आइये जाने की विवाह में गुण मिलान कैसे और क्यों करें ?

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प्रिय पाठकों/मित्रों, भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव जैसे जैसे बढ़ता जा रहा है। वैसे ही हमारे समाज में दूषित प्रभाव बढ़ता जा रहा हैं। आज हर अभिभावक अपनी संतान के युवावस्था में प्रवेश करते ही परेशान होने लगता हैं। प्रथम इस बात पर की उसके लिए सही जीवन साथी का चयन कैसे किया जाये तो दूसरा इस बात से की उसकी संतान की गलत हरकतों की वजह से उसके व्यवहार, मान, सम्मान और उनकी इज्जत में कोई कमी नहीं आये। समय चक्र के साथ साथ कुछ अभिभावक अपनी संतान की पसंद को महत्त्व देने लगे हैं।
कई बार देखा गया हैं की युवावस्था में प्रवेश करते ही कोई जातक किसी लड़की की तरफ आकर्षित होने लगता हैं लेकिन कुछ समयावधि के उपरांत ही उनमे आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू होने लगता हैं। तो कई बार इनके अभिभावक भी इनकी पसंद को स्वीकार कर शादी करवा लेते हैं लेकिन शादी के कुछ समय पश्चात् ही इनमे टकराव होने लगता हैं। शादी से पूर्व दोनों में जितना प्यार और घनिष्ठ सम्बन्ध था आखिर शादी के
पश्चात् वह अपनापन कहा चला गया इसके बारे में ज्योतिष शास्त्र के द्वारा विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती हैं।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की ऐसे अवसर पर कुंडली किसी विद्वान ज्योतिषी द्वारा देखी जाती है। वह तय करते हैं कि वर के गुण कन्या से मिल रहे हैं या नहीं। अमूमन यह प्रश्न लोगों के जहन में जरूर उठता होगा कि, क्या विवाह के पहले कुंडली मिलान करना जरूरी है? इस प्रश्न का सटीक उत्तर है काफी हद तक ‘हां’। ज्योतिष के अनुसार गुण 36 होते हैं। जिनमें से वर या वधु के कम से कम 16 गुण मिलना बेहद जरूरी होता है। इससे सिर्फ यह तय होता है कि विवाह के बाद दंपत्ति में कितनी निभेगी। जब कि यह तय नहीं किया जा सकता कि उनका वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा! दरअसल, विवाह के लिए वर-कन्या की जन्म-कुंडली मिलान नक्षत्र मेलापक के अष्टकूटों (जिन्हे गुण मिलान भी कहा जाता है) में नाडी को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।
नाड़ी, व्यक्ति के मन एवं मानसिक ऊर्जा की सूचक होती है। व्यक्ति के निजी सम्बंध उसके मन एवं उसकी भावना से नियंत्रित होते हैं।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी जातक की प्रकृति ,अभिरुचि ,उसका व्यक्तित्व और उसका व्यव्हार उसके जन्म नक्षत्र और राशी के आधार पर निर्धारित होता हैं। इसी आधार पर वर -वधु के जन्म नक्षत्र और जन्म राशी का मिलान करना गुण मिलान कहलाता हैं। गुण मिलान के आधार पर जाना जाता हैं की दोनों में परस्पर कैसा सम्बन्ध रहेगा। यदि दोनों के गुण ५० प्रतिशत से अधिक मिल रहे हैं। तो उनका दाम्पत्य जीवन सुखी रहेगा। जब पहली बार किसी के प्रति आकर्षण की भावना बढती हैं तो उनमे सही गलत का निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती। जब किसी के प्रति आकर्षित होते हैं या दिल का मिलना शुरू होता हैं तो उनमे परस्पर प्रेम भाव और अपनत्व की भावना बढती रहेगी। इसका कारण दोनों में सिर्फ लगाव या ज्योतिष के अनुसार किसी शुभ ग्रह का समय चल रहा होता हैं परन्तु यदि दोनों में यदि कम गुण मिल रहे हैं तो जब अशुभ ग्रह का समय शुरू होगा तो उनमे वैचारिक मतभेद होने लगेगा , जिससे वाद विवाद की स्थिति बनती हैं। गुण मिलान में अष्ट कूटो का मिलान किया जाता हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की ये अष्ट कूट परस्पर विभिन्न प्रकार से सामंजस्य  स्थापित करने हेतु उत्तरदायी माने जाते हैं।

आइये इनके बारे में जानकारी प्राप्त करे …………….

