Breaking News

अनूठी है संघ की गुरूदक्षिणा की परम्परा

Hello MDS Android App

विगत दिनों हम सभी ने गुरूपूर्णिमा पर अपने अपने गुरूओं का वंदन अभिनंदन किया। उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की और अपनी श्रद्धा के अनुरूप मन, कर्म, वचन और धन का समर्पण किया। लेकिन समर्पण की एक अद्भुत और अनूठी परम्परा विष्व के सबसे बडे स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरूपूर्णिमा उत्सव में देखने को मिलती है। जहाॅं गुरू के रूप में परम पवित्र भगवा ध्वज स्थापित है और संघ के स्वयंसेवक बडी ही श्रद्धा से अपने प्रतीक स्वरूप् गुरू को नमन करते हैं और समर्पण भी करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गुरू के चयन और पूजन के पीछे संघ संस्थापक डाॅ. हेडगेवार की दूरदृष्टि का महत्वपूर्ण स्थान है। एक बार डाॅ. हेडगेवार ने संघ के सभी स्वयंसेवकों को गुरूपूजन के लिये आमंत्रित किया स्वयंसेवकों के मन में यही विचार था कि चूंकि संघ संस्थापक डाॅ. हेडगेवार हैं उन्होने ही पूरा संगठन खडा किया है इसलिये वे ही स्वाभाविक रूप से संघ के गुरू की पदवी पर आसीन होंगे और हमें उनका ही पूजन करना है। स्वयंसेवक उनके पूजन के लिये आतुर थे लेकिन डाॅ. हेडगेवार ने भगवा ध्वज की ओर इषारा करते हुए कहा कि भगवा ध्वज ही संघ का गुरू होगा। आगे स्पष्ट करते हुए उन्होने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को संघ के गुरू के पद पर आसीन करने से संगठन शक्ति के कारण उसमें कोई दोष आ सकता है या वह इस संगठन शक्ति का दुरूपयोग कर सकता है इसलिये हमारे राष्ट्रवादी संगठन का गुरू प्रतीक स्वरूप हमारा भगवा ध्वज ही रहेगा और हम इसी के सामने अपना तन,मन,धन समर्पित करेंगे। इसी से जुडा दूसरा पक्ष है गुरूदक्षिणा का। संघ की स्थापना के बाद आवष्यक खर्चों की व्यवस्था की जब चर्चा चली तो यह तय हुआ कि संघ के स्वयंसेवक जहाॅं भोजन करने जाऐंगे और उन्हे दक्षिणा के रूप में जो भी राषि मिलेगी उससे संघ कार्य चलेगा। महाराष्ट्र में भोजन के लिये आमंत्रित लोगों को दक्षिणा में कुछ धन देने की परम्परा है। स्वयंसेवक सहर्ष इस व्यवस्था के लिये तैयार हो गए और काम चलने लगा लेकिन डाॅ. हेडगेवार हमेषा कुछ अलग ही सोचते थे उनका सारा ध्यान किसी स्थाई व्यवस्था को बनाने की तरफ था और अंततः गुरू के रूप में भगवा ध्वज की स्थापना के साथ ही उन्होने स्वयंसेवकों के सामने अपनी बात रखते हुए कहा कि संघ हम सभी स्वयंसेवकों का है और अपना घर चलाने के लिये दूसरों पर आश्रित रहना ठीक नहीं इसलिये गुरूपूर्णिमा के अवसर पर गुरूपूजन के बाद दक्षिणा स्वरूप हम सभी अपनी कमाई में से एक भाग गुरू को अर्पित करेंगे। उनके द्वारा सुझाया गया यह मार्ग तत्काल स्वीकार हो गया और उसने एक परम्परा का स्वरूप ले लिया जो आज तक निर्विवाद रूप से जारी है आज भी संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक अपने गुरू भगवा ध्वज की पूजा करने के बाद वर्ष में केवल एक बार गुरूपूर्णिमा के दिन समर्पण राषि के रूप में स्वेच्छा से धन का समर्पण करता है और उसी से संघ की सारी व्यवस्था चलती है। ना कोई दबाव है और ना कोई मजबूरी। संघ के कार्यकर्ता स्वयं अपना अंषदान तय करते हैं और अपने संघ कार्य के लिये गुरूदक्षिणा के रूप में आर्थिक समर्पण करते हैं। यह परम्परा इतनी अनूठी और व्यवस्थित है जिसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। समाज के वरिष्ठ और चिंतक लोग विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और अन्य गतिविधियों के लिये आर्थिक रूप से मदद करते हैं और अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से उनके पास कोई भी कार्यकर्ता कभी भी चंदा लेने नहीं जाता है और ना ही कोई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से रसीद प्रदान की जाती है। किसी विषिष्ट आयोजन, किसी आपदा प्रबंधन और किसी सामाजिक आवष्यकता को लेकर धनसंग्रह करना अपवाद हो सकता हैं लेकिन आमतौर पर संघ की सारी व्यवस्थाओं के संचालन के लिये अर्थ प्रबंध संघ के स्वयसेवकों के द्वारा की जाने वाली गुरूदक्षिणा से ही होती है। संघ संस्थापक ने एक ऐसी अनूठी व्यवस्था कार्यकर्ताओं को दी जो परम्परा बन चुकी है और उसका पालन संघ के करोडों करोडों स्वयंसेवक कर रहे हैं और निरंतर करते रहेंगे। – डाॅ. क्षितिज पुरोहित

About The Author

I am Brajesh Arya

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *