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हिन्दू नववर्ष vs अंग्रेजी ईसाई (New Year)

एक जनवरी से प्रारम्भ अंग्रेजी नव वर्ष को हम इतना महत्व देते हैं पर क्या अपनी महान एवं सनातन संस्कृति से जुड़े नव वर्ष की तरफ भी हमारा वही भाव वही समर्पण बन पाता है ! …नहीं, पर आखिर क्युं ऐसा है? हमारी नयी पीढ़ी को अपनी प्राचीन एवं अतुलनीय संस्कृति को संभालना एवं ससम्मान इसका प्रचार भी करना होगा क्योंकि ये “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात करती है।
आइये अब थोड़ा नव वर्ष की परम्परा पर भी चर्चा कर ली जाय।
एक जनवरी से प्रारंभ होने वाली काल गणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैं जिसका सम्बन्ध ईसाई जगत व ईसा मसीह से है । इसे रोम के सम्राट जुलियस सीज़र द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष बाद प्रचलन में लाया गया । भारत में ईस्वी संवत् का प्रचलन अंग्रेजी शासको ने 1752 में किया । 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था किन्तु 18 वीं शताब्दी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी । जनवरी से जून रोमन के नामकरण रोमन जोनस,मार्स व मया इत्यादि के नाम पर हैं ।
 
