दिल्ली की धमक क्या मध्यप्रदेश में भी हलचल मचाएगी…?

अभी यह एक काल्पनिक सवाल है लेकिन आधारहीन नहीं। दिल्ली भले ही एक छोटी सी विधानसभा और केन्द्र शासित राज्य हो लेकिन यहां का चुनाव देश भर को प्रभावित करता है। आखिर मामला राष्ट्रीय राजधानी का जो ठहरा। एक्टिविस्ट से राजनेता बने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल में वो सारे गुण-अवगुण मौजूद हैं जो भारतीय राजनीति में टिके रहने के लिए जरूरी हैं। जिन उम्मीदों को जगा कर वे राजनीति में आए थे, जाहिर है उन्हें पूरा करने में वे खरे साबित नहीं हुए। जिन सीढ़ियों को सहारे वे आगे बढ़े थे, सबसे पहले केजरीवाल ने उन्हें ही ढहाया। प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, योगेन्द्र यादव के अलावा अन्ना हजारे जैसे कुछ उदाहरण तो मौजूद हैं ही। पिछले सात-आठ साल के उनके सार्वजनिक जीवन की ढेरों खामियां सबके सामने है। बावजूद आज केजरीवाल की तारीफ करने का दिल कर रहा है। पता नहीं आगे दिल्ली विधानसभा चुनाव कैसे और किन रास्तों से आगे बढ़ेगा।

केजरीवाल की तरफ से शुरूआत अच्छी हुई है। उन्होंने महत्वपूर्ण बात कही है, अगर हमने दिल्ली में काम किया है तो वोट देना, वरना नहीं। दूसरी महत्वपूर्ण बात जो केजरीवाल ने कही है, वो है कि आम आदमी पार्टी का चुनाव अभियान सकारात्मक होगा और पार्टी गालीगलौच नहीं करेगी। निश्चित तौर पर जिस तरह के बंपर बहुमत के साथ केजरीवाल एंड कंपनी ने दिल्ली की सत्ता हासिल की थी, उनसे अपेक्षा यहीं की जानी थी। आखिर पांच साल सरकार चलाने के बाद सत्तारूढ़ दलों को वोट अपने कामकाज के आधार पर ही मांगना चाहिए। पर हम देख रहे हैं कि ऐसा होता नहीं है। देश में वैकल्पिक राजनीति खड़ी करने की उम्मीद बने केजरीवाल जल्दबाजी में बहुत सारी गलतियां कर आखिर दिल्ली में सिमट गए तो यह भी अच्छा है। पैर फैलाने की कोशिश उन्होंने पंजाब, हरियाणा सहित देश भर में की थी लेकिन जल्दी ही उन्हें यह समझ आ गया एक्टिविस्टों और एनजीओ के भरोसे राजनीति नहीं होती है।

ना ही इसका कोई शार्टकट होता है। लिहाजा, आज आम आदमी पार्टी को दिल्ली के लिए क्षेत्रीय दल का दर्जा दिया जा सकता है। यहां अगर चाहे तो भाजपा भी दिल्ली महानगर पालिका में किए गए अपने कामों को वोट मांगने का आधार बना सकती है। लेकिन जब शाह और मोदी दिल्ली में चुनाव अभियान चलाएंगे तो जाहिर है उनके मुद्दे स्थानीय नहीं होंगे। तो दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार बहुत कुछ दांव पर होगा। केजरीवाल जरूर अपने काम पर वोट मांगेंगे लेकिन दिल्ली में असर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थन और विरोध का भी होगा। दिल्ली की बड़ी सिख अबादी इस समय मोदी शाह से प्रभावित होगी। संयोग देखिए कि दिल्ली चुनाव के ठीक पहले पाकिस्तान के ननकाना साहब गुरूद्वारा में जो घटा, उसने दिल्ली सहित देश भर में इस समुदाय को फिर झिंझोड़ा होगा। दिल्ली में मुस्लिम आबादी और भारी तादाद में बसे बिहारी भी चुनाव का एक महत्वपूर्ण फेक्टर हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में यह सब आप के समर्थन में थे। क्या इस बार ऐसा होगा? भाजपा के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल है। पिछली दफा भाजपा की इज्जत को बट्टा लगाने का काम दिल्ली विधानसभा से ही शुरू हुआ था, जहां उसे महज तीन सीटों पर जीत मिली थी। दांव पर कांग्रेस का भी भविष्य है। कांग्रेस पिछली बार शून्य थी और बीते लोकसभा चुनाव में उसे आप से ज्यादा वोट हासिल हुए थे। जाहिर है लोकसभा चुनाव के दौरान दिल्ली में मोदी और भाजपा विरोधी वोटों को यह समझ में आ गया था कि भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस को ही वोट देना मुफिद रहेगा। लेकिन अब विधानसभा में यह वोट फिर कांग्रेस के पास आएगा या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है? मोदी को अगर नीचा दिखाना है तो कांग्रेस को यहां फिर रणनीतिक तौर पर आप के सामने सरेंडर करना होगा। कांग्रेस अगर चुनाव जीतने के लिए जोर लगाएगी तो नतीजा होगा आम आदमी पार्टी का नुकसान और भाजपा का फायदा।

कांग्रेस के लिए इधर कुआं, उधर खाई वाले हालात हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में केजरीवाल के गिड़गिड़ाने तक की स्थिति में कांग्रेस ने आप से गठबंधन नहीं किया था। ऐसे में अगर कांग्रेस इस बार गठबंधन की कोशिश करती है तो उसके सामने बस केजरीवाल की शर्मनाक शर्तें ही होंगी। दिल्ली विधानसभा चुनाव मध्यप्रदेश को भी प्रभावित करेगा। दिल्ली दंगों का मामला सुप्रीम कोर्ट में है। 1984 दंगों के कुछ ऐसे प्रत्यदर्शियों के बयान के आधार पर एसआईटी को यदि एफआईआर करने की अनुमति मिलती है तो उसमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी लपेटे में आ सकते हैं। इसके अलावा मुझे लगता है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव तक भाजपा कमलनाथ सरकार को शायद छेड़ने की कोशिश नहीं करें। कर्नाटक और महाराष्ट्र के घटनाक्रम के बाद भाजपा नेतृत्व इस मामले में सर्तक हुआ है कि मध्यप्रदेश में अब मिस फायर की गुंजाइश नहीं है। इसके अलावा मध्यप्रदेश में एक मसला भाजपा के बीच नेता का भी फंसा है। लेकिन दिल्ली विधानसभा के संदर्भ में अगर सिख विरोधी दंगों में सुप्रीम कोर्ट में कुछ होता है तो इसकी धमक मध्यप्रदेश की राजनीति में निश्चित तौर पर सुनाई देगी।

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