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सबब इस नतीजे के – प्रकाश भटनागर

दिल्ली ने एक बार फिर अपने दिल के दरवाजे अरविंद केजरीवाल के संयोजकत्व वाली आम आदमी पार्टी के लिए खोल दिए। बीते चुनाव के मुकाबले महज चार सीटों का जो नुकसान इस दल ने उठाया, वह नाममात्र के और काफी हद तक बेकार लाभ की शक्ल में भाजपा को मिल गयीं। कांग्रेस के लिए शून्य के रूप में यहां अंडे का ऐसा फंडा दिखा, जो इस दल की वर्तमान शोचनीय दशा को एक बार फिर रेखांकित कर रहा है। वस्तुत: हुआ यह कि जिस विकास को नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह की मल्टी स्टारर मूवी में राष्ट्रवाद के नाम पर आइटम सॉन्ग की हैसियत तक सीमित कर दिया गया, उसी विकास को छोटे स्तर पर ही सही, किंतु सार्थक मायनों में ‘आप’ ने दिल्ली की जनता के समक्ष पेश किया। मोहल्ला क्लीनिक हो या फिर हो सरकारी स्कूलों की अकल्पनीय सुधरी हुई छवि, अरविंद केजरीवाल की पार्टी के इन कदमों को जनता ने पसंद किया

यकीनन महिलाओं के लिए मेट्रो तथा बसों के मुफ्त सफर की सौगात भी इस दल को लाभ दिला गुजरी। लेकिन यदि आप यह मानते हैं कि यह शाहीन बाग की जीत है, तो शायद यह ठीक नहीं होगा। क्योंकि वह कांग्रेस सत्तर सदस्यीय विधानसभा में एक बार फिर एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी है, जिसने सीएए के खिलाफ तथा शाहीन बाग के पक्ष में सक्रियता दिखाने का कोई मौका नहीं चूका। प्रियंका वाड्रा जामिया मिल्लिया इस्लामिया तथा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की उस भीड़ के साथ कदमताल करती दिखीं, जिस पर सीएए के समर्थन में कश्मीर के अलगववादियों के सदृश गतिविधियां संचालित करने का आरोप लगा। खुद सोनिया गांधी ने सीएए का उग्र विरोध करने वालों के समर्थन में बयान देने में गुरेज नहीं किया। यकीनन, पार्टी का प्रयास था कि इस तरीके से वह तुष्टिकरण की सियासत के अपने पुराने तजुर्बे का लाभ उठा सकेगी।

किंतु ऐसा नहीं हुआ। जबकि नागरिकता संशोधन कानून पर केजरीवाल ने बहुत संभलकर पत्ते खोले। उलटे गृह मंत्री अमित शाह को चेतावनी दे डाली कि वे शाहीन बाग के आंदोलनकारियों पर कार्रवाई कर के दिखा दें। यह कार्रवाई न तो केजरीवाल करना चाहते थे और न ही केंद्र ने ऐसा करने में रुचि ली। अंतत: फायदा केजरीवाल को हो गया। आज यकीनन कांग्रेस के वे रणनीतिकार सिर धुन रहे होंगे, जिन्होंने विधानसभा चुनाव के पहले पूरे गुमान में आकर कह दिया था कि ‘आप’ के साथ कोई सियासी गठबंधन नहीं किया जाएगा। भाजपा ने अनंत गलतियां कीं। इनमें से कई को मूर्खता भी कहा जा सकता है। सबसे प्रलयंकारी बेवकूफी यह कि केजरीवाल जैसी कठोर छवि वाले शख्स के सामने उसने मनोज तिवारी को प्रमुख चेहरा बनाया।

पार्टी ने यह सोचने का जतन ही नहीं किया दिल्ली की जिस जनता ने जिस ‘आप’ का गये चुनाव में वरण किया था, उसके मुख्यमंत्री के सामने तिवारी की हैसियत ना के बराबर है। तिवारी अच्छे गायक हो सकते हैं, अभिनय का भी कुछ हुनर उन्हें मिला है, सियासत तथा पद किस्मत से उनके हिस्से आ गये। लेकिन उस विजन तथा मिशन जैसी अवधारणा तो तिवारी को छूकर भी नहीं गयी है, जिसके केजरीवाल धनी हैं। भाजपा के इस प्रदेशाध्यक्ष ने मोदी लहर की नाव पर सवार होकर इस चुनाव में विजयश्री का वरण करना चाहा और उनकी यह कश्ती ‘आप’ के चक्रवाती तूफान की शिकार होकर ऐसी डूबी कि अब उसका फिर तैरते नजर आ पाना आसान नहीं दिख रहा है। जी हां, यह चर्चा आम है कि बहुत जल्दी इन महाशय की दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष के पद से छुट्टी हो सकती है।

आगे गलतियों का जिक्र करें तो अमित शाह की शाहीन बाग तक करंट की चाह, अनुराग ठाकुर का गोली मार बयान योगी आदित्यनाथ का हनुमान चालीसा संबंधी कटाक्ष, आदि को जनता ने सिरे से खारिज कर दिया। एक विश्लेषण बड़ा रोचक बन पड़ा है। वह यह कि जिस दिल्ली से लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए जमकर लाड़ बरसा, उसी क्षेत्र ने विधानसभा के रण में इस दल को सांत्वना पुरस्कार सरीखा प्रतिसाद देकर क्यों टरका दिया। सवाल यह भी कि ऐसा क्या हो गया कि देश के दिल ने कांग्रेस से बेइज्जती भरी बेदिली वाला व्यवहार कायम रखा है? इनका जवाब केजरीवाल की उस कार्यशैली में छिपा है, जो यकीनन अब इन दोनो दलों के लिए अबूझ पहेली और झुंझलाहट की वजह बन गयी है। दिल्ली में कांग्रेस के खोने को वैसे भी कुछ नहीं था। पाने की चाह में भाजपा बावली हो उठी थी। इसलिए यह नतीजा कांग्रेस की बेहद शर्मनाक पराजय के बावजूद भाजपा के लिए अधिक झटके का सबब है। शायद मोदी का जादू ढलने लगा है। संभवत: अमित शाह की रणनीति नाकामियों का पर्याय बन गयी हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के बाद इस परिणाम को देखकर साफ है कि भाजपा को अपनी नीतियों और यकीनों, दोनो में ठोस बदलाव करने होंगे।

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