 
जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उसके पौत्र आगस्टन के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासो के आधार पर रखे गये हैं ।
क्या ये आधार सही है? काल गणना का आधार तो ग्रहो और नक्षत्रो की स्थिती पर आधारित होनी चाहिये।
ग्रेगेरियन केलेण्ड़र की काल गणना मात्र दो हजार वर्षो की अतिअल्प समय को दर्शाती है । जबकि यूनान की काल गणना 1582 वर्ष, रोम की 2757 वर्ष, यहूदी 5768, मिस्त्र की 28691, पारसी 198875 तथा चीन की 96002305 वर्ष पुरानी है । इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष है । जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं । हमारे प्राचीन ग्रंथो में एक एक पल की गणना की गई है ।
दो हजार वर्ष पहले शकों ने सौराष्ट्र और पंजाब को रौंदते हुए अवंतिका पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की। विक्रमादित्य ने राष्ट्रीय शक्तियों को एक सूत्र में पिरोया और शक्तिशाली मोर्चा खड़ा करके ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की। थोड़े समय में ही इन्होंने कोंकण, सौराष्ट्र, गुजरात और सिंध भाग के प्रदेशों को भी शकों से मुक्त करवा लिया। वीर विक्रमादित्य ने शकों को उनके गढ़ अरब में भी करारी मात दी। इसी सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर भारत में विक्रमी संवत प्रचलित हुआ। सम्राट पृथ्वीराज के शासनकाल तक इसी संवत के अनुसार कार्य चला। इसके बाद भारत में मुगलों के शासनकाल के दौरान सरकारी क्षेत्र में हिजरी सन चलता रहा। भारतीय सरकार ने शक संवत को अपनाया।
जिस प्रकार ईस्वी संवत् का सम्बन्ध ईसा से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मोहम्मद से है । किन्तु विक्रम संवत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न होकर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रम्हाण्ड़ के ग्रहो व नक्षत्रो से है । इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है । इतना ही नहीं, ब्रम्हाण्ड़ के सबसे पुरातन ग्रंथो वेदो में भी इसका वर्णन है । नव संवत् यानि संवत्सरो का वर्णन यजूर्वेद के 27 वें व 30 वें अध्याय ले मंत्र क्रमांक क्रमशः 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है । विश्व को सौर मण्ड़ल के ग्रहों व नक्षत्रो की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिती पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग पर आधारित है ।
इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्यात्य देशो के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारंभ करने की बात हो हम एक कुशल पंड़ित के पास जाकर शुभ मुहूर्त पुछते हैं । और तो और, देश के बड़े से बड़े राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतज़ार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचाग पर आधारित होता है । भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम शुभ मुहूर्त में किया जाए तो उसकी सफलता में चार चाँद लग जाते हैं । अतः यह स्पष्ट है कि भारतीय नववर्ष मनाना ईसाई नववर्ष मनाने से पुर्णरूपेण श्रेष्ठ है ।
भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व :
वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।
1. यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इस दिन से एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 109 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की।
2. विक्रमी संवत का पहला दिन: उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो, और न ही कोई भिखारी हो। साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो। सम्राट विक्रमादित्य ने 2067 वर्ष पहले इसी दिन राज्य स्थापित किया था।
3. प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिये चुना।
4. नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।
5. गुरू अंगददेव प्रगटोत्सव : सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्म दिवस।
6. समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
7. संत झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।
8. शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिनवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
9. युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5112 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।
भारतीय सांस्कृतिक जीवन का विक्रमी संवत् से गहरा नाता है। भरतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है जिसे विक्रम संवत् का नवीन दिवस भी कहा जाता है । स्वामी विवेकानन्द ने कहा था – यदि हमें गौरव से जीने का भाव जगाना है, अपने अन्तर्मन में राष्ट्र भक्ति के बीज को पल्लवित करना है तो राष्ट्रीय तिथियों का आश्रय लेना होगा। गुलाम बनाए रखने वाले परकीयों की दिनांकों पर आश्रित रहनेवाला अपना आत्म गौरव खो बैठता है। यह दिन हमारे मन में यह उदघोष जगाता है कि हम पृथ्वी माता के पुत्र हैं, सूर्य, चन्द्र व नवग्रह हमारे आधार हैं प्राणी मात्र हमारे पारिवारिक सदस्य हैं। तभी हमारी संस्कृति का बोध वाक्य ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम‘‘ का सार्थक्य सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि सामाजिक विश्रृंखलता की विकृतियों ने भारतीय जीवन में दोष एवं रोग भर दिया, फलतरू कमजोर राष्ट्र के भू भाग पर परकीय, परधर्मियों ने आक्रमण कर हमें गुलाम बना दिया। सदियों पराधीनता की पीड़ाएं झेलनी पड़ी। पराधीनता के कारण जिस मानसिकता का विकास हुआ, इससे हमारे राष्ट्रीय भाव का क्षय हो गया और समाज में व्यक्तिवाद, भय एवं निराशा का संचार होने लगा। जिस समाज में भगवान श्रीराम, कृष्ण, बुद्ध महावीर, नानक व अनेक ऋषि-मुनियों का आविर्भाव हुआ। जिस धराधाम पर परशुराम, विश्वामित्र, वाल्मिकी, वशिष्ठ, भीष्म एवं चाणक्य जैसे दिव्य पुरुषों का जन्म हुआ। जहां परम प्रतापी राजा-महाराजा व सम्राटों की श्रृंखला का गौरवशाली इतिहास निर्मित हुआ उसी समाज पर शक, हुण, डच, तुर्क, मुगल, फ्रांसीसी व अंग्रेजों जैसी आक्रान्ता जातियों का आक्रमण हो गया। यह पुण्यभूमि भारत इन परकीय लुटेरों की शक्ति परीक्षण का समरांगण बन गया और भारतीय समाज के तेजस्वी, ओजस्वी और पराक्रमी कहे जाने वाले शासक आपसी फूट एवं निज स्वार्थवश पराधीन सेना के सेनापति की भांति सब कुछ सहते तथा देखते रहे। जो जीत गये उन्होनें हम पर शासन किया और अपनी संस्कृति अपना धर्म एवं अपनी परम्परा का विष पिलाकर हमें कमजोर एवं रुग्ण किया। किन्तु इस राष्ट्र की जिजीविषा ने, शास्त्रों में निहित अमृतरस ने इस राष्ट्र को मरने नहीं दिया। भारतीय नवसम्वत के दिन लोग पूजापाठ करते हैं और तीर्थ स्थानों पर जाते हैं। लोग इस दिन तामसी पदार्थों से दूर रहते हैं, पर विदेशी नववर्ष के आगमन से घंटों पूर्व ही मांस मदिरा का प्रयोग, अश्लील-अश्लील कार्यक्रमों का रसपान तथा बहुत कुछ ऐसा प्रारंभ हो जाता है जिससे अपने देश की संस्कृति का रिश्ता नहीं है। विक्रमी संवत के स्मरण मात्र से ही विक्रमादित्य और उनके विजय अभिमान की याद ताजा होती है, भारतीयों का मस्तक गर्व से ऊंचा होता है, जबकि ईसवी वर्ष के साथ ही दासता एवं गुलामी की बू आने लगती है।
मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नववर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था- किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नववर्ष से कोई संबंध नहीं। यही हम लोगों को भी समझना और समझाना होगा। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके ? आइये! विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।
जय हिन्द

