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अष्टमुखी पशुपतिनाथ की प्रतिमा का सौंदर्य अपने-आप में अनूठा है।

19 जून 1940 को शिवना नदी से बाहर आने के बाद 21 साल तक भगवान पशुपतिनाथ की प्रतिमा नदी के तट पर ही रखी रही। प्रतिमा को सबसे पहले स्व.उदाजी पुत्र कालू जी धोबी ने चिमन चिश्ती की दरगाह के सामने नदी के गर्भ में दबी अवस्था में देखा था।

प्रतिमा को नदी से बाहर निकलने के बाद चैतन्य आश्रम के स्वामी प्रत्याक्षानंद महाराज ने 23 नवंबर 1961 को इसकी प्राण प्रतिष्ठा की। 27 नवंबर को मूर्ति का नामकरण पशुपतिनाथ कर दिया गया। इसके बाद मंदिर निर्माण हुआ।

सावन में यहां एक लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं। मुख्य आकर्षण पूरे माह होने वाला मनोकामना अभिषेक है। 101 फीट ऊंचे मंदिर के शिखर पर 100 किलो वजनी कलश स्थापित है,जिस पर 51 तोला सोने की परत चढ़ाई गई है।

प्रतिमा का इतिहास
माना जाता है कि प्रतिमा का निर्माण विक्रम संवत 575 ई.में सम्राट यशोधर्मन की हूणों पर विजय के आसपास का है। संभवत:मूर्तिभंजकों से रक्षा के लिए इसे शिवना नदी में दबा दिया गया था। अनुमान के अनुसार अज्ञात कलाकार ने प्रतिमा के ऊपर के चार मुख पूरी तरह बना दिए थे,जबकि नीचे के चार मुख निर्माणाधीन थे।

ऐसी है प्रतिमा
पशुपतिनाथ की तुलना काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ से की जाती है। मंदसौर स्थित पशुपतिनाथ प्रतिमा अष्टमुखी है। जबकि नेपाल स्थित पशुपतिनाथ चारमुखी हैं। प्रतिमा में बाल्यावस्था, युवावस्था, अधेड़ावस्था व वृद्धावस्था के दर्शन होते हैं। इसमें चारों दिशाओं में एक के ऊपर एक दो शीर्ष हैं। प्रतिमा में गंगावतरण जैसी दिखाई देने वाली सफेद धारियां हैं।

प्रतिमा की विशेषता: मुख-08, ऊंचाई-7.3 फीट, गोलाई-11.3 फीट, वजन-64065 किलो 525 ग्राम।

अष्टमुख की विशेषता
प्रतिमा के आठों मुखों का नामांकरण भगवान शिव के अष्ट तत्व के अनुसार है। हर मुख के भाव व जीवन काल भी अलग-अलग हैं। 1-शर्व, 2-भव, 3-रुद्र, 4-उग्र, 5-भीम, 6-पशुपति, 7-ईशान और 8 महादेव।

यह मंदिर भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित है। भगवान शिव के पशुपति स्वरूप को समर्पित इस मंदिर में दर्शन के लिए प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु आते हैं, शुपतिनाथ लिंग विग्रह में चार दिशाओं में चार मुख और ऊपरी भाग में पांचवां मुख है।
पशुपतिनाथ के विषय में मान्यता है कि जो व्यक्ति पतिपति नाथ के दर्शन करता है उसका जन्म कभी भी पशु योनी में नहीं होता है। जनश्रुति यह भी है कि, इस मंदिर में दर्शन के लिए जाते समय भक्तों को मंदिर के बाहर स्थित नंदी का प्रथम दर्शन नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति पहले नंदी का दर्शन करता है बाद में शिवलिंग का दर्शन करता है उसे अगले जन्म पशु योनी मिलती है।

पशुपतिनाथ के विषय में मान्यता है कि महाभारत युद्घ में पाण्डवों द्वारा अपने गुरूओं एवं सगे-संबंधियों का वध किये जाने से भगवान भोलेनाथ पाण्डवों से नाराज हो गये। भगवान श्री कृष्ण के कहने पर पाण्डव शिव जी को मनाने चल पड़े। गुप्त काशी में पाण्डवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलीन हो गये और उस स्थान पर पहुंच गये जहां पर वर्तमान में केदारनाथ स्थिति है।

शिव जी का पीछा करते हुए पाण्डव केदारनाथ पहुंच गये। इस स्थान पर पाण्डवों को आया हुए देखकर भगवान शिव ने एक भैंसे का रूप धारण किया और इस क्षेत्र में चर रहे भैसों के झुण्ड में शामिल हो गये। पाण्डवों ने भैसों के झुण्ड में भी शिव जी को पहचान लिया तब शिव जी भैंस के रूप में ही भूमि समाने लगे। भीम ने भैंस को कसकर पकड़ लिया।

भगवान शिव प्रकट हुए और पाण्डवों को पापों से मुक्त कर दिया। इस बीच भैंस बने शिव जी का सिर काठमांडू स्थित पशुपात नाथ में पहुंच गया। इसलिए केदारनाथ और पशुपतिनाथ को मिलाकर एक ज्योर्तिलिंग भी कहा जाता है। केदरनाथ में भैंस के पीठ रूप में शिवलिंग की पूजा होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति बद्रीनाथ और केदारनाथ का दर्शन करता है वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

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