज्योतिरादित्यजी जब नएनए राजनीति मेंआये तब मुझेउनमे एक उदीयमान नेतादिख रहा था। मैंने कांग्रेस केएक वरिष्ठ नेतासे कहा इन्हेमहाराज नहीं नेताबनाये। मुझे जवाब मेंएक मुस्कराहट मिली। कांग्रेस एक नौजवाननेता को अपने संस्कारो में ढालसकती थी। उसेबता सकती थीकि देश कीजनता 350 साल पुराने रिश्तों सेज्यादा महत्व १३५ सालपुरानी पार्टी केरिश्तो को देतीहै। इस पार्टीके पास अपनाइतिहास है , सोचऔर विचारधारा है।नई पीढ़ी अपनेसपनो से बंधीहै, वह नएरिश्ते बना रहीहै, पार्टी यापरिवार के अतीतमें उसे गौरवनहीं दीखता। वेअपने नेता मेंउन्ही सपनो कोसाकार करने कीक्षमता देखना चाहतीहै। यदि ऐसा होतातो गुना चुनावका परिणाम भी शायद भिन्न होता।कांग्रेस का नेता विपरीतपरिस्थितियों में जीत करअपनी उंचाई औरबढ़ा लेता। शायद, शायद अधीर रंजन चौधरी कीजगह लोक सभामें पार्टी कानेतृत्व कर रहा होता।यदि ग्वालियर मेंकार्यकर्ता कांग्रेस से जुड़ता , विचार सेजुड़ता तो पार्टी को सिंधिया जी के जानेके बाद अपनासंगठन यूँ ग्वालियर कीगलियों में ढूंढनानहीं पड़ता। लेकिन अबकांग्रेस ने इन बातों पर सोचना छोड़दिया है। जोकांग्रेस पार्टी रियासतों केएकीकरण का श्रेयलेती है, जोकांग्रेस प्रिविपर्स की समाप्ति केनाम पर चुनावलड़ती थी , वहींकांग्रेस सिंधिया परिवार का महत्वउनके पूर्व महाराजहोने में मानरही थी,एकआभा मंडल वाले शिक्षित नेता में नहीं ।कार्यकर्ता क्यों नहीं कहेकि मै वहां हूँजहां महराज है। यही तोआपकी व्यवस्था है। उसका भविष्य विचार , आचरण, चरित्र ,समर्पण, संघर्ष से नहीं हैनेता की जयबोलने में है। क्या यह दुःखकी बात नहींहै कि १०टर्म वाला सांसदऔर अनुभवी केंद्रीय मंत्री, दो बार कामुख्य मंत्री औरपार्टी का महासचिव और४ बार कासांसद और दोबार का केंद्रीय मंत्रीजिस प्रदेश मेंपार्टी के नेताहो उसका ऐसाबिखराव हो। क्या इननेताओ का इतनावरिष्ठ होना हीपार्टी के लिएअपदान हो गया है। राहुलजी के कार्यकाल में सारी बात उम्रपर आकर टिकगई। नए बनाम पुरानेनेता। उम्र मेंपार्टी के भविष्यका समाधान ढूंढाजाने लगा था। ऐसा ही समयइंदिराजी के समय भीआया था जबइंदिराजी को पार्टी केस्थापित नेताओ से लड़नाथा। मुरारजी देसाई , स. कापाटिल , जैसे विशालव्यक्तित्व के नेता। तब इंदिराजी नेभी युवाओ कोसाथ लिया था। पार्टी के १० नेताओ जिसमे चंद्र शेखर, मोहन धारिया जैसेलोग थे , नेइंदिराजी को पत्र लिखकर पार्टी की नीतियों में परिवर्तन कीमांग की जिसमे बैंकोका राष्ट्रीकरण औरप्रिवीपर्स की समाप्ति शामिलथा। युवा नेताओ काव्यक्तित्व पुराने नेताओ केसामने बहुत छोटाथा. पर वेएक विचार कीबात कर रहेथे और देशउनकी सुन रहाथा। उसी विचार ने पुरानेनेताओ को धराशायी करदिया , इंदिराजी पुनःप्रधान मंत्री बनगई। क्या हम विचारसे पहचान वालेनेता ऐसे नेता बना सके। क्याऐसी किसी भीलड़ाई को वैचारिक स्तर तक ले जासकने की क्षमतापार्टी में शेषरही है। हमारीविश्वसनीयता इतनी बची हैकि शाहीन बाग़ जैसे कार्यक्रमों मेंजब में मालवा के विभिन्न स्थानों परगया तो हरजगह मुस्लिम नौजवान मुझसे सवालकर रहा था। क्यासच में कांग्रेस सीए ए / एनआर सी के खिलाफहै। केवल सवाल मात्रको ही हमें झकझोर देनाचाहिए। अपने आपसे पूछना चाहिए यह सवाल क्योंआना चाहिए। जवाब तोहम जानते है। प्रश्न ज्योतिरादित्य जी केपार्टी छोड़ने कानहीं ,पार्टी कीअपनी सोच, कार्यशैली और व्यवस्था काहै। हर हार हमेंदूसरी हार कोभुलाने का अवसरदेती है। सिंधिया जीने दिल्ली कीहार को भुलवा दिया। कोई और हारसिंधिया का गम भुलादेगी। हमारी कोशिश उन लोगोको पुनः “घर वापसी” कराकर पुनः सत्तामें लौटने कीहै। वे विधायकजब चाहे लौटआये ,तत्काल या कुछसमय बाद। पार्टी अपनेबुरे दिनों में साथदेने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को पीछे धकेल फिरउनका स्वागत करलेगी । भूल जाएंगेकी इन दिनोंमें उनने क्याक्या कहा , उन्हेंभाजपा ने कैसेसम्हाला और वे क्योंलौटे। हम हर समझौतेको उन्मुख है।

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