१) वर्ण – अष्ट कूटो में प्रथम कूट वर्ण माना गया हैं इसके आधार पर कार्य क्षमता का मूल्यांकन किया जाता हैं ज्योतिष शास्त्र और भारतीय संस्कृति में चार वर्ण माने गये हैं। इनकी परस्पर कार्य क्षमता भी अलग अलग मानी गयी हैं। कन्या से वर का वर्ण उत्तम या परस्पर एक ही हो तो दंपत्ति अपने जीवन का निर्वाह भली प्रकार से कर पाएंगे इसका मिलान होने पर एक गुण मिलता हैं।
२) वश्य – वश्य पांच प्रकार के माने गए हैं। चतुष्पद ,द्विपद ,जलचर ,वनचर और किट। मेष ,वृषभ ,सिंह, धनु का उत्तरार्ध और मकर का पूर्वार्ध चतुष्पद माने गये हैं। इनमे से सिंह राशी चतुष्पद होते हुए भी वनचर मानी गयी हैं।
मिथुन ,कन्या ,तुला ,धनु का पूर्वार्ध और कुम्भ राशी द्विपद मानी गयी हैं। मकर का उत्तरार्ध और कर्क राशी को जलचर माना हैं , इसमे कर्क राशी को जलचर होते हुए भी किट माना हैं। वश्य के द्वारा स्वभाव और परस्पर सम्बन्ध के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती हैं यदि वश्य एक ही अथवा परस्पर मित्र हैं तो सम्बन्ध अच्छा बना रहेगा परन्तु वश्य परस्पर शत्रु हैं तो दोनों में शत्रुता की भावना सामान्य बात पर भी हो जाएगी।
भक्ष्य होने पर एक दुसरे का ख्याल रखने पर भी ऐसे विचार आएंगे की मेरा जीवन साथी मुझे किसी भी प्रकार से दबाना चाहता हैं। मेरी भावनाओ की कोई क़द्र नहीं हैं। ऐसे विचार आपके प्रेमी को भी आ सकते हैं इसका शुभ मिलान होने पर दो गुण प्राप्त होते हैं ।
३) तारा – जन्म नक्षत्र के आधार पर तारा ९ प्रकार की मानी गयी हैं। जन्म ,संपत ,विपत ,क्षेम ,प्रत्यरी ,साधक ,वध , मित्र और अतिमित्र। तारा का मिलान होने पर दोने में परस्पर एक दुसरे को समझने की शक्ति प्राप्त होती हैं इसके लिए वर या पुरुष के जन्म नक्षत्र से गिनकर कन्या के नक्षत्र पर जाये और प्राप्त संख्या में ९ का भाग देवे इसी प्रकार कन्या के नक्षत्र से वर या पुरुष के नक्षत्र पर जाकर गिनने पर प्राप्त संख्या में ९ का भाग देवे। इससे प्राप्त शेष संख्या से तारा जानी जाती हैं। तीसरी विपत , पांचवी प्रत्यरी और सातवी वध अपने नाम के अनुसार अशुभ हैं ,शेष शुभ हैं। इसका मिलान होने पर तीन गुण प्राप्त होते हैं।
४) योनी – योनी चौदह मानी गयी हैं। अश्व ,गज ,मेष ,सर्प ,मार्जार मूषक, गौ, महिष, व्याघ्र, मृग, वानर, नकुल और सिंह । इसके द्वारा निर्णय लेने की क्षमता ,परस्पर संतुलन और विवेक का विचार किया जाता हैं। इसके द्वारा किसी कार्य को करते समय विचारो का मिलना जाना जाता हैं। विचार अलग होने पर अर्थात योनी अलग होने पर कार्य में बाधा आती हैं इसके मिलने पर चार गुण प्राप्त होते हैं। समान योनी होने पर चार गुण ,मित्र योनी होने पर तीन गुण ,सम योनी होने पर दो गुण और शत्रु योनी होने पर शून्य गुण प्राप्त होता हैं।
५) ग्रह मैत्री – ग्रह मैत्री के द्वारा परस्पर स्वभाव और उनकी प्रकृति के बारे में जाना जाता हैं। ग्रहों में परस्पर नैसर्गिक रूप से तीन प्रकार के सम्बन्ध बनते हैं। यदि दोनों के राशी स्वामी परस्पर मित्र अर्थात एक ही हो तो परस्पर प्रेम रहता हैं परन्तु शत्रु होने पर विरोध रहता हैं। दोनों के राशी स्वामी परस्पर सम हो तो कभी ख़ुशी कभी गम की स्थिति बनती हैं। इसका मिलान होने पर पांच गुण  प्राप्त होते हैं।
६) गण – गण तीन होते हैं देव , मनुष्य और राक्षस। गण के द्वारा शालीनता ,उदारता ,सहृदयता सुशीलता का विचार किया जाता हैं। देव गण में उत्तपन जातक उदार ,दयालु ,दानी और आत्म विश्वासी होते हैं। मनुष्य गण में उत्त्पन्न जातक चतुर ,स्वार्थी और स्वाभिमानी होते हैं। राक्षस गण में उत्त्पन्न जातक क्रोधी ,जिद्दी ,लापरवाह ,निर्दयी होते हैं। गण मिलान होने पर ६ गुण मिलते हैं।
७) भकूट – भकूट छः प्रकार के होते हैं। वर की राशी से कन्या की राशी एवम कन्या की राशी से वर की राशी तक गिनने पर इसकी जानकारी प्राप्त होती हैं। षडाष्टक ,द्विद्वादश ,नव पंचम अदि अशुभ हैं। षडाष्टक में दोनों के राशी स्वामी एक हो या परस्पर मित्र हो तो प्रीति षडाष्टक शुभ होता हैं। शेष मिलान शुभ हैं। इसका मिलान होने पर अधिकतम ७ गुण प्राप्त होते हैं ।
८) नाड़ी – नाडीया तीन होती हैं आदि ,मध्य और अन्त। इनमे दोनों की एक ही नाड़ी अशुभ हैं अलग अलग नाड़ी होना शुभ हैं। इनका मिलान होने पर आठ गुण प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यदि दिल मिलाने के उपरांत भी गुण मिलान नहीं हो रहा हो तो किसी न किसी कारणवश परस्पर वैचारिक मतभेद ,सामंजस्य का अभाव होने से उनमे अपनत्व की भावना कमजोर रहती हैं। इसलिए दिल मिलाने सेज्यादा जरुरी गुण मिलान को कहा जा सकता हैं।
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क्यों तैयार की जाती है जन्मकुंडली

