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बचें ऐसी एजेंडामयी मूर्खता से

वह करीब बीस साल के मेरे खास परिचितों में शामिल हैं। आर्थिक स्थिति के लिहाज से ‘खाते-पीते घर’ के हैं। पारिवारिक पृष्ठभूमि के नजरिये से समझदार माता-पिता की पढ़ी-लिखी संतान हैं। मृदुभाषी हैं और स्वभाव से भी सुलझे लोगों की जमात में बे-शक उनका शुमार किया जा सकता है। इसलिए आज जब सोशल मीडिया पर इस दोस्त की सक्रियता देखी तो माथा ठनक गया। क्योंकि मामला धारणाओं के विखंडन वाला था। दोस्त ने जो लिखा उसका सार यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच अप्रैल वाले नौ मिनट के ब्लैकआउट का आव्हान ‘साजिशन’ किया है। वे इसके जरिये ये ‘जासूसी’ करवाएंगे कि देश में कौन-कौन लोग उनकी बात नहीं मान रहे हैं। समझ में नहीं आ रहा कि इस मामले में क्या प्रतिक्रिया दूं

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ हुए अनाचार पर शोक जताऊं, या फिर यह सोचकर खुद को बहला लूं कि दोस्त ने दुनिया को मूर्खों की नयी प्रजाति का साक्षात परिचय करने का सुअवसर प्रदान कर दिया है। हद है इस किस्म के विचारों की और अमर्यादित, असंस्कारित आचरण के सार्वजनीक एलान की। सच कहूं तो ऐसी भावनाओं का विस्तार भी कोरोना वायरस के संक्रणम के खतरे से कम नहीं है। खतरे की बात ये कि ऐसी बात रखने वाले वैसे ही ‘ट्रेंड’ श्रेणी के लोग हैं, जिनकी तरह ही पढ़े-लिखे कई लोग आतंकवाद से जुड़कर दुनिया के सामने नयी मुसीबत खड़ी कर चुके हैं। बेवकूफी का मानो सिलसिला चल रहा है।

कोई यह तक कह रहा है कि इंदौर में मेडिकल टीम पर इसलिए हमला किया गया कि उसके लोग इलाज/जांच के नाम पर लोगों के शरीर में कोरोना के वायरस का प्रसार करने की नीयत से गए थे। मुझे नहीं लगता किचिकित्सा जैसे पवित्र पेशे पर इतने पेशेवर तरीके से कहीं और हमला किया गया होगा। चालीस से लेकर पचास के दशक तक चली चीन और जापान की लड़ाई में हुआ एक रोचक घटनाक्रम पढ़ने को मिला। डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनीस से जुड़ा मामला है। कहा जाता है कि उनके सामने चीन के मजदूरों का एक दल गैंती और फावड़ा लेकर जापान का मुकाबला करने के लिए तैयार मिला था। उनका कहना था कि यहां हथियार नहीं, बल्कि उनका जज्बा जापान पर भारी पडेगा। आयरलैंड की एक युवती की प्रभावित करने वाली कहानी भी सोशल मीडिया पढ़ने को मिली थी।

जिसने विरोधी पक्ष से अपने प्रेमी की जान बचाने के लिए तब तक बन्दूक चलायी, जब तक वह खुद नहीं मर गयी। चीनियों की बगैर हथियार के पराजय और इस युवती कि बगैर किसी मदद के मौत तय थी, लेकिन दोनों ही मामले भीतर तक प्रभावित करते हैं। क्योंकि वे उम्मीद जगाते हैं। सकारात्मक भावनाओं का प्रसार करते हैं। यही तो मोदी भी करना चाह रहे हैं। शनिवार की रात नौ मिनट का ब्लैकआउट उन दीयों, मोमबत्ती या मोबाइल फोन की टार्च से दूर करने का आव्हान कोरोना वायरस के अन्धकार को सामूहिक चुनौती देने जैसा जतन ही तो है। यकीनन ऐसा करने से कोरोना वायरस का बाल भी बांका नहीं होगा। लेकिन कम से कम यह तो होगा ही कि लोग खुद को नयी ताकत और आत्मविश्वास से भरा पाएंगे।

यदि सारा देश उन नौ मिनट में एक साथ बिजली की बजाय अन्य संसाधनों की रोशनी में झिलमिलायेगा तो इससे कोरोना के विरुद्ध देश के एकजुट होने की भावना का प्रसार होना निश्चित है। इस समय देश को स्वनियंत्रण की जरूरत है। और इसकी जरूरत लंबे समय तक महसूस होगी। आखिर देश को कब तक लाकडाउन रखा जा सकेगा। ध्यान रखिये कि मोदी के लाक डाउन के सकारात्मक प्रभाव की सारी दुनिया तारीफ कर रही है। निश्चित तौर पर हमारे पास बड़ी संख्या में जांच के पर्याप्त साधन नहीं है, इसलिए हो सकता है कि कोरोना प्रभावितों का आंकड़ा धीरे-धीरे बढ़ता नजर आ रहा हो। लेकिन इस 21 दिन के लाकडाउन ने वाकई कोरोना को प्रसार को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अब इसके बाद जब सतर्कता और नई परेशानियों का दौर सामने होगा तो देश की भावनात्मक एकता ही लड़ने की ताकत देगी। तो कुछ एजेंडामयी लोगों की घातक मूर्खता को नजरंदाज कर तैयार हो जाइये उस पल के लिए जो रविवार की रात नौ बजे आपका इंतजार करेगा।

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I am Brajesh Arya

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