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आज है 14 अगस्त अखण्ड भारत संकल्प दिवस

पास नही है वो ननकाना, वो लवपुर लाहोर नही,  हिंगलाजमाता का मंदिर, वो पटसन की डोर नही।
बरसो जिसने ज्ञान बिखेरा, तक्षशिला भी हुआ पराया, हुई परायी धरती अपनी, नलव ने जो ध्वज फहराया।।
15 अगस्त का दिन भारत की स्वतंत्रता का दिन है, इसी दिन भारतवासी गोरे अंग्रेजो के चंगुल से आजाद हुए थे, इसलिए यह दिन सम्पूर्ण भारत वर्ष में बड़े उत्साह, उल्लास और खुशी से मनाया जाता है। खुशी और उत्साह होना भी चाहिए क्योंकि स्वतंत्रता से बड़ी कोई चीज़ नही होती। पशु-पक्षी भी आज़ादी में सांस लेना पसन्द करते है, हम तो इंसान है, जो इस ऋषियो मुनियो की धरती पर, कुछ नया सीखाने व कराने वाली भारत भूमि पर जन्मे है, इसलिए मानव कहलाये है। हमें तो सदियों से कोई बंदिश नही रोक पाई, जो कोई हमे गुलाम बनाने आया, वह कुछ नया सीखा कर गया और ऐसे ही अंग्रेज भी आकर चले गए।
स्वतंत्रता दिवस की खुशियां मनाते समय यह बात मन में आना चाहिए क्या वास्तव में हमारा देश इतना ही बड़ा था।  नयी पीढी तो 1947 की आजादी के समय जो मिला उसे ही अपना देश मानकर उसकी पूजा करती आ रही है क्योंकि उसे पता ही नही की अखण्ड भारत कैसा था?? वो भारत माता कैेसी थी जो विश्वगुरु के सिंहासन पर विराजित होकर सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान का संदेश देती थी?? कैसे अपनी भारत माता के एक-एक अंग कटते चले गए? कैसे भारत का हिस्सा कम होता चला गया?? यह सब वर्तमान पीढ़ी के सामने आना चाहिए। अखण्ड भारत की सीमाएं दूर दूर तक फैली हुई थी। भारत ने कभी किसी पर भी आक्रमण नही किया, परन्तु संस्कृति की विजय पताका लिए सांस्कृतिक दिग्विजय अभियान हेतु भारत के ऋषि मुनि विश्वभर में गए। शायद इसलिए भारत की सांस्कृतिक सभ्यता के चिन्ह आज भी विश्वभर के लगभग सभी देशों में मिल जाते है। यह एक ऐतिहासीक सत्य है कि सांस्कृतिक एवं राजनीतिक रूप से भारत की सीमाएं पश्चिम में ईरान से पूर्व के बर्मा तक फैली हुई थी। भारत ने सम्भवतः विश्व में सबसे अधिक सांस्कृतिक व राजनीतिक आक्रमण झेले है, इन आक्रमणों के बावजूद  भारतीय संस्कृति आज भी मौजूद है। किसी कवि ने क्या खूब कहा है कि-
यूनान, रोम, मिस्र, सब मिट गए जहाँ से।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नही हमारी।।
लेकिन इन आक्रमणों के कारण भारत की सीमाएं सिकुड़ती चली गई। भारत माता के अंग कटते चले गए। अभी जो हमारे पड़ोसी देशों में मां के मुकुट कश्मीर के ऊपर अफगानिस्तान दिखता है, वह पति परायणा गांधारी के निवास स्थान गांधार वाला क्षेत्र था। सातवीं शताब्दी में इस्लाम के आक्रमण के बाद सन 1876 ईस्वी में हम से कट गया। विश्व में एकमात्र हिंदू राज्य नेपाल जहां गोरखाओं का राज्य था, वह 1904 में हमसे पृथक हो गया। 1906 में भूटान भारत का हिस्सा नहीं रहा।  1914 में तिब्बत तो 1935 में श्रीलंका हमसे अलग हो गया। ब्रह्म देश कहां जाने वाला बर्मा (म्यांमार) 1937 ई. में भारत से काट दिया गया। जिस रावी के तट पर बैठकर सन 1929 ईस्वी में देश के नेताओं ने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया था, वो रावी आज भारत का अंग नही है। 1937 के कलकत्ता के कांग्रेस के अधिवेशन में वंदे मातरम का विरोध होता है और मां भारती का वंदना का यह गीत काट-छांटकर आधा कर दिया जाता है। वास्तव में जो कुछ भारत के साथ हुआ, जिसमें 1929 में पूर्ण स्वतंत्रता की मांग का स्थान रावी का तट, भगवान श्री राम के पुत्र लव द्वारा बताया गया लवपुर (लाहौर), भरत के पुत्र तक्ष द्वारा बताई नगरी तक्षशिला जो आचार्य चाणक्य की कर्मभूमि थी। वह आज की रावलपिंडी, सिख गुरु नानक देव का जन्म स्थान श्री ननकाना साहेब, 52 शक्तिपीठों में से सबसे प्रसिद्ध हिंगलाजगढ़ शक्तिपीठ आदि भारत माता के गौरव के स्थान हमसे कटकर पाकिस्तान बना दिया गया।