जब जातक का जन्म होता है तो ग्रह स्थिति आसमान में होती है, उस स्थिति की गणना कर एक कागज पर उकेरी जाती है। यही जन्मकुंडली या जन्मपत्रिका कहलाती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हिंदू धर्म शास्त्रों में हमारे सोलह संस्कार बताए गए हैं। इन संस्कारों में काफी महत्वपूर्ण विवाह संस्कार। शादी को व्यक्ति को दूसरा जन्म भी माना जाता है क्योंकि इसके बाद वर-वधू सहित दोनों के परिवारों का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। इसलिए विवाह के संबंध में कई महत्वपूर्ण सावधानियां रखना जरूरी है। विवाह के बाद वर-वधू का जीवन सुखी और खुशियोंभरा हो यही कामना की जाती है।
वर-वधू का जीवन सुखी बना रहे इसके लिए विवाह पूर्व लड़के और लड़की की कुंडली का मिलान कराया जाता है। किसी विशेषज्ञ ज्योतिषी द्वारा भावी दंपत्ति की कुंडलियों से दोनों के गुण और दोष मिलाए जाते हैं। साथ ही दोनों की पत्रिका में ग्रहों की स्थिति को देखते हुए इनका वैवाहिक जीवन कैसा रहेगा? यह भी सटिक अंदाजा लगाया जाता है। यदि दोनों की कुंडलियां के आधार इनका जीवन सुखी प्रतीत होता है तभी ज्योतिषी विवाह करने की बात कहता है।
कुंडली मिलान से दोनों ही परिवार वर-वधू के बारे काफी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। यदि दोनों में से किसी की भी कुंडली में कोई दोष हो और इस वजह से इनका जीवन सुख-शांति वाला नहीं रहेगा, ऐसा प्रतीत होता है तो ऐसा विवाह नहीं कराया जाना चाहिए।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कुंडली के सही अध्ययन से किसी भी व्यक्ति के सभी गुण-दोष जाने जा सकते हैं। कुंडली में स्थित ग्रहों के आधार पर ही हमारा व्यवहार, आचार-विचार आदि निर्मित होते हैं। उनके भविष्य से जुड़ी बातों की जानकारी प्राप्त की जाती है। कुंडली से ही पता लगाया जाता है कि वर-वधू दोनों भविष्य में एक-दूसरे की सफलता के लिए सहयोगी सिद्ध या नहीं। वर-वधू की कुंडली मिलाने से दोनों के एक साथ भविष्य की संभावित जानकारी प्राप्त हो जाती है इसलिए विवाह से पहले कुंडली मिलान किया जाता है।
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प्राचीन समय से हमारे समाज में विवाह का निर्णय लेने हेतु कुंडली मिलान का प्रचलन है और मुख्य तौर पर देखा गया है कि लोग अक्सर गुण मिलान को ही आधार मान कर विवाह का निर्णय लेते हैं, जब कि वास्तविकता इससे कुछ अलग है।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वर्तमान समय में लोग कुंडलियों को ज्योतिषी से न मिलवा कर स्वयं सॉफ्टवेयर या मोबाइल एप से मिलाके खुद ही Done कर देते हैं और साल दो साल बाद तलाक की स्थिति आ जाती है। सॉफ्टवेयर या मोबाइल एप सिर्फ गुण मिलान करते हैं, वो ग्रहों की युक्ति या दोष नहीं बताते। तलाक का कारण अगर आपको शादी से पहले पता चल जाए तो आप कुंडली के अनुसार उचित और स्थायी उपाय करके शादी करेंगे। इससे आपको तलाक का सामना नहीं करना पड़ेगा।आज हर दूसरे घर में तलाक देखने को मिल रहे हैं। छोटी सी बात पर बसे बसाये घर मिनटों में ऐसे उजड़ जाते हैं जैसे आंधी आने पर परिंदों के घोंसले। उसका एक बड़ा कारण आज की नई पीढ़ी में घटती सहनशक्ति है तो दूसरा कारण कुंडली मिलान ठीक से न होना है।
ज्योतिष शास्त्र की मान्यता अनुसार विवाह से पहले वर और वधू की जन्म कुंडली मिलाई जाती है। वैवाहिक गुण मिलने पर विवाह शास्त्र सम्मत माना जाता है। वर व वधु के जन्म काल के चन्द्रमा के गुणों के आधार पर कुल छत्तीस 36 गुण बनते लेकिन कम से कम अठारह गुण मिलने पर विवाह शास्त्र सम्मत माना जाता है।गुण मिलान कुंडली मिलान का सिर्फ एक भाग है, इसके अलावा भी कुछ तत्व है जिन्हें कुंडली मे देखना जरूरी होता है जैसे कि-
1 व्यक्ति का लग्न भाव – लग्न भाव व्यक्ति के स्वयं के बारे मे बताता है,जिनका लग्न मज़बूत होता है वह अच्छे व्यक्तित्व के मालिक होते हैं और जिनका लग्न खराब होता है समाज मे वह लोग बुरे व्यक्तित्व के जाने जाते हैं।
2 वाणी भाव – कुंडली मे दूसरा भाव वाणी भाव कहलाता है। इस भाव से हम व्यक्ति के बात करने की शैली का आंकलन कर सकते हैं। जिस व्यक्ति का वाणी भाव खराब होगा वह अक्सर दूसरों पर ताने कसता दिखेगा, ऐसी बात कहेगा जिससे वह दूसरों को नीचा दिखा सके, अभद्र भाषा बोलेगा।
3 संतान – कुंडली का पांचवा भाव संतान भाव कहलाता है। इस भाव से संतान सुख का आंकलन होता है। अक्सर लोग मांगलिक दोष और नाड़ी दोष आदि को संतान मे बाधक मानते हैं जबकि असलियत में ऐसा नहीं होता। जिस व्यक्ति का संतान भाव खराब होगा उससे संतान प्राप्ति में बाधा जरूर आएगी, इसमे नाड़ी दोष अथवा मांगलिक का कोई संबंध नहीं होता।
4 विवाह भाव – कुंडली का सप्तम भाव विवाह भाव कहलाता है। इस भाव से हम वैवाहिक सुख का आंकलन करते हैं। जिस व्यक्ति का विवाह भाव खराब होगा उससे अपने जीवन मे वैवाहिक सुख की कमी महसूस होगी, ऐसा व्यक्ति दूसरों के साथ मिलजुल कर नहीं चल पाता, ऐसे व्यक्ति के अपने जीवनसाथी के साथ मतभेद रहते हैं। किसी व्यक्ति के चाहे 36 में से 36 गुण ही क्यों न मिले, अगर उसका विवाह भाव खराब है तो उससे ऊपर लिखे फल जरूर मिलेंगे।
5 आयु – कुंडली का आठवां भाव आयु भाव होता है जो कि आयु की आंकलन के लिए देखा जाता है। कुंडली मिलान में आयु गणना की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि अगर आपका विवाह किसी अल्प आयु वाले व्यक्ति से हो जाये और विवाह के थोड़े समय बाद आपके जीवनसाथी की मृत्यु हो जाये तो जीवन कठनाइयों का सागर बन जाता है।
गुण मिलान के बाद इन सब तत्वों के आंकलन को ग्रह मिलान कहा जाता है। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए गुण मिलान के साथ ग्रह मिलान तथा नवमांश कुंडली एवं मांगलिक, भकूट, गण, नाडी आदि दोष भी देखना अति आवश्यक है, अगर किसी व्यक्ति के गुण मिलान में अंक कम है और ग्रह मिलान उपयुक्त है तो भी विवाह हो सकता है।
ज्योतिष शास्त्र मे ये नियम पूरी तरह से सब जगह लागू नहीं हो पाते, मात्र इन घटना का प्रतिशत कम ही पाया गया है।
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की गुण मिलान तो एक सामान्य बात है, विशेष रूप से कुंडली के ओर भी ग्रह होते हैं जो दाम्पत्य जीवन को प्रभावित करते हैं। वर वधू की आयु, स्वास्थ्य, आपस में प्रेम सम्बन्ध, संतान योग, सुख सौभाग्य की वृद्धि आदि कइ बाते वैवाहिक जीवन में कलह कर तलाक करा देती हैं।व्यवहार में यह पाया जाता है कि गुरू ओर शुक्र की युक्ति, इन ग्रहों का अस्त व वक्री, गुरू और शुक्र का उच्चतम राशि में बैठना, इन ग्रहों पर राहू व केतु की दृष्टि व युति सम्बन्ध भी दाम्पत्य जीवन मे कलह का कारण बनती है। अपरिहार्य कारणों से विवाह करना पडे तो शास्त्रीय उपाय कर लेने चाहिए।
सारांश रूप मे यह कहा जाता है कि इस कुंडली मिलान में अभी बहुत कुछ शोध करने की आवश्यकता है, फिर भी वर व वधू की शादी पूर्व, स्वास्थ्य परीक्षण करवा लेनी चाहिए। जिसे ईश्वर की सत्ता में विश्वास होता है, सुख दुख, जन्म मृत्यु आदि की व्यवस्था भी परमात्मा करता है। परमात्मा के नाम पर ही विश्वास कर अपने शुभ कार्यो को करना ही हित कारी होता है।
जो भी व्यक्ति ज्योतिष शास्त्र की सत्यता पर पूरा विश्वास रखता हो वह हर संभव शास्त्र विधि के अनुसार ही कार्य कर सकते है।
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गुण मिलान” से अधिक जरूरी क्यों है “कुण्डली मिलान”…???

