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अंचल का गौरव नागेश्वर तीर्थ 

(योगेन्द्र जोशी)

होली का त्यौहार भारतीय संस्कृति के प्रमुख अवसरों में से एक है। प्रत्येक भारतवासी अपने तरीके से इस त्यौहार को मनाता है। प्रेम और सद्भाव की अभिव्यक्ति का यह निमित्त है। होली के 13 दिवसीय उत्सव के दौरान कई धर्म स्थलों पर श्रद्धालु पहुंचते और उत्सव के आध्यात्मिक पक्ष का आनन्द लेते है। रंग पंचमी 25 मार्च को आध्यात्मिक चेतना अभियान मंदसौर के 14 सदस्य, मालवांचल के राजस्थान में स्थित श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ तीर्थ उन्हेल के देव दर्शन हेतु गये थे।

हमारी यात्रा 25 मार्च सोमवार रंगपंचमी की सुबह 8 बजे प्रकाश रातड़िया के आफिस से कार द्वारा प्रारंभ हुई। जिसमें प्रकाश रातड़िया, कृष्णकुमार जोशी, यशवन्त प्रजापति, भेरूलाल पटेल, निर्मल मच्छीरक्षक, हरिश भावसार, प्रहलाद मालवी, मुकेश रत्नावत, भेरूलाल कुमावत, सुनील बड़ोदिया, हरिश साल्वी, रमेश ब्रिजवानी, प्रकाश कल्याणी और योेगेन्द्र जोशी यात्रीगण के रूप में सम्मिलित रहे। बिलांत्री के पास संकट मोचन हनुमान मंदिर में भगवान के दर्शन किये तथा वहां अंकित विचार ‘‘जैसी करनी वैसी भरनी’’ आज नहीं तो निश्चित कल’’ को सभी ने पढ़कर चिंतन किया और इस परिसर के आनन्दपूर्ण वातावरण से अभिभूत हुए। यात्रा आगे बढ़ी, हम लोग उन्हैल नागेश्वर धाम पहुंचे और अलौकिक प्रतिमा के दर्शन किये।

23वें तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ का अति प्राचीन विश्वप्रसिद्ध तीर्थ श्री नागेश्वर जो कि नागेश्वर पार्श्वनाथ के नाम से विख्यात है। मंदिर की सुन्दरता और पवित्रता देखते ही बनती हैं। इस धारा की पावनता मन मस्तिष्क को शांति और शकुन का परिचय कराती हैं। यह तीर्थ मंदिर झालावाड़ जिले की गंगधार तहसील के चौमहला स्टेशन से 16 किलोमीटर दूर स्थित है। यह मध्यप्रदेश एव ंराजस्थान की सीमा रेखा पर स्थित है। यह आलोट से 8 किमी की दूरी पर स्थित है।

