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मध्यप्रदेश या मद्यप्रदेश…! – प्रकाश भटनागर

पता नहीं, मध्यप्रदेश को मद्यप्रदेश बनाने की कोशिशों में कितनी कामयाबी मिल पाएगी, लेकिन मामला है उलझा हुआ। शराब की उपदुकानों तथा तस्करी के लिहाज से संवेदनशील जिले में अंग्रेजी शराब गोदाम की आड़ में सुरा रूपी असुरा को राज्य की रग-रग में उतारने का प्रयास यदि राजस्व प्राप्ति के लिहाज से उचित है, तो राजधर्म के नजरिये से इसे सौ फीसदी अनुचित ही कहा जा सकता है। नीतिश कुमार ने हाल ही में दावा किया है कि बिहार में नशाबंदी के बावजूद सरकार की आय में कमी नहीं आयी है। गुजरात में तो शराब पर लंबे समय से रोक है लेकिन इसका सरकारी खजाने पर विपरीत असर होता नहीं दिखता है। चलिए, मध्यप्रदेश में नशाबंदी लागू ना भी की जाए, किंतु शराब की नदियां बहाने जैसी स्थिति को बनने से तो रोका ही जा सकता है

पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान सरकार ने भी शराब की दुकानों को कम करने की दिशा में कदम उठाए थे, लेकिन अब मामला उलटा हो गया है। इतना उलटा कि इसकी नींव में कुछ गलत इरादे और भविष्य की भयावह आशंकाएं भी साफ दिख रही हैं। मसलन, झाबुआ में देशी शराब का वेयर हाउस पहले से ही है, अब विदेशी शराब के वहां संग्रहण का इंतजाम कर दिया गया है। इंदौर प्रदेश का इकलौता ऐसा संभाग होगा जहां विदेशी मदिरा के तीन सरकारी गोदाम हो जाएंगे। जाहिर है कि यह प्रयास मालवा से गुजरात तक के बीच शराब तस्करों के लिए ‘गोल्डन गेट’ बनाने में सफल हो सकता है। सरकार क्लस्टर बनाकर शराब के कारोबार में जो प्रयोग कर रही है, उससे यही होगा कि आने वाले समय में दारू लॉबी शासन व्यवस्था पर हावी हो जाएगी।

सरकार यह भूल कर रही है कि शराब तस्करी के साथ कब हथियारों की तस्करी शुरू हो जाएं या फिर आतंकवाद पैर पसार लें, इसका भरोसा नहीं। गुजरात के शराब तस्कर अब्दुल लतीफ और उज्जैन जिले के महिदपुर के एक गांव के कुएं में मिले खतरनाक हथियारों के मिलने की अतीत की घटना को सरकार के एक बार खंगाल लेना चाहिए। कमलनाथ के जो मंत्री इस कदम का विरोध कर रहे हैं, उनकी इस बात में पूरा दम है कि इससे सरकार की छवि पर विपरीत असर होगा। उनकी यह आशंका भी पूरी तरह जायज दिखती है कि इससे शराब की तस्करी को बढ़ावा मिलेगा। मामला केवल तस्करी का नहीं है। सुरा के अवैध व्यापार से वह गैंग वार भी जन्म लेता है, जो भयावह मानवीय तथा नैतिक नुकसान का कारण बन जाता है। होना यह चाहिए था कि सरकार शराब की दुकानें कम करने की नीति पर काम करती। यह सुनिश्चित करती कि इस बुराई से समाज को बचाने के लिए जागरूकता का प्रसार किया जाए।

और नहीं कुछ तो कम से कम बिहार और गुजरात के मॉडल का अध्ययन ही करवाया जा सकता था। इसका कोई उपक्रम नहीं किया गया। वजह शायद यह कि इन दोनों राज्यों में वह सरकारें हैं, जिनसे कांग्रेस का घोर वैचारिक मतभेद है। लेकिन यदि ऐसा नहीं किया गया तो जो करने की कोशिश हो रही है, वह भी तो उचित प्रतीत नहीं होती। शराब बंदी के विरोध में भी तर्क दिए जा सकते हैं लेकिन बढ़ावे का समर्थन करना तो मुश्किल है। दरअसल, सरकार भ्रम की शिकार दिख रही है। नाथ की नीतियों की धज्जियां उड़ने में देर नहीं लगती। पुरुषों की नसबंदी संबंधी आदेश भी इसकी मिसाल है। महज 11 दिन में सरकार को इससे संबंधित सर्कुलर वापस लेना पड़ गया। यह कदम उसी तरह बिना सोचे-समझे उठाया गया था, जैसा शराब की नयी दुकानों एवं वेयरहाउस के मामले में होता दिख रहा है। ऐसा ही आंगनबाड़ियों में अंडे दिए जाने संबंधी विचार का हश्र हुआ।

हर ओर अनिश्चय का ऐसा कुहासा किसी सरकार के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता है। नाथ के सामने यूं ही अंदरूनी और बाहरी चुनौतियों की कमी नहीं है। उस पर यदि इसी तरह के घटनाक्रम सामने आते रहे तो यह सरकार अपनी गंभीरता का ऐसा क्षरण करेगी, जिसकी भरपाई शायद लम्बे समय तक संभव नहीं हो सके। शायद नाथ भी ऐसे हालात को भांप गये हैं। गुरूवार को छिंदवाड़ा में उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर सबूत मांगने वाली शैली में बात रखी, उससे यही लगता है कि मुख्यमंत्री भी शराब कांड से हो रही फजीहत से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश में जुट गये हैं। अखबारों में ब्लाग के जरिए बताने की कोशिश हो रही है कि प्रदेश के आर्थिक हालत खराब हैं। लेकिन अकेला शराब कारोबार तो सरकार को आर्थिक मुसीबतों से उबार नहीं लेगा। सर्जिकल स्ट्राइक की बात ऐसे समय कही गयी, जब उससे जुड़ा कोई मुद्दा ही नहीं चल रहा है। मुख्यमंत्री को चाहिए कि निर्णयों एवं नीतियों को पहले अपने विवेक की तराजू में तौलें और फिर उन पर कदम आगे बढ़ाएं। अफसरों और चंद खास लोगों की बात में आकर ऐसे गलत फैसले करने एवं फिर उन पर यू-टर्न लेने का यही सिलसिला जारी रहा तो नाथ की नेतृत्व क्षमता पर गंभीर सवालिया निशान लगना तय है।

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