हिंदू नव वर्ष – जानें नव संवत्सर का इतिहास और महत्व

वैसे तो दुनिया भर में नया साल 1 जनवरी को ही मनाया जाता है लेकिन भारतीय कैलेंडर के अनुसार नया साल 1 जनवरी से नहीं बल्कि चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से होता है। इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह अक्सर मार्च-अप्रैल के महीने से आरंभ होता है। दरअसल भारतीय कैलेंडर की गणना सूर्य और चंद्रमा के अनुसार होती है। माना जाता है कि दुनिया के तमाम कैलेंडर किसी न किसी रूप में भारतीय कैलेंडर का ही अनुसरण करते हैं। मान्यता तो यह भी है कि विक्रमादित्य के काल में सबसे पहले भारतीयों द्वारा ही कैलेंडर यानि कि पंचाग का विकास हुआ। इसना ही 12 महीनों का एक वर्ष और सप्ताह में सात दिनों का प्रचलन भी विक्रम संवत से ही माना जाता है। कहा जाता है कि भारत से नकल कर युनानियों ने इसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैलाया।

सप्तर्षि संवत है सबसे प्राचीन

माना जाता है कि विक्रमी संवत से भी पहले लगभग सड़सठ सौ ई.पू. हिंदूओं का प्राचीन सप्तर्षि संवत अस्तित्व में आ चुका था। हालांकि इसकी विधिवत शुरूआत लगभग इक्कतीस सौ ई. पू. मानी जाती है। इसके अलावा इसी दौर में भगवान श्री कृष्ण के जन्म से कृष्ण कैलेंडर की शुरुआत भी बतायी जाती है। तत्पश्चात कलियुगी संवत की शुरुआत भी हुई।

विक्रमी संवत या नव संवत्सर

विक्रम संवत को नव संवत्सर भी कहा जाता है। संवत्सर पांच तरह का होता है जिसमें सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास आते हैं। विक्रम संवत में यह सब शामिल रहते हैं। हालांकि विक्रमी संवत के उद्भव को लेकर विद्वान एकमत नहीं हैं लेकिन अधितर 57 ईसवीं पूर्व ही इसकी शुरुआत मानते हैं।

सौर वर्ष के महीने 12 राशियों के नाम पर हैं इसका आरंभ मेष राशि में सूर्य की संक्राति से होता है। यह 365 दिनों का होता है। वहीं चंद्र वर्ष के मास चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ आदि हैं इन महीनों का नाम नक्षत्रों के आधार पर रखा गया है। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है इसी कारण जो बढ़े हुए दस दिन होते हैं वे चंद्रमास ही माने जाते हैं लेकिन दिन बढ़ने के कारण इन्हें अधिमास कहा जाता है। नक्षत्रों की संख्या 27 है इस प्रकार एक नक्षत्र मास भी 27 दिन का ही माना जाता है। वहीं सावन वर्ष की अवधि लगभग 360 दिन की होती है। इसमें हर महीना 30 दिन का होता है।

हिंदू नव वर्ष का महत्व

भले ही आज अंग्रेजी कैलेंडर का प्रचलन बहुत अधिक हो गया हो लेकिन उससे भारतीय कलैंडर की महता कम नहीं हुई है। आज भी हम अपने व्रत-त्यौहार, महापुरुषों की जयंती-पुण्यतिथि, विवाह व अन्य शुभ कार्यों को करने के मुहूर्त आदि भारतीय कलैंडर के अनुसार ही देखते हैं। इस दिन को महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा तो आंध्र प्रदेश में उगादी पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही वासंती नवरात्र की शुरुआत भी होती है। एक अहम बात और कि इसी दिन सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। अत: कुल मिलाकर कह सकते हैं कि हिंदू नव वर्ष हमें धूमधाम से मनाना चाहिये।