इसकी धीमी शुरुआत 1937 ईस्वी के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम गान के काटने से ही हो गई थी और उसी का परिणाम रहा कि 14 अगस्त 1947 ईस्वी को जब सारा देश को रहा था,नेताओं की बिसात पर पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान का निर्माण हो गया वही कालांतर में बांग्लादेश कहलाया। 15 अगस्त की सुबह भारतीयों ने गुलामी की बंदिशो को तोड़कर स्वतंत्रता का स्वाद तो चखा परंतु मां भारती के दोनों हाथ का देने के बाद। 1948 में धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर आधा हमसे कटकर चला गया, भगवान महादेव का निवास स्थान कहे जाने वाले कैलाश मानसरोवर की भूमि आज चीन के पास हैं, जहाँ उसने इस वर्ष यात्रा की अनुमति नही दी। जो भूमि 1857 ई. तक भी लगभग 83 लाख वर्ग कि.मी. हुआ करती थी वो आज लगभग 32 लाख वर्ग किलोमीटर ही रह गई है।।
ऐसे में जिस भूभाग को हम भारत कहकर स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, उसमें से कल कौन सा भाग अलग होकर नया देश बन जाए पता नहीं। ऐसा केवल इसलिए होता आया हैं कि हमने इस देश को मात्र भूमि (जमीन का टुकड़ा) माना, मातृभूमि नहीं। हमने देश को मातृभूमि माना होता तो क्या जब हमारी माता के अंग कट रहे थे तब हम ऐसे बैठे रहते?? हमारी मां की अस्मिता को लूटते हुए हम ऐसे  देखते रहते?? शायद नहीं।।
इसलिए इस भारत भूमि पर निवासरत विश्व की सबसे बड़ी युवा पीढ़ी को वास्तविकता का ज्ञान कराने के लिए 14 अगस्त को अखंड भारत संकल्प दिवस मनाया जाता हैं, ताकि कम से कम हमारे मानस पटल पर हमारी पूज्य भारत माता का अखण्ड चित्र तो रहे। विचार में भारत माता पूरे आकार में, अखंड रूप में हमारे सामने रहेगी तो कभी ना कभी धरातल पर भी हम उस विचार को साकार रूप दे सकेंगे। जब पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी एक हो सकते हैं, उतरी और दक्षिणी कोरिया एक होने का सपना देख सकते हैं, इजराइल के निवासी यहूदीयो को 1800 वर्षों बाद अपनी मातृभूमि पुनः प्राप्त हो सकती है, तो भारत की अखंडता का सपना पूरा क्यों नहीं हो सकता??
इसलिए स्वतंत्रता दिवस अवश्य मनाइए लेकिन इससे पहले अखंड भारत को याद कीजिए और अपनी भावी पीढ़ी को बताइए कि यह भूमि केवल मात्र भूमि नहीं है यह तो हमारी मातृभूमि है जिसका कोई भी अंग हमसे अलग ना रह पाए।  यह दिवस मनाना इसलिए भी जरुरी है कि जाने बिना माना नहीं जा सकता और माने बिना किया नहीं जा सकता। जानना ‘ज्ञान’ है और मानना ‘भक्ति’ व करना ‘कर्म’ है। ज्ञान, भक्ति और कर्म की त्रिवेणी के सामंजस्य के बिना कल्याण सम्भव नहीं है। इसलिए अखंड भारत क्या है, यह जाने।। हमारी भारत माता का वास्तविक चित्र कैसा है, जाने और कटे-फटे चित्र को अखंड कैसे बना सकते हैं, जो आज हैं वह हमसे कट ना जाये, इसका प्रयास करें क्योंकि किसी ने कहा है कि-
देश बचेगा तो मिटेगा कौन???
और
देश मिटेगा बचेगा कौन??
देश को अखंड बनाने के लिए कहीं महात्माओं ने जीवन की आहुति दी है और कई इसी राह पर चलकर जीवन को धन्य कर रहे हैं। चूंकि यह गंगा की अनवरत चलने वाली धारा है। जिस प्रकार गंगा को किसी भी बांध से रोका नहीं जा सकता, वह समुद्र में मिलेगी ही, उसी प्रकार अखंड भारत का स्वप्न पूरा निश्चित ही होगा।।
यह विश्व तो शक्ति का आराधक हैं। जो राष्ट्र शक्ति की पूजा एवं अर्चना करता है वही राष्ट्र अपना इच्छित लक्ष्य भी प्राप्त करता है और यह भारत सर्वशक्तिमान राष्ट्र बनेगा तभी हम पर परम् वैभव के लक्ष्य को पूरा कर सकेंगे।।

Post source : -पवन सिंह"अभिव्यक्त" मो. 9406601993

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