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अरबो रूपयों की जमीनों का खेल हो गया और फिर भी राहुल गांधी की सभा का आंकलन कर रहे है (महावीर अग्रवाल)

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मन्दसौर। देश के विभिन्न राजनैतिक दल किसानों को एक बड़ा वोट बैंक मानते हुए कहीं कर्ज माफी ओर वाजिब मूल्य को लेकर उलझकर तो नहीं रह गये। गत वर्ष 6 जून 2017 की घटना के बाद से इस वर्ष जून 2018 में विभिन्न राजनैतिक दलों ने जो सत्ता में रहे या विपक्ष में है ने किसानों की आज की मांग भी वहीं और कल की मांग भी वहीं थी कि उन्हें अपनी फसल का वाजिब मूल्य मिले को उठाया। वाजिब मूल्य की बात कोई नहीं करता किन्तु हां वोट बैंक के लालच के लिये कर्ज माफी की बात जरूर करते है लेकिन यह कब तक। देश में किसानों को लेकर राजनैतिक दलों के द्वारा जो कुछ किया जा रहा है। अब वह देश के हर वर्ग को सोचने के लिये मजबूर जरूर कर रहा है। देश के 70 करोड़ और 60 करोड़ की आबादी को राजनैतिक दल बांट रहे है किन्तु यह जागरूकता भी तो राजनैतिक दल ही पैदा कर रहे है। क्या विकास की बात अब हो जाएगी गौण।
किसानों के द्वारा उनकी उपज के वाजिब दाम को लेकर जो कुछ चल रहा है उसके लिये जो कुछ सोच विचार तेजी से उभरे है उनसे देश के उन लोगों की आंख, कान, मस्तिष्क सबकी आंखे खोल देने के लिये पर्याप्त होगा जो आंदोलन को अपने चश्मे से वोट बैंक के रूप में देखकर केवल सत्ता पर काबिज होना चाहते है। क्या एक बार पूरा कर्ज माफ कर दिया जाएगा और कर भी दिया तो क्या इस नीति से फिर से किसान कर्जें में नहीं डूबेगा। पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने अपने अनुभव को दलौदा में 8 जून 2018 को किसानों की सभा में साझा करते हुए यह कह ही दिया कि कर्ज माफी की जो घोषणा की गई है तथा अन्य जो घोषणाऐं की गई है वे किसान संगठन लिखवा कर ले और यह भी लिखाकर की कर्ज पूरा माफ कर दिया जाएगा। यदि ऐसा होता है तो फिर क्या नेता सोच समझकर घोषणा करेंगे या वे ऐसा बजट की परवाह किये बिना सत्ता के लिये करते रहेंगे।
कर्ज माफी की घोषणा बड़ी आसानी से कर रहे है लेकिन सत्ता में आने पर भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने की घोषणा कोई नहीं कर रहा है। नेता और नौकरशाह ने मिलकर भ्रष्टाचार की जड़ों को मजबूत कर रखा है जब ही तो अधिकारी यह खुलकर भ्रष्टाचार के लिये कहते है कि मैं भी कोई दूध का धुला हुआ नहीं हूू। क्या इसलिये वे एक लाख रू. देने की घोषणा कर देते है, जैसे बच्चों को बाजार मंे टाफी दिलाता हो। यह मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान के इस कार्यकाल का सजीव चित्रण प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भी यह देख व सुनकर चौंक जरूर जायेंगे लेकिन उन्हें बताने वाला भी भाजपा में मजबूत नेता चाहिये? खुले भ्रष्टाचार और चुनौती के बाद भी क्या शिवराजसिंह चौहान चाहेंगे फिर भी वोट उन्हें दे।
मुख्यमंत्री श्री चौहान के इस कार्यकाल में मंदसौर में तो अजब-गजब के मामले हो गये हो तो आश्चर्य नहीं। प्रशासन ने सांठगांठ कर जमीनों के विनिमय कर दिये। मंदसौर के गंदेनालों पर कॉलोनियां कट गई तो कहीं दिवार खड़ी कर अंदर कॉलोनी के नाम पर छोटा सा बगीचा दर्शाकर कॉलोनी की स्वीकृति ले ली। ऐसा बताते है कि मंदसौर में अनेक जीनिंग फेक्ट्रीयां थी जिन्हें 99 वर्ष की लीज पर जमीने दी हुई थी लेकिन बताते है कि न एक फीट भी जमीन है और न कोई जीनिंग फेक्ट्री बल्कि अनेक कॉलोनियों में बदलकर अरबों रू. का खेल हो गया जिसका पता जांच के बाद ही चल सकेगा जांच की जाती है तो रिपोर्ट जनता की टेबल पर रखना होगी। ऐसा ही एक नियम विरूद्ध ग्रीन बेल्ट में कलेक्टर भवन बनाकर वल्लभ भवन को ही चुनौती दे डाली। इस नए भवन की सुगबुगाहट से लकर बनने तक नई कॉलोनियों ने जन्म लेकर करोड़ों रूपये के प्लॉट महंगे भाव पर बिक गये। बहुचर्चित एक बाहरी जिले का पटवारी से पदोन्नति पाते हुए नायब तहसीलदार बन गया 25-30 वर्ष हो गये जिले में लेकिन शासन की क्या मजाल की उसका ट्रांसफल कर दे। ये तो छोटी-छोटी बानगी है मुख्यमंत्री श्री चौहान के इस कार्यकाल की फिर भी भाजपा आलाकमान की आंखे नहीं खुली और राहुल गांधी की सभा का आंकलन कर रहे है। क्या यह पर्याप्त नहीं है।
