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अशासकीय विद्यालयों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों ?- श्री चन्द्रे

मन्दसौर। पिछले वर्ष और इस वर्ष स्थानीय व बोर्ड की कक्षाओं के विषयों में पाठ्यक्रमों में परिवर्तन किया गया है तथा कुछ नवीन विषय पाठ्यक्रम में सम्मिलित किये गये है। उससे संबंधित विषय के अध्यापन कार्य में शिक्षक की कुशलता बढ़ाने हेतु जिला स्तर, संभाग स्तर एवं राज्य स्तर पर भी कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है किन्तु इन कार्यशालाओं में केवल शासकीय शिक्षक ही सम्मिलित किये जा रहे है जबकि राज्य के अधिकांश विद्यार्थी अशासकीय स्कूलों में भी अध्यापन करने है किन्तु ऐसे विद्यालयों को शिक्षा विभाग में प्रशिक्षण हेतु बुलाना मुनासिब नहीं समझा है। यह एक प्रकार का सौतेला व्यवहार है।

उक्त संबंध में शिक्षाविद् रमेशचन्द्र चन्द्रे ने शासन को एक पत्र लिखकर अवगत कराया है। क्योंकि शासन द्वारा निजी स्कूलों के परीक्षाफल, क्रीड़ा स्पर्धा तथा साहित्य और विज्ञान की उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर सम्पूर्ण म.प्र. सरकार की उपलब्धि मानकर गर्व का अनुभव करती है जबकि प्रशिक्षण देते समय भेदभाव की नीति समझ में नहीं आती है। श्री चन्द्रे ने यह भी कहा कि निजी शिक्षण संस्था के शिक्षकों पर यदि कोई खर्च आता है तो निजी शिक्षण संस्थाएं उसे खर्च करने को तैयार है।

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