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बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी – प्रकाश भटनागर

राज्य में इस समय आनंद लेकर देखने को बहुत मसाला मौजूद है। याद करने को भी ढेर सारी बातें हैं। चाहें तो दोहरा लें, ‘बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी’ वाली लोकोक्ति। इच्छा हो तो वह बहुत पुरानी कहानी फिर याद कर लें, जिसका शीर्षक ‘अब्बू खां की बकरी’ था। खां साहब अपनी जिस बकरी को दिलो-जां से चाहते थे, उसे अंत में एक शेर मारकर खा जाता है। इससे पहले वह जमकर वनराज से संषर्घ करती है। लड़ाई की प्रत्यक्षदर्शी कई युवा चिड़ियाएं कहती हैं, ‘शेर जीत गया।’ एक बुजुर्ग चिड़िया फरमाती है, ‘नहीं, बकरी जीत गई।’ छह ऐसे विधायक तो ठिकाने लगा दिए गए, जिनकी महल यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति अगाध श्रद्धा सर्वव्यापी है। ये सब सिंधिया कोटे से कमलनाथ सरकार में मंत्री थे। एक- डेढ़ दर्जन के आसपास का मामला बचा है। उन विधायकों का, जिनके लिए सत्तारूढ़ कांग्रेस और मुख्य विपक्ष भाजपा पलक-पांवड़े बिछाए बैठे हैं

मामला शहर की नगर बस सेवा जैसा है। जिसमें किसी भी यात्री को देखते ही क्लीनर्स के बीच उन्हें अपनी-अपनी ‘सवारी’ बनाने की होड़ मच जाती है। यह व्यावसायिक लाभ का मामला होता है और वह उस राजनीतिक लाभ वाला घटनाक्रम है, जिसे पाने हेतु दोनों दलों के बीच भारी खींचतान मची हुई है। इस सबके बीच रविवार की मांग में सिंदूरी रंग भरती शाम यह ऐलान कर चुकी है कि सोमवार आने वाला है। वह दिन जब यह साफ हो सकता है कि राज्य में उधार का सिंदूर वाली सरकार ही चलेगी या फिर सत्ता रूपी सुंदरी किसी और का वरण कर लेगी। सारे खेल की अहम कड़ी विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने छह विधायकों को बर्खास्त करके कांग्रेस के लिए फौरी राहत और लम्बी मुसीबत का बंदोबस्त कर दिया लगता है। इससे भाजपा दबाव बनाने की स्थिति में आ गयी है। प्रजापति शुरू से ही कह रहे हंै कि विधायकों को नियमानुसार इस्तीफा देना होगा, तभी उसे स्वीकार किया जाएगा।

तो जब छह विधायकों के मामले में उनके पेश हुए बगैर, महज पत्र के आधार पर इस्तीफा स्वीकार किया जा सकता है तो बाकियों के लिए भी यही प्रक्रिया की मांग पर भाजपा जोर देगी। इसने तो उसके लिए प्रजापति के आगामी किसी कदम के अदालत में तर्कपूर्ण विरोध तक का रास्ता साफ कर दिया है। एक लतीफा याद आता है। अंधे, लंगड़े, लूले और बहरे सहित नंगे (यानी पैसे-संपदा के लिहाज से पूरी तरह ठनठन व्यक्ति) समूह में चले जा रहे थे। यकायक बहरा बोला, ‘मुझे डाकुओं के घोड़ों की टाप सुनाई दे रही है।’ अंधे ने कहा, ‘अबे सुनाई क्या दे रही है, देख वो तो सामने आ गये।’ लंगड़े ने कहा, ‘मेरी मानों तो भाग निकलो।’ लूला बोला, ‘भागेंगे नहीं, दो-दो हाथ करेंगे।’ नंगे ने कहा, ‘तुम सब तो बच जाओगे, लेकिन आज मुझे कंगाल होने से शायद ही कोई बचा पाए।’ प्रदेश सरकार एवं कांग्रेस में ऐसा ही चलता दिखता है।

व्यक्तित्व से बहरे हो चुके नेतागण यह दावा कर रहे हंै कि कांग्रेस के बागी खेमे की ओर से उन्हें खुशखबरी सुनाई दे रही है। राजनीतिक अंधत्व के शिकार महानुभाव खुद को इस राजनीतिक कुरुक्षेत्र का संजय बताने पर आमादा हैं। जिनके पैरों में अकर्मण्यता की बेड़ी बंधी है, वे ही दम दिखा रहे हैं कि सरकार को इस संकट से बाहर खींचकर दौड़ लगाते चले जाएंगे। वे भाजपा को हाथ पकड़कर धोबीपटक देने की बात कर रहे हैं, जिनके हाथ में कोई दम ही नहीं बचा है। हैरत है, कांग्रेस उन कमलनाथ तथा दिग्विजय सिंह पर अब भी आंख मूंदकर भरोसा कर रही है, जिनकी मुंदी आंखों और बंद कानों के चलते ही प्रदेश में सरकार के गिरने जैसी नौबत आ गयी है। इन दो चेहरों की आगामी किसी चमत्कारिक रणनीति पर यकीन करके सभी पार्टीजन दम साधकर इंतजार कर रहे हैं कि कब पार्टी इस संकट से बाहर निकले और भाजपा सहित ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट को धूल चटा दी जाए।

कमलनाथ सरकार सांसत में है। बेचारी, ‘मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है’ वाली तर्ज पर चुपचाप यह सब देखने को मजबूर है। मुख्यमंत्री की स्थिति देखकर यह आशा जगी है कि मीडिया की कुछ बची-खुची ताकत अब भी जिंदा है। दिसंबर, 2018 के मध्य से लेकर कुछ दिनों पहले तक मीडिया को हेय दृष्टि से देखने वाले नाथ अब अखबारों को इंटरव्यू दे रहे हैं। टीवी कैमरों पर पूरी शालीनता के साथ सरकार के मजबूत होने का दावा कर रहे हैं। सरकार और कांग्रेस के वल्लभ भवन से लेकर शिवाजी नगर स्थित मुख्यालय तक के तमाम फूले हुए गुब्बारे पिचके गाल के साथ अब मीडिया से बेहद सभ्यता के साथ पेश आ रहे हैं। भूल सुधारने के यह जतन उस समय किए गए, जब ऐसी अनंत भूलों के बीच भोपाल की बड़ी झील में अरबों-खरबों गैलन पानी बह चुका है। सोमवार को यदि सरकार के भविष्य पर फैसला नहीं हुआ तो समझ लीजिए कि बमुश्किल कुछ दिन के दांव पेंचों में मामला और खिंच पाएगा। फिलहाल नाथ सरकार के लिए ‘दिवस का अवसान समीप था…’ वाले हालात दिख रहे हैं। अब वह बकरे की मां वाला मामला बनता है या कुछ और, यह देखने वाली बात होगी।

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