जनता अन्याय, अत्याचार सहन कर भी बोलती नहीं है। परन्तु वक्त-बेवक्त वह अपना आक्रोश का रूप बता देती है। खुद भाजपा के पदों पर बैठे वरिष्ठजनों की चर्चा के विचार सुनते है तो वे किसी भी उक्त कायों का समर्थन नहीं करते है बल्कि विचार ज्यो के त्यो दे दिये जाए तो वह बवाल भी खड़ा कर सकता है और राजनीति में नया आश्चर्य भी होगा। हां मुख्यमंत्री श्री चौहान अब भ्रष्टाचार मुक्त शासन व किसान हितेषी कदम और कौन से उठाते है देखना है। भावांतर व समर्थन मूल्य की सांठगांठ के चर्चे सुने तो पता चलता है कि किसान की आड़ में क्या खेल हुआ है। जरा जांच कराकर तो देखों तभी कुछ कहा जा सकता है।
किसानों के कर्ज माफी और सत्ता तक पहुंचने का काम स्व. श्री सुन्दरलाल पटवा जब मुख्यमंत्री बने थे उस चुनाव के समय से चल रहा है। तब क्या किसानों का पूरा कर्जा माफ हो गया था।  कांग्रेस उस समय चुनाव में कर्जे माफी की घोषणा क्यों नही कर पाई थी और आज वह कैसे कर्ज माफी की घोषणा कर रही है। राजनैतिक दलों ने यह मान लिया है कि सत्ता की कुर्सी हथियानी है तो किसानों के कर्ज माफी की घोषणा सबसे आसान प्रचार का तरीका है। कुर्सी सबको चाहिये क्यों । और कुर्सी मिल जाए तो फिर मलाईदार विभाग/भ्रष्टाचार अकूत संपत्ति/बाजार में इन्हीं लोकतंत्र के रक्षकों की चकाचौंध को देश का हर नागरिक देखकर दंग रह जाता है। आखिर कब वह लोकतंत्र आएगा। जब देश के हर वर्ग की प्रजा सुखी और खुश रहेगी। लोकतंत्र में बदलाव को लेकर बौद्धिक वर्ग चिंतित है तो क्यों है ?
खेती किसानी देश की आर्थिक रीढ़ की हड्डी है तो क्या देश के अन्य क्षेत्रों में हर हाथ व कल कारखानों के द्वारा किये जा रहे काम सब बेमानी है। देश में 70 करोड़ किसान बताए जा रहे है तो 130 करोड़ में से 60 करोड़ और जनता भी तो है क्या इसे वोट बैंक इसलिये नहीं माना जा रहा है क्योंकि इसकी कोई मांग नहीं और जितनी महंगाई और भार-बोझ इस पर थोपा जाता चला जाएगा वह ये सब वहन करेगा ही। इसके लिये कर्जे माफ जैसी कोई योजना भी नहीं है तो कारगर हो सके। किसान भी केवल फसल का वाजिब मूल्य की बात में उलझ कर रह गया है। उसके लिये अन्य बातें भी महत्वपूर्ण है उन पर वोट बैंक की राजनीति कर रहे राजनीतिक दल इसलिये ध्यान देना नहीं चाहते है क्योंकि नकली रासायनिक खाद, नकली कृषि दवाई, नकली जैविक खाद, अमानक बीज सभी कुछ कौन बना रहा और कौन बेच रहा है यह क्या उनकी नजरों और जानकारी से ओझल है। यदि यह कहा जाए कि जिस प्रकार शिक्षा व चिकित्सा के क्षेत्र में विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं आदि ने कब्जा कर ये भारी महंगी कर दी और कोई भी आवाज उठाने का साहस नहीं कर रहा है क्योंकि सब तो वो ही राजनैतिक दल है। महंगी शिक्षा व चिकित्सा से देश के नागरिक भारी दुखी है। कष्ट भोगने को मजबूर है और फिर किसानों जैसी एकता तो है नहीं कि इस वर्ग को झकझोर दे और अपनी मांगें मनवा कर रहे।
भावांतर, समर्थन मूल्य, कर्ज माफी, अनुदान, कर्ज माफी चलते अब देश में विकास के लिये एक नए बजट की नए दौर की शुरूआत होगी या जो कुछ चल रहा है सत्तारूढ़ पार्टी इसी में पत्रम पुष्पम सभी के लिये उपलब्ध करा देगी। बेहद चिंतनीय व चिंता का विषय है परन्तु इसकी परवाह किसको है।

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