ईरान ओर अमेरिका के विवाद से पेट्रोल-डीजल के दाम 100 के पार हो सकते है, जानें वजह…

Hello MDS Android App

भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम लगातार आसमान छू रहे हैं. निराशा की बात यह है कि इनके अभी और ऊपर जाने के आसार भी हैं. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने डीजल और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के विरोध में सोमवार को भारत बंद भी बुलाया. लेकिन इस मामले पर सरकार का कहना है कि तेल की कीमतें कई अंतरराष्ट्रीय वजहों से बढ़ रही हैं. साथ ही सरकार इसे उत्पाद शुल्क में कमी लाकर घटाने के पक्ष में भी नहीं है. हम यहां आपको बताएंगे कि सरकार पेट्रोल और डीजल पर शुल्क क्यों नहीं कम करना चाहती, लेकिन पहले जानिए कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के पीछे कौन सी वजहें हैं?

 

1. डॉलर के मुकाबले में रुपये का गिरना
हाल ही में रुपया गिरकर अपने अब तक के सबसे निम्न स्तर 72.12 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया था. फिर चूंकि भारत अपने कुल तेल का 80 फीसदी आयात करता है और वह दुनिया भर में तेल का सबसे ज्यादा आयात करने वाले देशों में तीसरे नंबर पर है. तो जैसे-जैसे रुपये के दाम गिरते जा रहे हैं, आयात मंहगा होता जा रहा है. ऐसे में पेट्रोल-डीजल के रीटेल दाम (जिसपर आप इन्हें खरीदते हैं) भी कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के हिसाब से बढ़ते जा रहे हैं.

 

2. पूरी दुनिया में बढ़ रही है कच्चे तेल की कीमतें

अमेरिका ने ईरान पर परमाणु प्रयोगों के चलते व्यापार प्रतिबंध लगा रखे हैं. ऐसे में ईरान के कच्चे तेल के निर्यात में कमी आई है. ईरान तेल का बड़ा निर्यातक देश है. और भारत ईरान के तेल का बड़ा आयातक है. ईरान से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाले देशों में भारत दूसरे नंबर पर है. पहले नंबर पर चीन है. अमेरिका ने अपने सहयोगियों को नवंबर से ईरान से तेल लेने से मना किया है. इसके पीछे अमेरिका का मकसद ईरान पर दबाव बनाना है. ऐसे में भारत को कच्चे तेल के लिए दूसरे देशों पर निर्भर होना पड़ रहा है. ऐसे में भारत को दूसरों से कच्चा तेल लेने के लिए ज्यादा कीमतें भी अदा करनी पड़ रही हैं. इसके अलावा भी तेल के उत्पादन में दुनियाभर में कमी आई है.

 

3. रेवेन्यू का सबसे बड़ा जरिया है पेट्रोल
पेट्रोल और डीजल जिस रेट पर ग्राहकों को मिलता है. उस रेट में 50 फीसदी सरकार का टैक्स होता है. ऐसी हालत में देश के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक इंडियन ऑयल जब डीलर को पेट्रोल 39.22 रुपये प्रति लीटर में बेचता है. तो उसके बाद पेट्रोल के रेट में डीलर का मुनाफा, राज्य का वैट और केंद्रीय उत्पाद शुल्क (सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी) भी जोड़ी जाती है. ये सब जुड़ने के बाद ग्राहकों के लिए पेट्रोल 80 रुपये प्रति लीटर हो जाता है. महाराष्ट्र इस वक्त पेट्रोल और डीजल पर मुंबई, थाणे और नवी मुंबई के इलाकों में सबसे ज्यादा टैक्स लगाता है. यही वजह है कि पूरे भारत में मुंबई में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सबसे ज्यादा होती हैं.

 

इसके अलावा चूंकि डीजल और पेट्रोल की कीमतें GST के दायरे में नहीं आती हैं. ऐसे में राज्य सरकारों पर इनपर VAT कम करने की कोई बाध्यता नहीं होती है. जिससे पेट्रोल और डीजल के दाम ज्यादा बने रहते हैं. हालांकि राजस्थान ने VAT कम करके पेट्रोल-डीजल के रेट में कटौती की है.

 

कीमतें बढ़ने पर क्या कहती है सरकार?
सरकार ने किसी भी तरह से उत्पाद शुल्क में कमी लाकर पेट्रोल और डीजल के आसमान छूते दामों से जनता को राहत देने से मना कर दिया है. उनका कहना है कि सरकार उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में बिल्कुल कमी नहीं करने वाली है. इसका सबसे सीधा कारण यह है कि ऐसा करने से देश का चालू खाता घाटा या करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) इस बार के लिए तय सीमा से कहीं ऊपर चला जायेगा. इसलिए सरकार का उत्पाद शुल्क को कम करने का बिल्कुल इरादा नहीं है.

 

क्या है चालू खाता घाटा?
देश के कुल निर्यात और आयात के बीच के अंतर को चालू खाता घाटा कहा जाता है. ध्यान रहे यहां निर्यात और आयात सिर्फ वस्तुओं से नहीं बल्कि वस्तुओं और सेवाओं के लिए भी किया जाता है. यानी किसी देश में वस्तुओँ और सेवाओं के आयात निर्यात के जरिए, कितनी विदेशी मुद्रा आती है और कितनी बाहर जाती है, उसके अंतर को चालू खाता घाटा कहते हैं.

 

सरकार के लिए कितना जरूरी है पेट्रोल से मिलने वाला टैक्स?
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल केंद्र सरकार ने 8 लाख करोड़ रुपये एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क), सर्विस टैक्स (सेवा कर) और GST के तौर पर वसूल किए थे. इसमें से 36 फीसदी टैक्स केवल पेट्रोलियम सेक्टर से वसूला गया था.

 

अभी पेट्रोल और डीजल के दामों के और ऊपर जाने की आशंका क्यों है?
पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी विदेशी परिस्थितियों को दोषी ठहराते हुए कहा था, “ओपेक देशों (तेल निर्यातक देशों का संगठन) ने पूरी दुनिया को आश्वासन दिया था कि वे 1 जुलाई से हर रोज 1 मिलियन मीट्रिक टन तेल का उत्पादन करेंगे. हालांकि जुलाई और अगस्त के आंकड़े देखें तो यह उत्पादन जुलाई और अगस्त के महीनों में इतना नहीं रहा है. ये कारण भारत के हाथ में नहीं हैं.”

 

पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों के पीछे जो परिस्थितियां हैं, उनमें जल्द सुधार आने के आसार नहीं है. साथ ही जिन राज्यों में चुनाव हैं, जैसे राजस्थान, मध्यप्रदेश (खासकर भाजपा शासित) आदि, उनके अलावा कोई VAT में भी कमी नहीं करेगा. जिससे जल्द पेट्रोल-डीजल के दामों में कमी नहीं आयेगी. जिसका मतलब है कि जनता पर मंहगाई की और मार पड़ सकती है. अगर पेट्रोल और डीजल के दामों में कमी लानी है तो या तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े कदम से आएगा या सरकार की ओर से उत्पाद शुल्क में कमी करके. लेकिन आम चुनावों में जब साल भर का वक्त भी न बचा हो तो सरकार अपने आंकड़ों को नहीं बिगड़ना चाह रही है.

About The Author

I am Brajesh Arya

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *