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आ गये चुनाव – बजने लगे ढोल गरीबी दूर करने के – – – – – !

 (डॉ. घनश्याम बटवाल, मंदसौर )

आज़ादी के सात दशक का आईना है ख्यात साहित्यकार और व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का कथन , वे लिखते हैं – अंग्रेजों ने अपने स्तर से देश का शोषण किया और  “इंडिया इज ब्यूटिफुल कन्ट्री ” कहते हुए छुरी – कांटे से ” इंडिया ” को खाते रहे , तब देशी खाने वालों ने कहा

” इंडिया ” तुमने ख़ालिया अब बाकी बचा ” भारत ” हमें खाने दो  ? तब कहा गया यह सत्ता का हस्तांतरण है ? जबकि यह तो

” ट्रांसफर ऑफ डिश ” हुआ । पहले वे खा रहे थे , अब ये खा रहे हैं ।

परसाई कहते हैं – अंग्रेज इंडिया को सलाद के साथ खाते थे , ये जनतंत्र को ” अचार ” के साथ खा रहे हैं ।

सरकारें बदली – सत्तारूढ़ दल बदले पर देश की आंतरिक हालात में बहुत बदलाव नहीं हुए । संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक आज भी देश में लगभग 20 करोड़ लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं । यह भी विडम्बना है कि देशवासी प्रति वर्ष 14 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का भोजन बर्बाद करते हैं ।

सीमा पर आतंक अपनी जगह है , उससे बड़ा आतंक देश में

” संपत्ति ” का आतंक व्याप्त है ।

मात्र एक प्रतिशत लोगों के पास देश का 75 से 99 प्रतिशत धन है तो बाकी 99 प्रतिशत जनता के पास केवल 10 प्रतिशत ही धन है । यह विषमता बढ़ रही है , कुंठाएं आकार ले रही हैं ।

मज़ेदार है कि हर सरकार यह दे – वह दे का लालच दे सिर्फ वोट बटोर रही है ?

सत्रहवीं लोकसभा के गठन की रणभेरी बज चुकी है । राजनीतिक दल और प्रत्याशी

” जनतंत्र ” के दरवाजों पर दस्तक देने लगे हैं । देश और गरीब की माली हालत सुधरे न सुधरे वे अमीर हैं , और अमीर होते जायेंगे

देश के नाम पर गरीबी दूर करने का ” ढोल ” जोर से और जोर से बजायेंगे ।

जिस लोकसभा के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है, उसमें कितना लोक (पब्लिक) शेष रहता है ? यह सवाल इस समय पूछने का हक हर भारतीय को है। यदि इस सवाल का जवाब पिछली लोकसभा को देखकर खोजे तो यह तथ्य सामने आता है कि ब्रिटेन  के हाउस आफ कामन्स की भांति संविधान सभा ने लोकसभा की कल्पना करते जिस सदन की रचना की थी, वो अब सामान्य भारतीय की जगह  करोडपतियों का सदन हो गया है।  ये करोड़पति भारत के गरीबों की योजना बनाने के उपक्रम में लगे हैं। किसी भी राजनीतिक दल से चुनकर आये सांसद के नामजदगी के समय जमा जानकारी को उठा लें। निष्कर्ष यही निकलेगा “गरीबों की पैरोकारी, उनके द्वारा जिन्होंने गरीबी देखी तक नहीं ।”

परिवारवाद और अन्य अनेक कारणों से अब सांसदों की जो खेप संसद में पहुंच रही है, उसे न तो गरीबी का भान है और न राष्ट्र की चिंता। वो तो परिवारवाद या अन्य किसी बैसाखी से सांसद होकर ए टी एम् (आल टाइम मनी) बना हुआ है जिसका लक्ष्य पैसे बनाना है। उस लोक (पब्लिक) से वो अब 5 साल बाद मिलेगा, जिसने उसे चुन कर लोकसभा में भेजा है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश के 521सांसदों में से  83  प्रतिशत अर्थात 430 सांसद करोडपति हैं। इस सूची में सबसे उपर भाजपा है जिसके  85 प्रतिशत सांसद करोड़पति हैं। 267 में से 227 । कांग्रेस के सांसदों के आंकड़े जिन्हें अपुष्ट[ सही जानकारी का अभाव] कहा जाता है  45 में से 29 सांसद इसी श्रेणी में आते हैं। अब जरा दलों के आधार पर गौर करें | तेलुगुदेशम के 100 प्रतिशत,शिरोमणि अकाली दल के भी 100 प्रतिशत, वाई एस आर सी पी, राष्ट्रीय जनता दल,जनता दल (सेक्युलर), जनतादल (यूनाईटेड) के सभी सांसद 100 प्रतिशत करोडपति हैं |

शिव सेना के 94 प्रतिशत,टीआर एस के 90 प्रतिशत।  एनसीपी के 86 प्रतिशत,समाजवादी पार्टी के 86 प्रतिशत,भाजपा के 85 प्रतिशत,लोक जन शक्ति पार्टी के 83 प्रतिशत, कांग्रेस के 82 प्रतिशत, ए आई डी एम् के 78 प्रतिशत, आप पार्टी के 75 प्रतिशत. बी जे डी के 72 प्रतिशत,सांसद करोड़पति है। इनमे से कई की घोषित सम्पत्ति 50 करोड़ या उससे अधिक है | इनमे 2 बार या उससे अधिक चुनकर आने वाले, परिवारवाद की बैसाखी पर चढकर संसद में पहुंचने वाले अधिक है जिन्होंने अभी गरीबी देखी ही नहीं है।

इन दिनों पार्टी का टिकट पाने के लिए कुछ भी करने की होड़ लगी है। टिकट न मिलने वाले, टिकट बेचने के आरोप भी लगा रहे हैं, ये आरोप हर चुनाव में लगते हैं। इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। संसद और विधानसभा के माध्यम जनता का प्रतिनिधित्व आसानी से पैसा बनाने की मशीन बन गया है। बिना कुछ करे धरे सम्पत्ति दिन दूनी रात चौगुनी बढती है। राजनीतिक दल गिरोह बनते जा रहे है,जिनमें पिस कर प्रजातंत्र अपना स्वरुप खो रहा है।  ऐसी करोड़पति लोकसभा और विधानसभा से लोकन्याय की उम्मीद करना कोई समझदारी नहीं है। फिर लोक क्या करे ? अभी तो मतदान करे और देखें कि उम्मीदवारों के गुण-अवगुण समान है, तो “नोटा” (इनमें से कोई नहीं) करे। लोकसभा से नदारद लोक की स्थापना पुन: तभी ही हो सकती है, जब आपको अपने मत की कीमत और उसका परिणाम पता हो।

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