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संपादकीय

सत्ता की दौड़ में पीछे रह गई प्रदेश की जनता…

सत्ता की दौड़ में पीछे रह गई प्रदेश की जनता...
ये सत्ता का नशा और उसकी लालसा… कुर्सी का खेल और कुर्सी बचाने के पीछे के किस्से… कुछ छनी-छनाई बाते और कुछ सामने आते राजनीतिक हथकंडे…!!! यह सब हुआ बीते मह...
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बचें ऐसी एजेंडामयी मूर्खता से

बचें ऐसी एजेंडामयी मूर्खता से
वह करीब बीस साल के मेरे खास परिचितों में शामिल हैं। आर्थिक स्थिति के लिहाज से ‘खाते-पीते घर’ के हैं। पारिवारिक पृष्ठभूमि के नजरिये से समझदार माता-पिता की पढ़ी-...
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ये गलती थी या साजिश! – प्रकाश भटनागर

ये गलती थी या साजिश! - प्रकाश भटनागर
इस दिशा में दिमाग चलने की केवल यह वजह नहीं है कि पत्रकारिता के लंबे दौर में क्राइम की खबरों पर भी खूब काम किया है। दिमाग का एक खास दिशा में जाना यूं भी हो रहा है कि वह पर...
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फिर पुराने ट्रैक पर चल पड़े ज्योतिरादित्य सिंधिया, क्या फिर से ठोकर खाएंगे

फिर पुराने ट्रैक पर चल पड़े ज्योतिरादित्य सिंधिया, क्या फिर से ठोकर खाएंगे
भोपाल। लोग ठोकर खाकर सीखते हैं। कोशिश करते हैं कि जिन परिस्थितियों ने जीवन में तनाव पैदा किया वैसी परिस्थितियां फिर से ना आए लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया शायद इस परंपरा के...
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उबाऊ होता है यह इंतजार…..

उबाऊ होता है यह इंतजार.....
सर्वोच्च अदालत का फैसला आने के बाद अब जाकर कहीं राहत मिली। इंतजार करना हमेशा से एक बोरिंग काम है। राजनीतिक घटनाक्रम भले ही कितना भी मनोरंजन करें पर इंतहा तो इंतजार की होत...
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बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी – प्रकाश भटनागर

बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी - प्रकाश भटनागर
राज्य में इस समय आनंद लेकर देखने को बहुत मसाला मौजूद है। याद करने को भी ढेर सारी बातें हैं। चाहें तो दोहरा लें, ‘बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी’ वाली लोकोक्ति। इच्छा हो तो...
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बुरा ना मानो होली है….. मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार पर संकट के बादल छाए

बुरा ना मानो होली है..... मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार पर संकट के बादल छाए
इतिहास अपने को दोहरा रहा लगता है। मध्यप्रदेश दूसरी बार ऐसी राजनीतिक अस्थिरता से दो-चार हो रहा है। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में डी पी मिश्रा की कमजोर बहुमत वाली कांग्रेस...
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कमलनाथ जी! आपका समय शुरू होता है अब – प्रकाश भटनागर

कमलनाथ जी! आपका समय शुरू होता है अब - प्रकाश भटनागर
मसला संजीदा है, लेकिन अधिक गंभीरता माहौल को कई बार बोझिल बना देती है। आज अगर यह कहूंगा कि ‘बुढ़िया मर गई गम नहीं, मगर मौत ने घर देख लिया’ तो सत्तासीन लोगों को...
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ये प्रायोजित अराजकता….. प्रकाश भटनागर

ये प्रायोजित अराजकता.....  प्रकाश भटनागर
देश की सबसे बड़ी अदालत को कहना पड़ गया कि दिल्ली में 1984 को दोहराने नहीं दिया जाएगा। साफ है कि मामला प्रायोजित अराजकता वाला है। मामला अपने-अपने राजनीतिक निहितार्थों की बलि...
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मध्यप्रदेश या मद्यप्रदेश…! – प्रकाश भटनागर

मध्यप्रदेश या मद्यप्रदेश...! - प्रकाश भटनागर
पता नहीं, मध्यप्रदेश को मद्यप्रदेश बनाने की कोशिशों में कितनी कामयाबी मिल पाएगी, लेकिन मामला है उलझा हुआ। शराब की उपदुकानों तथा तस्करी के लिहाज से संवेदनशील जिले में अंग्...
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ये रिश्ता क्या कहलाता है..! – प्रकाश भटनागर

ये रिश्ता क्या कहलाता है..! - प्रकाश भटनागर
काफी पहले एक कहानी पढ़ी थी। उसका मुख्य पात्र इस बात से लगातार परेशान रहता है कि वह खुश नहीं है। इस समस्या से निपटने की गरज से उठाये गये उसके सारे कदम नाकाम रहते हैं। वह ख...
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सबब इस नतीजे के – प्रकाश भटनागर

सबब इस नतीजे के - प्रकाश भटनागर
दिल्ली ने एक बार फिर अपने दिल के दरवाजे अरविंद केजरीवाल के संयोजकत्व वाली आम आदमी पार्टी के लिए खोल दिए। बीते चुनाव के मुकाबले महज चार सीटों का जो नुकसान इस दल ने उठाया,...
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कांग्रेस में अब सुनामी की जरूरत

कांग्रेस में अब सुनामी की जरूरत
दिल्ली में भाजपा एवं कांग्रेस के लिए ‘मारे गये गुलफाम’ वाली स्थिति के साथ ही अरविंद केजरीवाल की ‘तीसरी कसम’ का मार्ग प्रशस्त हो गया है। जो जीत गये, उनके लिए यह खुशी का सम...
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गजब की ये गला लगाई

गजब की ये गला लगाई
परस्पर लिपटकर स्नेह जताने की कला का कोई स्थापित नियम नहीं है। इसके लिए देश, काल तथा परिस्थिति जैसे अवयव भी तय नहीं किए गए हैं। बेशक ऐसे आपसी अभिवादन पर आप खुश हो सकते हैं...
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बंधे पत्थर और खुले कुत्तों वाला यह देश

बंधे पत्थर और खुले कुत्तों वाला यह देश
कहीं एक लतीफा पढ़ा था। देश के किसी पहाड़ी इलाके में घूमते विदेशी सैलानी पर कुत्ते भौंकने लगे। उसने कुत्तों को भगाने के लिए पत्थर उठाना चाहा। पत्थर जमीन में धंसा हुआ था। सैल...
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