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सिंधिंया की बीजेपी में एंट्री से मंदसौर नीमच संसदीय क्षेत्र काँग्रेस को कितना हुआ नुकसान

मंदसौर। पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिधिंया की भाजपा में एंट्री से मालवा की राजनीति में भी उफान आ गया है। कुछ को छोड़ अधिकांश सिधिंया समर्थक खुले तौर पर कह चुके है कि जहां सिधिंया रहेंगे वहीं हम रहेंगे। वैसे भी रियासतकाल से अब तक के सफर में सिधिंया घराने का हमेशा से ही मालवा से गहरा नाता रहा है।

राजमात विजियाराजे सिधिंया से लेकर माधवराव सिधिंया व अब ज्योतिरादित्य सिधिंया की मालवा में गहरी पैठ है तो समर्थकों से सीधा जुड़ाव है। ऐसे में सिधिंया की एंट्री से एक दिन में ही राजनीति के समीकरण बदल गए है। जिसका आने वाले निकाय से लेकर पंचायत व मंडी चुनाव में सीधा असर होगा।

कांग्रेस में चल रहे अंर्तकलह का असर जिले में भी दिख रहा है। बागी हुए विधायकों में एक जिले के सुवासरा विधायक हरदीपसिंह डंग है तो सिंधिया समर्थकों की भी अच्छी खासी संख्या भी जिले में हैं। हालांकि जिले से अभी ज्यादा इस्तीफे सामने नहीं आए हैं। सिंधिया से जुड़े कुछ खास लोगों ने ही अपने इस्तीफे देने की घोषणा की हैं। वहीं जिला कांग्रेस अध्यक्ष प्रकाश रातड़िया की माने तो मंदसौर जिले में सभी कार्यकर्ता व नेता कांग्रेस के पास ही है।

जिला कांग्रेस अध्यक्ष श्री प्रकाश रातड़िया ने बताया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया व कतिपय विधायकों के कांग्रेस से त्यागपत्र के संदर्भ में कहा है कि जिले के कांग्रेसजन विचारधारा व सेवाभाव के आधार पर कांग्रेस में हैं किसी व्यक्ति विशेष के साथ नहीं हैं। कांग्रेस पार्टी, समाजवाद व धर्म निरपेक्षता के सिद्घांतों के आधार पर देश की उन्नति में लगी है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के आधार पर पार्टी छोड़ना उचित नहीं है। भाजपा ने जो षड़यंत्र किया उससे सतर्क रहते तो यह स्थिति नहीं बनती। सिद्घांत व सेवा की राजनीति करने वाला कोई कांग्रेसजन इस निर्णय का अनुमोदन नहीं करेगा।

जावद- नीमच जिले की इस सीट पर सिधिंया समर्थकों का दबदबा रहा है। सिधिंया खेमे के रघुराजसिंह चौरडिय़ा कांग्रेस के टिकिट पर चुनाव लड़ें तो उन्हीं के खेमे के समंदर पटेल भी यहां की निर्दलीय चुनाव लड़ चुके है। ऐसे में हर चुनाव में सिंधिंया खेमे की यहा निर्णायक भूमिका होती है।

मनासा- इस सीट पर सिङ्क्षधया खेमे के विजेंद्रसिंह मालाहेड़ा पूर्व में विधायक रह चुके है। ऐसे में इस क्षेत्र में सिधिंया के दौरें भी लगातार होते रहे और यहां मालाहेड़ा के साथ सिधिंया गुट का प्रभाव हमेशा रहा है।

जावरा- इस सीट पर सिधिंया के सबसे करीबी महेंद्रसिंह कालूखेड़ा का लंबे समय से प्रभाव रहा है। उनके निधन के बाद केकेसिंह कालूखेड़ा ने पिछले विधानसभा चुनाव लड़ा था। कालूखेड़ा से नजदीकियों के कारण इस सीट पर हमेशा से सिधिंया का सीधा जुड़ाव रहा है। ऐसे में सिधिंया का यहां आना-जाना हमेशा ही लगा रहता है।

मल्हारगढ़- 2018 के विधानसभा चुनाव में सिधिंया कोटे से टिकिट लाकर परशुराम सिसौदिया यहां से चुनाव लड़े थे। इस क्षेत्र में सिधिंया के समर्थक भी कई है। ऐसे में यहां के समीकरण भी बदलेंगे।

सुवासरा- इस सीट पर सिधिंया गुट अब तक तो प्रत्यक्ष रुप से प्रभावी नहीं रहा है, लेकिन विधायक हरदीपसिंह डंग के इस्तीफा देकर सिधिंया के बाद उनके द्वारा भी बीजेपी ज्वाइन करने की इच्छा जताने और प्रदेश में चल सियासी घटनाक्रम के बाद माना जा रहा है कि डंग की सिधिंया से नजदीकियां बढ़ी और उनके साथ ही वह बीजेपी तक पहुंचे। सिंधिंया के करीबी केके ङ्क्षसह कालूखेड़ा के इस क्षेत्र में कई समर्थक है। यहां पर राजपूत मतदाता भी बड़ी संख्या में है।

पूरे मालवा में है सिधिंया के समर्थक
मालवा क्षेत्र में सिधिंया की गहरी पेठ होने के साथ उनके दौरें यहां होते रहते है। संसदीय क्षेत्र की इन सीटों के अलावा भी मंदसौर से लेकर नीमच व गरोठ सहित पूरे क्षेत्र में सिधिंया के कई समर्थक है। हर बार अपने दौरे और सभा में सिधिंया मालवा से परिवार का रिश्ता जोड़ते है। मालवा को अपना परिवार बताने वाले सिधिंया के भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस ही नहीं भाजपा में भी सभी सीटों पर राजनीतिक समीकरण बदलने लगी है और मालवा के भाजपा बाहुल्य इस क्षेत्र की राजनीति में दोनों ही दलों के समीकरण तेजी से बदल रहे है।

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