निराधार अंग्रेजी नववर्ष और भारतीय संवत्सर का श्रेष्ठता और वरिष्ठता बोध…

भारत सदैव ही ‘विश्व-गुरु’ रहा है… फिर हम अपनी ‘सर्वश्रेष्ठता का गर्व’ क्यों ना करें.??
अंग्रेजी नववर्ष और पश्चिमी ‘असभ्यता’ का अन्धानुकरण करने वालो…
अपने अन्दर की छुपी हुई मानसिक कायरता की पीठ समय समय पर दिखाने वालो…
अंग्रेजो के मानसिक गुलामो… काले अंग्रेजो… विश्व की सवश्रेष्ठ सभ्यता भारतीय सभ्यता के बारे में भी जानो–

विक्रम संवत अथवा बिक्रम सम्बत कैलेण्डर भारत में सर्वाधिक प्रयोग होने वाला है जबकि यह नेपाल का आधिकारिक कैलेण्डर है…
विक्रम सम्वत की स्थापना उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने 56 ईसा पूर्व शकों पर अपनी विजय के बाद की थी…

इस विषय में समकालीन राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का नाम आता है जो गलत है…
यह चन्द्र पंचांग पर आधारित है और प्राचीन हिन्दू पंचांग और वैदिक समय के पंचांग का अनुसरण करता है… यह सौर गणना पर आधारित ग्रेगोरियन कैलेण्डर से 56.7 वर्ष वरिष्ठ है… और वरिष्ठता क्या होती है ये ओलम्पिक में सौ मीटर दौड़ स्पर्धा के द्वितीय स्थान पर आये धावक से पूछना.??
भारत में आधिकारिक रूप से शक संवत को मान्यता प्राप्त है… मगर भारतीय संविधान की ‘प्रस्तावना’ के हिंदी संस्करण में संविधान को अपनाने की तिथि 26 नवम्बर 1949 विक्रम संवत के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत 2006 है….
हिन्दू पंचांग हिन्दू समाज द्वारा माने जाने वाला कैलेंडर है.. इसके भिन्न-भिन्न रूप मे यह लगभग पूरे भारत मे माना जाता है… पंचांग नाम पांच प्रमुख भागों से बने होने के कारण है, यह है: पक्ष, तिथी, वार, योग और कर्ण… एक साल मे 12 महीने होते है… हर महिने मे 15 दिन के दो पक्ष होते है, शुक्ल और कृष्ण… पंचांग (पंच + अंग = पांच अंग) हिन्दू काल-गणना की रीति से निर्मित पारम्परिक कैलेण्डर या कालदर्शक को कहते हैं… पंचांग नाम पाँच प्रमुख भागों से बने होने के कारण है, यह है- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण… इसकी गणना के आधार पर हिंदू पंचांग की तीन धाराएँ हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति… भिन्न-भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है…
एक साल में 12 महीने होते हैं… प्रत्येक महीने में 15 दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण… प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं… इन दो अयनों की राशियों में 27 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं… 12 मास का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ… महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पैर रखा जाता है… यह 12 राशियाँ बारह सौर मास हैं… जिस दिन सूर्य जिस राशि मे प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है… पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र मे होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है… चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से 11 दिन 3 घड़ी 48 पल छोटा है… इसीलिए हर 3 वर्ष मे इसमे एक महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मास कहते हैं…
जिस तरह जनवरी अंग्रेज़ी का पहला महीना है उसी तरह हिन्दी महीनों में चैत वर्ष का पहला महीना होता है…
हम इसे कुछ इस तरह से समझ सकते हैं-
मार्च-अप्रैल                         -चैत्र (चैत)
अप्रैल-मई                   -वैशाख (वैसाख)
मई-जून                         -ज्येष्ठ (जेठ)
जून-जुलाई                 -आषाढ़ (आसाढ़)
जुलाई-अगस्त              -श्रावण (सावन)
अगस्त-सितम्बर           -भाद्रपद (भादो)
सितम्बर-अक्टूबर         -अश्विन (क्वार)
अक्टूबर-नवम्बर        -कार्तिक (कातिक)
नवम्बर-दिसम्बर      -मार्गशीर्ष (अगहन)
दिसम्बर-जनवरी                  -पौष (पूस)
जनवरी-फरवरी                   -माघ (माह)
फरवरी-मार्च                -फाल्गुन (फागुन)
आप सबसे अनुरोध है कि भारतीय नव वर्ष का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार और समर्थन करे…

