आपातकाल की कसक आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है

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जून महीना आते ही आपातकाल की यादें जोर मारने लगती हैं। कई दशक पहले का घटनाक्रम मन−मस्तिष्क में सजीव हो उठता है। 2005 में बिहार में जो घटनाएं हुई, उसने आपातकाल के दौरान मिले घावों को कुरेद दिया है। उसके बाद भी ऐसे कई मौके आए जब आपातकाल का जुल्म हमारे जहन में आने लगा।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम का अब तक कार्यकाल निस्संदेह आदर्श के रूप में याद किया जाने योग्य है, पर बिहार विधानसभा भंग करने के लिए जिस तरह उन्होंने फैक्स द्वारा भेजे गये कागजों पर हस्ताक्षर कर दिये, उसने जून 1975 का काला अध्याय दोहरा दिया। उनके लिए उचित रहता कि वे भारत आकर संविधान विशेषज्ञों से परामर्श कर ही कोई निर्णय लेते। अपनी सरकार न बनते देखकर इस नियम का प्रयोग भविष्य में अन्य दल भी अवश्य करेंगे।
भारत के संसदीय इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि कोई विधानसभा गठित हुए बिना ही भंग हुई हो। किसी को सदन में बहुमत सिद्ध करने का अवसर दिये बिना ही विधानसभा भंग करना नितांत अनुचित है। शासन का यह फासिस्ट रवैया 1975 की याद दिलाता है। 1971 में पाकिस्तान पर भारत की अपूर्व विजय हुई थी। इसमें सेना के साथ निरूसंदेह इंदिरा गांधी का साहस भी प्रशंसनीय था। यद्यपि शिमला समझौते में उन्होंने पाक अधिकृत कश्मीर लिये बिना 93,000 बंदियों को छोड़कर अच्छा नहीं किया। इसकी आलोचना भी हुई, पर विजय के उल्लास में यह आलोचना दब गयी।
इसके बाद इंदिरा गांधी निरंकुश हो गयीं। कांग्रेस का अर्थ इंदिरा गांधी हो गया था। देवकांत बरुआ जैसे चमचे ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ का राग अलाप रहे थे। संगठन और शासन दोनों के सारे सूत्र इंदिरा जी के हाथ में थे। ऐसे माहौल में ही सत्ताधीश तानाशाह हो जाते हैं। इंदिरा जी के आसपास बंसीलाल, विद्याशंकर शुक्ल, संजय गांधी, सिद्धार्थशंकर रे आदि का समूह बन गया। वह मनमानी कर रहा था। उधर समाजवादी नेता राजनारायण ने इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव में गलत साधन अपनाने पर मुकदमा ठोंक रखा था। इंदिरा जी के स्टेनो यशपाल कपूर ने सरकारी सेवा में रहते हुए उनके चुनाव में काम किया था। न्यायालय में उनके हारने की पूरी संभावना थी। इससे भी इंदिरा गांधी बहुत परेशान थीं।
इधर गुजरात के छात्रों ने चिमनभाई पटेल के भ्रष्ट शासन के विरुद्ध नवनिर्माण आंदोलन छेड़ दिया था। गुजरात से होता हुआ यह आंदोलन बिहार पहुंच गया। वहां इंदिरा गांधी के प्रिय अब्दुल गफूर की भ्रष्ट सरकार चल रही थी। युवाओं के उत्साह को देखकर अपनी उम्र के चौथेपन में पहुंचे जयप्रकाश नारायण ने इस शर्त पर नेतृत्व स्वीकार किया कि आंदोलन में हिंसा बिल्कुल नहीं होगी। पूरे देश और विशेषकर उत्तर भारत में ‘जयप्रकाश का बिगुल बजा तो, जाग उठी तरूणाई है, तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्वार पर आयी है…।। हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा…।। जयप्रकाश है नाम देश की चढ़ती हुई जवानी का।’ आदि नारों से गांव, नगर और विद्यालयों के भवन गूंजने लगे।