भगवान श्री पार्श्वनाथ की अलौकिक चमत्कारी प्रतिमा कितनी प्राचीन हैं, उतनी ही चमत्कारी भी हैं, इसका इतिहास भी चमत्कारीक घटनाओं की श्रृंखलाओ ंसे जुड़ा हुआ है। आज से दो हजार नौ सौ वर्ष पूर्व पार्श्वकुमार संसार त्यागकर विहार करते हुए वाराणसी के वन में आये  और ध्यान करने लगे। उसी काल में धरगेन्द्र देव वहां आये और अपने परम् उपकारी प्रभु पर नाग के रूप में अपनी कणाओं से प्रभु के मस्तक पर छत्र की छाया कर प्रभु की तीन दिन तक विशुद्ध भाव से भक्ति की। प्रभु जब ध्यान पूरा करके अन्य जगह पर विहार कर गए तब उसी स्थान पर धरगेन्द्र देव ने पार्श्वप्रभु की देहानुरूप फणा सहित पन्ना मकरत मणी से प्रभु की प्रतिमा निर्मित कर स्थापित की। जब वह नगरी उजड़ गई तो फिर देवों द्वारा यह प्रतिमा उन्हेल गांव में लाई गई। राजा अजीतसेन और रानी पद्मावति द्वारा एक विशाल भण्डारा कर प्रतिमा स्थापित की (समय बीतता गया उजड़ना बसना चलता रहा)। मुगलकाल में इस मंदिर को कई बार लूटा गया तथा ध्वस्त कर दिया गया किन्तु विक्रम संवत 1264 में जैनाचार्य श्री अभयदेव सुरि ने पुनः जीर्णोद्धार करवाया। उस समय यहां पर पांच सौ घर जैन धर्मावलंबियों के थे किन्तु कालान्तर में सभी यहां से पलायन कर गए और मंदिर फिर उजड़ गया परन्तु योगानुयोग परम पूज्य श्री धर्मसागर जी म.सा. एवं उनके शिष्य श्री अभयसागरजी महाराज का इधर आगमन हुआ तो गुरूदेव ने नवकार महामंत्र की अद्भूत साधना की तथा तीर्थ के इतिहास की गणेषणा की एवं इस तीर्थ के जीर्णोद्धार की योजना बनाई। इस भागीदारी कार्य के लिये उन्हेल, नागेश्वर निवासी दीपचंद जैन ने अथक प्रयास कर इस तीर्थ के विकास में आई कई प्रकार की बाधाओं से संघर्ष करते हुए नवनिर्माण करवाया जो देश में ही नहीं विदेशों में भी विख्यात है।

नागेश्वर तीर्थ पर आध्यात्मिक संगोष्ठी पर विषयवार सभी सदस्यों ने अपने अपने विचार प्रकट किए जिसमें अनुशासन विषय पर प्रकाश रातड़िया ने अपनी बात को विस्तार से रखते हुए अनुशासन को जीवन की मर्यादा निरूपित किया। राम, कृष्ण, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, ईसा मसीह और मोहम्मद सा. ने अनुशसन के बल पर अपने जीवन को कल्याणकारी बनाया। यहां श्रद्धालु यात्रियों के लिये कोकीला बैन मेहता भोजनशाला में आतिथ्य किया जाता है। यहां तीर्थयात्रियों के ठहरने, आवास व श्रद्धा पूजन के लिये जुनाड़िया पालनपुर यात्रिक भवन, आयुष यात्रिक भवन, श्रीमती रूक्कमणी बैन दीपचंद दाड़ी धर्मशाला है। मंदिर परिसर में लक्ष्मीमाता और सरस्वती माता की प्रतिमा भी प्रतिष्ठित है। मइसी प्रकार मूलनाम भगवान, पार्श्वनाथ की प्रतिमा व मंदिर में महावीर स्वामी, पार्श्वनाथजी, नेमीनाथजी, श्री नमिनाथजी, मुनिसुव्रतस्वामी, मल्लिनाथजी, अरनाथजी, कुंथुनाथजी, शांतिनाथजी, धर्मनाथजी, अनन्तनाथजी, विमलनाथजी, भिलड़ियाजी, पार्श्वनाथजी, वासु पूज्य स्वामी, श्रैयांसनाथ, शीतलनाथजी, सुविधिनाथजी, चन्द्रप्रभुस्वामी, सुपार्श्वनाथजी, पद्मप्रभु स्वामी, सुमतिनाथजी, अभिनन्दन स्वामी, संभवनाथ, अजीतनाथजी, ऋषभदेवजी की प्रतिमा के दर्शन किये। हमारे यात्री दल में सम्मिलित प्रकाश कल्याणी निर्मल मच्छीरक्षक व सुनिल बड़ोदयिा ने सभी यात्रियों का आतिथ्य एवं सम्मान किया। इस प्रकार नागेश्वर धाम जो कि मंदसौर से 76 किमी दूर है। बहुत ही महत्वपूर्ण तीर्थ हैं और एक दिवसीय यात्रा का आनन्द धर्मालुओं द्वारा लिया जा सकता है।

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