शुभकामनाएं मध्य रात्रि में क्यों नहीं देनी चाहिए.??
संध्या काल के आरम्भ होते ही रज तम का प्रभाव वातावरण में बढ़ने लगता है अतः इस काल में आरती करते हैं और संध्या काल में किये गए धर्माचरण हमें उस रज तम के आवरण से बचाता है… परन्तु आजकल पाश्चात्य संस्कृति के अँधानुकरण करने के चक्रव्यूह में फंसे हिन्दू इन बातों का महत्व नहीं समझते… मूलतः हमारी भारतीय संस्कृति में कोई भी शुभ कार्य मध्य रात्रि नहीं किया जाता है परन्तु वर्तमान समय में एक पैशाचिक कुप्रथा आरम्भ हो गयी है और वह की लोग मध्य रात्रि में ही शुभकामनाएं देते हैं और और फलस्वरूप उन शुभकामनाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता… जैसे पाश्चात्य संस्कृति के अनुसार नववर्ष मनाते हैं और सभी लोग मध्य रात्रि में ही नए वर्ष की शुभकामनाएं देने लगते हैं… कारण है समाज में धर्म शिक्षण का अभाव है और ऊपर से मीडिया ने सर्व सत्यानाश कर रखा है आजकल गाँव में भी शहरों की तरह सब कुछ होने लगा है… हमारी भारतीय संस्कृति तम से रज और रज से सत्व और ततपश्चात त्रिगुणातीत होने का प्रवास सिखाती है परन्तु आज सात्विकता क्या है यह भी अधिकांश हिन्दुओं को पता नहीं है.??
हिन्दू पर्व मानव के मन में सात्विकता जगाते हैं, चाहे वे रात में हों या दिन में… जबकि अंग्रेजी पर्व नशे और विदेशी संगीत में डुबोकर चरित्रहीनता और अपराध की दिशा में ढकेलते हैं… इसलिए जिन “मानसिक गुलामों” को इस अंग्रेजी और ईसाई नववर्ष को मनाने की मजबूरी हो, वे इसका भारतीयकरण कर मनाएं व एक जनवरी को निर्धनों को भोजन कराएं, बच्चों के साथ कुष्ठ आश्रम, गोशाला या मंदिर में जाकर दान-पुण्य करें, 31 दिसम्बर की रात में अपने गांव या मोहल्ले में भगवती जागरण करें, जिसकी समाप्ति एक जनवरी को प्रातः हो, अपने घर, मोहल्ले या मंदिर में 31 दिसम्बर प्रातः से श्रीरामचरितमानस का अखंड पारायण प्रारम्भ कर एक जनवरी को प्रातः समाप्त करें, एक जनवरी को प्रातः सामूहिक यज्ञ का आयोजन करें, एक जनवरी को प्रातः बस और रेलवे स्टेशन पर जाकर लोगों के माथे पर तिलक लगाएं…

भारतीय संस्कृति के हित में इस कविता को भी याद रखना चाहिए-

अँग्रेजी सन को अपनाया, विक्रम संवत भुला दिया है…
अपनी संस्कृति, अपना गौरव हमने सब कुछ लुटा दिया है…
जनवरी-फरवरी अक्षर-अक्षर बच्चों को हम रटवाते हैं…
मास कौन से हैं संवत के, किस क्रम से आते-जाते हैं…
व्रत, त्यौहार सभी अपने हम संवत के अनुसार मनाते हैं…
पर जब संवतसर आता है, घर-आँगन क्यों नहीं सजाते…
माना तन की पराधीनता की बेड़ी तो टूट गई है…
भारत के मन की आज़ादी लेकिन पीछे छूट गई है…
सत्य सनातन पुरखों वाला वैज्ञानिक संवत अपना है…
क्यों ढोते हम अँग्रेजी को जो दुष्फलदाई सपना है…
अपने आँगन की तुलसी को, अपने हाथों जला दिया है…
अपनी संस्कृति, अपना गौरव, हमने सब कुछ लुटा दिया है…
सर्वश्रेष्ठ है संवत अपना हमको इसका ज्ञान नहीं हैं..

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