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हमें हमारे ज्योतिषीय जीवन में अनेकानेक विचित्र अनुभव होते रहे हैं। कुछ महानुभाव ऐसे भी आते हैं, जो कहते हैं कि मेरी कन्या के लिए एक अच्छा रिश्ता आया है। कृपा करके कुण्डली मिला दें। वर-कन्या की कुण्डली मिलाने से उनका आशय केवल इतना होता है कि आप गुण मिलान कर दें, बाकी वे स्वयं निपटा लेंगे।
ये पूरी तरह हास्यपद बात होने के साथ ही उनके अल्पज्ञान का प्रदर्शन भी है। किंतु आप एक सामान्य इंसान से एस्ट्रोलॉजी के विशेष ज्ञान की आस भी कैसे लगा सकते हैं।
गांव-गिरांव और कस्बाई इलाकों में महानुभाव पंडितों ने अपने पेशेवर अन्दाज के कारण लोगों को भ्रम में डाला और मेट्रो शहरों के सिलेब्रिट्री ज्योतिर्विदों ने अंधाधुंध कमाई के चक्कर में सच को सामने आने ही नहीं दिया।
केवल गुण मिलान के कारण लाखों दाम्पत्य जीवन पूरी तरह बर्बाद हो जाते हैं।अब जानिए वास्तविकता
हकीकत ये है कि गुण मिलान से केवल इतना पता चलता है कि अमुक वर-कन्या के बीच कितनी निभेगी, जिसमें वर्ग, गण, वश्य, नाड़ी भकूट, तथा योनि जैसे मुख्य संदर्भ बिंदु शामिल किए जाते हैं। किंतु इससे ये बिल्कुल नहीं जाना जा सकता है कि उन दोनों के बीच पूरे जीवन कैसा सामंजस्य रहेगा, साथ ही उनकी किस्मत कितनी दूरी तक एक साथ चलेगी। इसके अलावा मांगलिक दोष तथा सप्तम भाव की स्थिति सहित भाग्य व संतान भाव की पोजीशन का भी अंदाज़ा नहीं लग पाता।
कुछ वर्ष पूर्व की बात है जब एक कन्या के पिता हमारे पास आए थे। उनके द्वारा प्रदत्त कुण्डली के आंकड़े पूरी तरह बयां कर रहे थे कि यदि उन्होंने चयनित वर से कन्या की शादी करा दी तो वह शादी अधिक से अधिक दो वर्ष तक चलेगी।
जब हमने उन्हें हकीकत से रूबरू करवाया तो उन्होंने कहा कि जो होगा देखा जाएगा आप केवल गुण मिलान कर दें। हमारे लाख मना करने के बावज़ूद उन्होंने अपने द्वारा चयनित लड़के से अपनी कन्या का विवाह करा दिया, परिणाम स्वरूप आज दोनों का जीवन दुःखमय हो चुका है, तलाक का मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
वस्तुतः गुण मिलान में तो दोनों की कुण्डली 26 गुणों से पास हो गई थी, किंतु दोनों के सप्तम भाव बुरी तरह प्रताड़ित थे।
वर की कुण्डली में सप्तमेश शनि मंगल के साथ द्वितीय भाव में विराजमान था। राहु व केतु लग्न व सप्तम में बैठे थे। जबकि कन्या की कुण्डली में सप्तमेश सूर्य द्वारा आच्छादित होकर अष्टम में बैठा था। यानि दोनों की कुण्डली बयां कर रही थी कि यदि उनमें विवाह संपन्न हो गया तो फोर तलाक निश्चित है।