इंदिरा गांधी ने आंदोलन को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जनसंघ के नानाजी देशमुख, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गोविन्दाचार्य और सुनील मोदी आदि भी पूरी तरह सक्रिय थे। पटना रैली में लाठीचार्ज से जेपी को बचाने के लिए नानाजी उनके ऊपर लेट गये। नानाजी का हाथ तो टूट गया, पर जेपी बच गये। पांच जून 1975 को दिल्ली में विराट रैली हुई। उसमें जेपी ने पुलिस और सेना के जवानों से भी आग्रह किया कि शासकों के असंवैधानिक आदेशों को न मानें। 12 जून को प्रयाग उच्च न्यायालय ने इंदिरा जी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। इसी दिन गुजरात में चिमनभाई पटेल के विरुद्ध विपक्षी जनता मोर्चे को भारी विजय मिली। इस दोहरी चोट से इंदिरा गांधी बौखला गयीं। उन्होंने जेपी को गिरफ्तार कर लिया।
पूरे देश में इंदिरा गांधी पर त्यागपत्र देने के लिए दबाव पड़ने लगा, पर विधि मंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने आपातकाल का प्रस्ताव बनाया और इंदिरा गांधी ने कैबिनेट से इसे मंजूर करा लिया। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने रात में ही इस पर हस्ताक्षर कर दिये। इस प्रकार 26 जून को देश में आपातकाल लग गया। विरोधी दल के अधिकांश नेताओं तथा संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं को बंदी बना लिया गया। जब चंद्रशेखर, रामधन, कृष्णकांत और मोहन धारिया भी कांग्रेस में थे। ये इंदिरा गांधी के इस रवैये के विरोधी थे। इन्हें युवा तुर्क कहा जाता था। इन्हें भी बंद कर दिया गया। मीडिया पर सेंसर लगा दिया गया। देश एक ऐसे अंधकार−युग में प्रवेश कर गया, जहां से निकलना कठिन था।
आगे की कहानी बहुत लंबी है। इस तानाशाही के विरोध में ‘लोक संघर्ष समिति’ बनायी गयी। इसके बैनर तले सत्याग्रह हुआ, जिसमें देश भर में एक लाख स्वयंसेवकों तथा अन्य संगठनों के भी लगभग दस हजार लोगों ने गिरफ्तारियां दीं। इस सारे आंदोलन का सूत्रधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था। इंदिरा जी ने सबको बंदकर सोचा कि अब आंदोलन दब गया है। अतः उन्होंने चुनाव घोषित कर दिये, पर संघ का भूमिगत संजाल पूर्णतरू सक्रिय था। आनन फानन में जेल में बंद नेताओं से सम्पर्क कर जनता पार्टी के बैनर पर चुनाव लड़ने का आग्रह किया गया। अधिकांश बड़े नेता तो हिम्मत हार चुके थे, पर जब उन्होंने जनता का उत्साह देखा, तो वे राजी हो गये।
इंदिरा जी की भारी पराजय हुई। जनता पार्टी का शासन आया। पर उसमें अधिकांश कांग्रेसी और समाजवादी थे, अतः वे कुर्सियों के लिए लड़ने लगे। जिस संघ के कारण वे सत्ता तक पहुंचे, उसे ही उन्होंने मिटाना चाहा। परिणामस्वरूप जनता पार्टी टूट गयी। ढाई साल बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी फिर से जीत गयीं।
दुर्भाग्यवश मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग में जागरूकता का नितांत अभाव है। युवा वर्ग मस्ती और कॅरियर की भागदौड़ में व्यस्त है। राजनीतिक दलों और वर्तमान चुनाव व्यवस्था के प्रति मोहभंग के कारण जनता भी हताश सी है। ऐसे में फिर से 1975 के काले दिन न लौट आयें, इस भय से देश के लोकतंत्र प्रेमी चिंतित हो उठे हैं।

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