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आखिर इतना दूध आ कहॉं से रहा है?

हमारे मालवा के लिये एक कथन मशहूर है जिसमें कहा गया है कि मालव माटी गहन गंभीर, डग डग रोटी पग पग नीर। लेकिन पिछले कुछ समय की स्थिति को देखकर ऐसा लग रहा है कि इस कथन में कुछ संशोधन करते हुए यह कहना पडेगा कि मालव माटी गहन गंभीर, डग डग डेयरी, पग पग दूध। ऐसा संशोधन इसलिये करना पडेगा क्योंकि पिछले कुछ समय में हमारे पूरे अंचल में जिस प्रकार से दूध की बाढ आई है वह हैरान कर देने वाली है। निजी दूध कंपनियों का दूध बाजार में जिस तरह से दिखाई दे रहा है उससे मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठा है कि आखिर इतना दूध आ कहॉं से रहा है। हममें से अधिकांश क्या बहुतायत लोगों ने वह दौर देखा है जब दूध की तपेली रात को ही मॉं इसलिये साफ कर रख दिया करती थी कि सुबह 6 बजे दूधवाला आऐगा तो दूध लेना पडेगा बाद में दूध में पानी मिलाने की शिकायत दूधवाले से करना एक नियमित क्रम बना फिर लोग अपने घरों में दूध मापक मीटर रखने लगे, फिर भी दूधवाले नहीं सुधरे तो प्राइवेट डेयरीयों का दौर आया फिर कुछ बडे व्यावसायिक घरानों जैसे टाटा, बिरला, सिंघनिया की आवासीय कालोनियों मेें पाश्चुरीकृत दूध के नाम से बॉटलों में दूध सप्लाई होने लगा जल्दी ही दूध की सप्लाई उन थैलियों में होने लगी जो हम आज देख रहे हैं। इस पूरी यात्रा को पर करते हुए दूध आज हम सबको मिल रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत कि बढती जनसंख्या के साथ दूध की मांग में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है और दूध हर व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है। लेकिन संशय मन में दूध की आपूर्ति को लेकर उठ रहा है और इसमें चिंता इसलिये बढ रही है कि विभिन्न समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर नकली दूध बनाने का सीधा प्रसारण उपलब्ध है और कीटनाशकों का दूध बनाने में प्रयोग देख आम जनता के होश उड रहे हैं। आज बाजार में अमूल से लेकर सांची तक और सौरभ से लेकर मोलको तक बाजार में लगभग 14 ब्रांड दूध के (अमूल, सांची, सौरभ, कोटा फ्रेश, मोलको, श्रीधी, सरस, श्रेष्ठ, डेरियो, आदि) उपलब्ध हैं जिनके वाहन रोज सुबह आपको नगर में दौडते दिखाई दे जाऐंगे और हमारे परम्परागत दूधवाले जो कि सायकल पर या किसी वाहन पर टंकी लगाए घर घर जाकर दूध वितरित करने वाले भाई लगभग नदारद हो चुके हैं। लेकिन चिंता की बात नहीं है हमारा दूधवाला बेराजगार नहीं हुआ है उसे इतना आराम हो गया है कि उसे अब हमारे घरों के दरवाजे पर आकर हमें उठाना नहीं पड रहा है निजी दूध सप्लायर्स उनके घर जाकर दूध का कलेक्शन कर रहे हैं और नकद या तय शर्तों के मुताबिक भुगतान भी कर रहे हैं। हमारे दूध उत्पादकों को घर बैठे दूध का दाम मिल रहा है बस उन्हे दूध की क्वालिटी का ध्यान रखना है। बात फिर घूम फिर कर बढती दूध कंपनीयों की संख्या पर और उनके उत्पादन की मात्रा पर प्रश्न खडे करने पर आकर टिक जाती है क्योंकि दूध उप्तादकों की संख्या निश्चित है, दूध देने वाले गाय और भैंसों की संख्या और उनके द्वारा दिये जाने वाले दूध की मात्रा भी निश्चित है, यहॉं यह भी तय है कि एक दूध उत्पादक या तो उज्जैन दुग्ध संघ की गॉंव की समिति को दूध कलेक्शन में देगा या किसी दूसरी निजी कंपनी को। बहुत ज्यादा उसके पास दूध की उपलब्धता है तो वह तीसरी किसी कंपनी को भी दूध दे सकता है लेकिन लगभग 14 दूध निर्माता कंपनियों के पास दूध कैसे और कहॉं से आ रहा है यह जॉंच का विषय होना चाहिये? नया कोई भी दूध प्लांट खुलेगा तो दूध या तो गाय भैंसों से प्राप्त करेगा या दूध पावडर से बनाएगा या फिर अनैतिक साधनों का उपयोग करके आपके हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड करेगा? फिर हो क्यारहा है भीलवाडा से लेकर देवास तक और कोटा से लेकर मंदसौर तक के इस 250 किलोमीटर के रेडियस एरिया को देखें तो लगभग 50 दूध कंपनियों की उपस्थिति दिखाई पडती है। इनमें कुछ बडी कंपनियॉं है और कुछ छोटी लेकिन दूध सबके पास है और पर्याप्त है। हम सामान्य लोग यह कभी नहीं समझ सकेंगे कि विद्यमान पशुधन दूध ज्यादा देने लगा है कि नया दूध देने वाला पशुधन दूध उत्पादकों के पास आ गया है? यदि सब कुछ सही है तो फिर दूध की इतनी बडी मात्रा हमारे पास होने के बाद उस पर अर्थशास्त्र का मांग पूर्ति का सिद्धांत लागू क्यों नहीं हो रहा जो यह कहता है कि जैसे जैसे किसी वस्तु की पूर्ति अधिक होती है उसकी मांग और कीमत दोनो में गिरावट आती है। क्यों भारत का नागरिक 50 रूपये प्रति लीटर दूध खरीदने को मजबूर है? जब देश में दूध निर्माता कंपनियों की बाढ आई हुई है दूध की नदियॉं बह रही है रोज सवेरे हजारों वाहन दौ सौ से पॉंच सौ किलोमीटर तक की दूरी का सफर कर दूध सप्लाई कर रहे हैं तो फिर कहॉं है प्रशासनिक मशीनरी जो दूध निर्माता कंपनियों से ये पूछे कि जब आप दूध उत्पादकों से 22 रूपये से 25 रूपये तक प्रति लीटर की दर से दूध खरीद रहे हो तो एक आम भारतीय नागरिक को दूध 50 रूपये प्रति लीटर कैसे दे रहे हो? आपका लाभ कमाने का प्रतिशत क्या है? उसकी गुणवत्ता के मानकों का कितना प्रतिशत पालन हो रहा है? और आपको दूध आखिर मिल कहॉं से रहा है? दूध उत्पादकों और दूध निर्माताओं की आधार कार्ड से सम्बद्धता या मेपिंग करके यह पता लगाया जा सकता है कि कौन किससे दूध खरीद रहा है और कौन किसे बेच रहा है। पता चल जाएगा कि आखिर इतना दूध आ कहॉं से रहा है? क्योंकि यह पता लगाना बहुत जरूरी भी है।

– डॉ. क्षितिज पुरोहित, मंदसौर 9425105610

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