क्या करना चाहिए ऐसी स्थिति में?

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यहां पर उपयुक्त वर अथवा कन्या का चयन ऐसे करना चाहिए जिनकी कुण्डलियों में ठीक उसी रीति से ग्रह विराजित हों अथवा जिनके सप्तम भाव उतने ही पीड़ित हों, ताकि विपरीत राजयोग जैसी पोजीशन निर्मित हो जाए और बीज गणितीय रूल के अनुसार निगेटिव-निगेटिव, पॉजिटिव हो जाएं।
थोड़ा मुश्किल तो है ऐसे कुण्डलियों का मिलना किंतु असंभव नहीं। यदि वर अथवा कन्या के माता-पिता अपने प्रयास को थोड़ी और गति दे दें साथ ही महानुभाव ज्योतिषी महोदय अपनी सही राय दे दें तो तमाम दांपत्य जीवन संवर सकते हैं।
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ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की भारत वर्ष में विवाह से पूर्व वर एवम कन्या के जन्म नक्षत्रों के अनुसार अष्टकूट मिलान से गुण मिलाने की प्राचीन परम्परा है|
वर , कन्या तथा उनके परिजन एक -दूसरे की प्रकृति ,गुण -दोष आदि के बारे में प्रायःअनभिज्ञ होते हैं | विवाह से पूर्व दोनों पक्ष अपने दोषों को छिपाते हैं तथा गुणों को बढा -चढा कर दिखाते हैं जिसके कारण विवाह के कुछ समय बाद ही पति -पत्नी के संबंधों में तनाव आरम्भ हो जाता है |विवाहोपरांत वर एवम कन्या की परस्पर अनुकूलता हो ,दोनों की आयु दीर्घ हो ,धन -संपत्ति एवम संतान का सुख उत्तम हो इसी उद्देश्य से ऋषि -मुनिओं ने अपने ज्ञान एवम अनुसन्धान के आधार पर वर एवम कन्या की जन्म राशिः तथा जन्म नक्षत्रों के अनुसार विवाह से पूर्व अष्टकूट मिलान से गुण मिलाने की श्रेष्ठ पद्दति का विकास किया |प्रश्न -मार्ग ,विवाह वृन्दावन ,मुहूर्त गणपति ,मुहूर्त चिंतामणि प्रभृति ग्रंथों में अष्टकूट मिलान एवम इसकी उपयोगिता पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है |
जानिए क्या है अष्टकूट ?
वर्णों वश्यं तथा तारा योनीश्च गृह मैत्रकम |
गण मैत्रं भकूटश्च नाडी चैते गुणाधिका ||
[ मुहूर्त चिंतामणि ]
1. वर्ण 2. वश्य 3, तारा 4. योनि 5. ग्रह मैत्री 6. गण 7. भकूट 8.नाडी ये आठ अष्टकूट हैं जिनका विचार मिलान में किया जाता है | क्रम संख्या के अनुसार ही इनके गुण होते हैं |जैसे वर्ण का क्रम एक है तो गुण भी एक होगा ,योनि का क्रम चार है तो गुण भी चार ही होंगे |इस प्रकार क्रमानुसार योग करने पर अष्टकूटोँ के कुल गुण 1+2+3+4+5+6+7+8=36 गुण होते हैं |
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1. वर्ण कूट

