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प्रसंग: भगवान श्ंखेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर की प्रतिष्ठा का प्रारंभ हुआ पंच कल्याणक महोत्सव, भगवान की माता ने देखे 14 स्वप्न

जो व्यक्ति यह समझता है कि भगवान की प्रतिमा सिर्फ पत्थर की है वह पांच कल्याणक में अवश्य भाग लें – आचार्य हेमचन्द्रसागरसूरि जी

आज भी होगे अनेक आयोजन

मंदसौर। 25 जनवरी को मंदसौर की धरा एक ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनने जा रही है। नगर के तलेरा विहार में जैन समाज के भगवान कलिकाल कल्पतरू श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर का निर्माण पूर्ण हो चुका है। जिसकी प्राण प्रतिष्ठा 25 जनवरी को संपन्न होने जा रही है। आयोजन में बड़ी संख्या में देश भर से साधु संतों के साथ साथ समाजजन भी मंदसौर आएंगे।

श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रतिष्ठा महोत्सव समिति द्वारा बताया कि भव्य प्रतिष्ठा समारोह को संपन्न करवाने के लिए पपू आचार्य देवश्री जिनचन्द्रसागरसूरीश्वरजी मसा और पपू आचार्य देवश्री हेमचन्द्र सागरसूरीश्वरजी मसा के साथ कई साधु साध्वीयां मंदसौर आ चुके है जिनके सानिध्य में प्रतिष्ठा के लिए होने वाले पूजन, विधान मंत्रोच्चार भी प्रारंभ हो चुके है।

20 जनवरी रविवार को भगवान पार्श्वनाथ के पंच कल्याणक में से च्यवन कल्याणक पूजन हुआ जिसमें इन्द्र इन्द्राणी और भगवान पार्श्वनाथ के माता पिता अश्वसेन और वामाजी की स्थापना कि गई। प्रातः 9 बजे च्यवन कल्याणक पूजन नवनिर्मित मंदिर में मंत्रोच्चार के साथ आचार्य देवश्री जिनचन्द्रसागरसूरीश्वरजी मसा और पपू आचार्य देवश्री हेमचन्द्रसागरसूरीश्वरजी मसा की निश्रा में प्रारंभ हुआ। मंत्रोच्चार विधिकारक कुक्षी से आए हेमन्तभाई द्वारा किया गया व संगीतकार पालिताणा से आए अमितभाई व उनकी टीम द्वारा कई स्वत्न प्रस्तुत किए। मंदिर में च्यवन पूजन संपन्न होने के बाद। रंगमंडप में भगवान पार्श्वनाथ की माता को भगवान के जन्म से पहले जो 14 स्वप्न आते है उनकी प्रस्तुति एक नृत्य नाटिका के रूप में भी गई। च्यवन कल्याणक के पूजन में आचार्य श्री के मस्तक व हाथ पर तिलक व सोने का वर्क लगाकर विधि पूर्ण कि गई। आचार्य श्री ने बताया कि इस तरह की विधि को पवित्र द्रव्यों से ही संपन्न करवाया जाता है। पवित्र द्रव्यों से भाव शिघ्र पैदा होता है। आमुख द्रव्यों में विशिष्ट शक्ति होती है।

पद्मसागरजी मसा ने बताया कि च्यवन पूजन मंत्रों के साथ तो नवनिर्मित मंदिर में किया ही गया उसके बाद आम व्यक्ति हो पूरी क्रिया समझ में आए इसके लिए विशाल मंडप वाराणसी नगरी में भगवान के माता पिता, इंद्र इं्रद्राणी, राजा के महामंत्री, सेनापति, गुरू आदि पात्र बनाकर किस प्रकार भगवान की माता को 14 स्वप्न आते है इसका मंचन भी किया गया। प्रतिदिन पंच कल्याणक के विधान इसी प्रकार मंदिर में मंत्रोच्चार के साथ संपन्न करवाया जाएगा और मंच पर नाटिका के रूप में।

कार्यक्रम के दौरान आचार्य हेमचन्द्रसागरसूरि जी मसा ने कहा कि जो व्यक्ति यह समझता है कि भगवान की प्रतिमा सिर्फ पत्थर की है उस व्यक्ति को पांच दिनों तक होने वाले पूजन, विधान, मंत्रोच्चार को अवश्य देखना चाहिए कि किसी प्रकार पत्थर की मूर्ति में प्राण डाल जाते है।

गणिवर्य विरागसागर जी मसा ने बताया कि जहां अपवित्र होती है वहां भगवान विराजमान नहीं होते है इसलिए हमें अपने मन को तन को शुद्ध करके पवित्र रखना है ताकि भगवान हमारे हृदय में विराजित हो सकें।

पद्म सागर जी मसा ने बताया कि मंदिर में भगवान की प्रतिमा प्रतिष्ठित करने से पूर्णाहूति नहीं होती है हृदय में भगवान की स्थापना करने से पूर्णाहृति होती है। मसा ने बताया कि आज हुए विधान में 12 मुद्राओं से वसक्षेप को अभिमंत्रित किया गया है।

आज होने यह आयोजन
आज 21 जनवरी को आचार्यश्री हेमचन्द्रसागरसूरिजी का जन्मदिवस श्रीसंघ द्वारा मनाया जाएगा। वहीं प्रातः 8.30 बजे जन्म कल्याणक विधान, 56 दिक्ककुमारी महोत्सव, मेरू पर्वत महोत्सव, 64 इंद्र सिंहासन कम्पायमान के साथ दोपहर 2 बजे 18 अभिषेक पूजन होगा। समिति ने नगर के समस्त धर्मप्रेमी जनता से अधिक से अधिक संख्या में आयोजन में पधारने का निवेदन किया है।

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