वर्णजन्म योनि
ब्राह्मणकर्क ,वृश्चिक ,मीन
क्षत्रियमेष ,सिंह ,धनु
वैश्यवृष,कन्या मकर
शूद्रमिथुन ,तुला कुम्भ

वर का वर्ण कन्या से उत्तम होने पर एक गुण अन्यथा शून्य गुण मिलता है |

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2. वश्य कूट

संज्ञाराशिः
नरमिथुन ,कन्या ,तुला एवम धनु 15 अंश तक
चतुष्पदमेष ,वृष ,सिंह ,धनु के अंतिम 15 अंश ,मकर 15 अंश तक
जलचरकुम्भ ,मीन ,मकर के अंतिम 15 अंश
कीटकर्क ,वृश्चिक

सिंह राशिः को छोड़ कर सभी राशियां नर के वश में होती हैं| वृश्चिक को छोड़ कर शेष राशियां सिंह राशिः के वश में हैं |समान वश्य में 2 गुण ,एक वश्य व दूसरा शत्रु हो तो 1 गुण ,एक वश्य व दूसरा भक्ष्य हो तो 1/2 गुण प्राप्त होते हैं |
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3. तारा कूटकन्या के जन्म नक्षत्र से वर के जन्म नक्षत्र तक तथा वर के जन्म नक्षत्र से कन्या के जन्म नक्षत्र तक गिनें |दोनों संख्याओं को अलग -अलग 9 से भाग दें |शेष 3,5,7 हो तो तारा अशुभ अन्यथा शुभ होगी |दोनों तारा अशुभ हो तो 0 गुण , दोनों शुभ हों तो 2 गुण ,एक अशुभ व दूसरी शुभ हों तो 1 गुण होता है |

4.योनि कूट

वैर
वैर
वैर
वैर
वैर
वैर
वैर
योनी

नक्षत्र
नक्षत्र

अश्वमहिषसिंहहाथीमेढावानरनेवलासर्पमृगश्वानबिल्लीमूषकव्याघ्रगौ
अश्वनी
शतभिषा
स्वाति
हस्त
धनिष्ठा
पू0भा0
भरणी
रेवती
पूष्य
कृतिका
श्रवण पू०षाउ0षा
अभिजित
मृगशिरा रोहिणी ज्येष्ठा
अनुराधा
मूल
आर्द्रा
पुनर्वसु अश्लेशामघा
पू०फ़ा0
विशाखा चित्रा उ०भा
उ०फ़ा0

एक ही योनि हो या अधि मित्र योनि हो तो 4 गुण , मित्र हो तो 3 गुण ,सम हो तो 2 गुण ,वैर में 1 गुण तथा महा वैर में 0 गुण मिलता है |
5. ग्रह मैत्री कूट

ग्रह—>सूर्यचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
मित्रचन्द्र मंगलगुरुसूर्य बुधचन्द्र सूर्य गुरुसूर्य शुक्रचन्द्र सूर्य मंगलबुध शनिबुध शुक्र
समबुधमंगल गुरु शुक्रशनिशुक्र शनिमंगल गुरु शनिशनिमंगल गुरुगुरु
शत्रुशुक्र शनिबुधचन्द्रबुध शुक्रचन्द्र सूर्यचन्द्र सूर्य मंगल

वर -कन्या की एक ही राशिः हो या परस्पर मैत्री हो तो 5 गुण ,एक मित्र व एक सम हो तो 4 गुण ,दोनों सम हों तो 3 गुण ,एक मित्र व एक शत्रु हो तो 1 गुण ,एक सम व एक शत्रु हो तो 1/2 गुण ,दोनों शत्रु हों तो 0 गुण मिलता है |

6.गण

देवगणमानवगणराक्षसगण
अश्वनीभरणीकृतिका
मृगशिरारोहिणीआश्लेषा
पुनर्वसुआर्द्रामघा
पुष्यपूर्वा ० फा 0चित्रा
हस्तउत्तरा ० फा 0विशाखा
स्वातिपूर्वाषाढ़ज्येष्ठा
अनुराधाउत्तरा षाढ़मूल
श्रवणपूर्वा ० भा 0धनिष्ठा
रेवतीउत्तरा ० भा oशतभिषा

वर ,कन्या का गण समान हो तो 6 गुण, वर का देव तथा कन्या का मानव गण हो तो 6 गुण , कन्या का देव तथा वर का मानव गण हो तो 5 गुण ,कन्या का देव तथा वर का राक्षस गण हो तो 1 गुण ,कन्या का राक्षस तथा वर का देव गण हो या एक का मानव व दूसरे का राक्षस गण हो तो 0 गुण मिलता है |

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7 भकूट

वर एवम कन्या की जन्म राशि एक -दूसरे से 6-8, 5-9, 2-12 वें हो तो भकूट दोष होता है |
6-8 अर्थात षडाष्टक दोष से रोग ,कलह या वियोग , 5-9 अर्थात नव-पंचम से अन्पत्यता , 2-12 अर्थात द्वि -द्वादश दोष से हानि एवम दरिद्रता होती है |भकूट दोष होने पर 0 गुण अन्यथा 7 गुण मिलते हैं |

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8. नाडी कूट

आदिनाडीअश्वनी आर्द्रा पुनर्वसुउ0फा0हस्त ज्येष्ठामूलशतभिषापू०भा0
मध्यनाडीभरणीमृगशिरापुष्यपू०फ़ा0चित्राअनुराधापू0षा0धनिष्ठाउ०भा0
अन्त्यनाडीकृतिकारोहिणीआश्लेषामघास्वातिविशाखाउ० षा०श्रवणरेवती

वर कन्या का जन्म नक्षत्र एक ही नाडी में हो तो अत्यन्त अशुभ समझा जाता है तथा शुन्य गुण मिलता है । अन्यथा आठ गुण प्राप्त होते है ।
दोनों का जन्म नक्षत्र आदि नाडी मे हो तो वियोग , मध्य में हो तो हानि , तथा अन्त्य नाडी मे हो तो मृत्यु अथवा दारुण कष्ट सहना पड़ता है ।
अष्टकूट दोषों का परिहार
यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि वर एवम कन्या के जन्म नक्षत्र का मिलान करते हुए सभी ज्योतिषी अष्टकूट दोषों का विचार तो करते हैं पर उनके परिहारों को महत्त्व प्रदान नहींकरते |सभी मेलापक एवम मुहूर्त ग्रंथों में अष्टकूट दोषों के साथ ही उनके परिहारों का वर्णन किया गया है | परिहार उपलब्ध होने पर दोष कि निवृति मान कर उसके आधे गुण ग्रहण करने का शास्त्र उपदेश देते हैं |कुल 36 गुणों में से 18 से 21 तक गुण मिलने पर मिलान मध्यम तथा इस से अधिक होने पर उत्तरोतर शुभ मिलान होता है |18 से कम गुण मिलने पर विवाह सम्बन्ध नहीं करना चाहिए |अष्टकूट दोषों का परिहार निम्नलिखित प्रकार से वर्णित है :

अष्टकूटपरिहार
वर्णराशियों के स्वामियों या नवांशेशों कि मैत्री या एकता हो
वश्यराशियों के स्वामियों यानवांशेशों कि मैत्री या एकताहो
ताराराशियों के स्वामियों यानवांशेशों कि मैत्री या एकताहो
योनिराशियों के स्वामियों यानवांशेशों कि मैत्री या एकताहो
राशिः मैत्री1 राशियों के नवांशेशों किमैत्रीया एकता हो |
2 भकूट दोष न हो |
|गण1 राशियों के स्वामियों यानवांशेशों कि मैत्री या एकताहो | 2 भकूट दोष न हो |
भकूटराशियों के स्वामियों यानवांशेशों कि मैत्री या एकताहो
नाडी1. दोनों कि राशिः एक तथानक्षत्रअलग-अलग हों |
2. दोनों के नक्षत्र एक तथा राशि अलग -अलग हो |
3. दोनों के नक्षत्रों में चरण वेध न हो अर्थात
दोनों के नक्षत्रों के चरण 1-4 या 2-3 न हो क्योंकि इनमें परस्पर वेध होता है |
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ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की सामान्य रूप से कुंडली मिलान आज के कंप्यूटर के युग में बहुत सामान्य की बात हो गयी है हर दूसरा जातक अपने कंप्यूटर पर सॉफ्टवेर के माध्यम से कुंडली मिलान कर बोल देता है की इनके तो २८ गुण मिल गए या ३२ गुण मिल गए अब विवाह में कोई व्यवधान नहीं आएगा आगे बात की जा सकती है मंगल दोष को भी अधिकतर ज्योतिष के सॉफ्टवेर बता ही देते है भकुट और नाडी दोष के बारे में भी सभी सॉफ्टवेर में दिया ही होता है एसे में जातक अपने आप में ही संतुष्ट हो जाता है ये अवस्था तब है जब गुण २५ से ऊपर मिले होते है इसके विपरीत यदि कभी १२ या १४ गुण मिलते है तो जातक आपनी ही बात से पलट जाते है |
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की हम कुंडली मिलान को विशेष महत्त्व ही नहीं देते कुंडली कुछ नहीं होती सिर्फ अपनी सोच है एसे में क्या तत्व दर्शन जातक को अपने पार्टनर का सही चुनाव देने में संभव है तो तो आंशिक रूप से खुद को ही छलावा देना हुआ गणितीय आकडे तो हर सॉफ्टवेर से आसानी से निकल आते है आज विषय को कुछ नए ढंग से लेने का प्रयास करते है कुंडली मिलान इतना आसान नहीं होता जितना की एक साधक समझता है हर विषय को गंभीरता से जब तक न लिया जाये सही उत्तर मिलना आसान नहीं होते एसे में विवाह तो हो जाते है पर कितने समय तक चलेगे ये अपने आप में प्रश्न चिन्ह बन जाता है एसे में ज्योतिष  से प्राप्त ज्ञान के क्रम में कुछ महत्त्व पूर्ण बिंदु आप सभी के सामने प्रस्तुत है !
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की किसी भी कुंडली में हर ग्रह भाव राशि की एक विशेष अवस्था होती है जो जातक की जीवन की प्रकृति का निर्माण करती है एसे में दो जातको की कुंडली को देख कर उसके सामान्य और असामान्य क्रम को देखना और जीवन की अवस्था में बदलव पर दोनों के स्थायित्व को देखने का क्रम ही कुंडली मिलान होता है |
चंद्र की अवस्था का आकलन ही ३६ गुणों में अभिव्यक्त किया गया है जो सही मायेने में सही भी है चंद्र जातक के मन का कारक है चंद्र की विशिष्ट अवस्थाओ के आधार पर दो कुंडलियो में गुण दोषों को देखा जाता है ये सामान्य रूप से बहुत हद तक सही भी है ज्योतिष में मंगल को भी विवाह के समय विशेष रूप से देखा जाता है मंगल के अच्छा होने पर विघ्न कम आते है एसा माना गया है जबकि वास्तविकता कितनी है ये अनुभवी जन ही जानते है इस क्रम में कुछ एसे विषयों को जोड़ना चाहुगा जिसको सामान्य जन नहीं जानते और न ही विवाह के समय उतना विचार करते है
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की जातक की कुंडली में सप्तम भाव जीवन साथी का होता है इसके स्वामी का अस्त होना क्रूर ग्रह सूर्य के साथ होना, राहू या केतु के साथ होना सप्तम भाव पर गुरु या शुक्र की द्रष्टि न होना, मंगल या शनि की द्रष्टि होना जातक के वैवाहिक जीवन में नीरसता लाता है कुंडली में चंद्र का सूर्य/राहू/केतु/मंगल/शनि के साथ होना जातक को अपने ही आप से भ्रमित करता है एसा जातक मन का स्थिर नहीं होता अपरिपक्व सोच वाला होता है दो कुंडलियो में सामंजस्य देखने के लिए ये जरुर देखे की दोनों में सप्तम भाव या सप्तमेश पीड़ित न हो एसा होने पर भले ही ३३ गुण ही क्यों न मिल जाये विवाह के स्थायित्व की सम्भावना कम हो जाती है यदि कुंडली में जाच के समय नाडी दोष हो और दोनों ही कुंडलीयो में पंचम भाव बलि हो और पंचमेश अपनी पूर्ण शुभता के साथ हो तो नाडी दोष उतना खराब नही होता पंचम से नवम का बलि होना यहाँ पर नाडी दोष को हर लेता है यदि नाडी दोष है और पंचम में राहू /मंगल /शनि बैठे है तो आगे संतान के होने में विशेष समस्या देखने को मिलती है सूर्य या गुरु का पंचम भाव में होना संतान की हानि करवा देता है |
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि किसी जातक की कुंडली में सप्तमेश अस्त हो तो धनेश और पंचमेश के कारक ग्रह को बलि करते हुए विवाह से पूर्व उपाय करने चाहिए एसे में अस्त ग्रह को बलि करने पर वो ग्रह अपने नकारात्मक भाव के फल पूर्व में देना शुरू कर देता है यदि किसी कुंडली में चंद्र नीच का है किन्तु सूर्य के ठीक सामने १८० अंश पर है तो वो चंद्र पूर्ण बलि होता है एसा अशुभ चंद्र होने पर भी विवाह के लिए शुभ कारक हो जाता है शनि के साथ सूर्य और मंगल के साथ चंद्र की युति होने पर जीवन में कई बार विवाह के बाद मतभेद देखने को मिलते है एसा जातक अपने परिवार से कभी संतुस्ट नहीं होता अपने सुख को घर के बहार ढूढने का प्रयास करता है एसी अवस्था में मात्र एक ग्रह चंद्र को देख कर गुणों का आकलन कर लेना गलत है |
 बहुत से ग्रह चंद्र के युग्म से बने दोष को हर लेते है और एसे में १२-१५ गुणों वाले मिलान भी एक अच्छे समय तक शुभता देते है और कई बार बाकि ग्रहों का शुभता न देना मात्र चन्द्र के कारण ३२-३६ गुण मिल जाना विवाह के प्रथम वर्ष में ही सम्बन्ध विच्छेद करवा देता है एसे में सॉफ्टवेर की अपनी सीमांए होती है ये विकास का क्रम है पूर्ण विकसित नहीं ज्योतिष का क्षेत्र ही विकास का क्षेत्र है हर किसी को पूर्ण ज्ञान हो ये जरुरी नहीं हा एक निश्चित ज्ञान की अवस्था तक ही हो देख सकता है जितना उसने अपने ज्ञान के आधार पर अनुभव किया है अब जिस प्रोग्रामर से सॉफ्टवेर बनाया है उसकी सीमाए उस ज्ञान पुंज के अनुभव तक ही सिमित है जब की इस विषय को देखना इतना आसान नहीं है |
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की मै ये मानता हू भविष्य में एसे सॉफ्टवेर बन सकते है जो डाटा बैंक की जगह ज्ञान बैंक पर आधारित होगे उस अवस्था के आने में समय है तब तक कंप्यूटर को ही आधार मान कर उसके फलित पर विश्वास कर दो लोगो की जीवन में अँधेरा कर देना अल्प ज्ञान है वैसे तो हर किसी की सोच अपने आप ज्ञान उस अवस्था को ला ही देती है जो होना होता है एसे में कई बार ज्ञानी जन के पास जाने पर भी सफलता नहीं मिलती है फिर भी अज्ञानी इन विषय पर भी साधक का ध्यान केंद्रित कर सकते है जिससे काफी हद तक तत्व दर्शन की तरफ जाने में आसानी हो जाती है और जीवन में स्थायित्व आ जाता है | सभी के साथ शुभ हो इस कामना के साथ !!

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