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उस दिन भारतीय नववर्ष मनाना सचमुच सार्थक हो जाएगा जिस दिन इस पवित्र वसुन्धरा पर गौ हत्या का कलंक मिटकर रक्त की एक बूंद भी नहीं गिरेगी-बंशीलाल टांक 

किसी भी शुभ कार्य-नवपर्व-नववर्ष पर एक दूसरे को मंगल बधाई-शुभ कामना प्रेषित करना कितना अच्छा लगता है। वायु की तरह कभी आंखों से नहीं दिखाई देेने वाले केमरे के परदे में कैद न होने वाले जिस निरंजन-निराकार परमात्मा पर ब्रह्म परमेश्वर ने गायों की रक्षा के लिये चकमक पत्थर, सूखी अरणी काष्ठ में विद्यमान अदृश्य अग्नि के रगड़ने पर प्रकट हो जाने की तरह राम रूप में साकार होकर अवतरित हुए थे उसी राम की पवित्र भूमि की गोद प्रतिदिन यदि हजारों की संख्या में गायों के रक्त से रक्त रंजित हो रही हो और स्वयं राज्य (केन्द्र सरकार) उनके (गायों) मांस को जहाजों में भरकर विदेशियों को भोजन के तौर पर भेज रहा हो। वहां फिर कैसा जश्न, कैसा उत्सव, ऐसा भी नहीं है कसाईयों के छुरों से-मशीनों से कटती-कराहती-चिखती-चिल्लाती- तड़पती गायों के हृदय को झकझोरने वाले दृश्य किसी परदे के पीछे होने से दिखाई नहीं दे रहे हो, सब कुछ सोश्यल मीडिया पर वायरल हो रहा है परन्तु हम है कि सब कुछ सामने देखकर भी अंधे-बहरे-गूंगे-मूक दर्शक की तरह सब कुछ देखते-सुनते-समझते हुए भी अनजान बने हुए हैै। सत्ता लोलुपता-सत्ता मोह में पड़कर सरकारे तो आजादी के 70 वर्ष बाद भी गाय को राष्ट्रीय पशु (माता) घोषित नहीं कर पाई है परन्तु जिन्हें हमने सत्ता सौंपी है। सरकार के उन नुमाईंदों में भी दबाव बनाकर गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगवाने में वै तो नाकाम साबित हो ही रहे हैं परन्तु उन्हें सत्ता सौंपने वाले क्या हम भी दोष के भागी नहीं है ?
कितना बड़ा दुर्भाग्य है हमारा कि जिस अंतिम औरंगजेब मुगल शासक को हिन्दूओं और सनातन धर्म का प्रबल विरोधी मानाा गया है। उसने भी अपने शासनकाल में गौ हत्या पर पूर्ण पाबंदी लगा दी थी परन्तु आज स्वतंत्र भारत में गौ हत्या पर कोई प्रतिबंध नहीं। एक तरफ हम चाहे रामनवमी मनाये, चाहे हिन्दू नववर्ष, गुड़ी पड़वा, खूब आनन्द-हर्षोल्लास से मनाये-मनाया जाना भी चाहिये। हमारा अपना पर्व है परन्तु जिन गांधीजी को चाहे कांग्रेस हो, बीजेपी हो अथवा अन्य दल सभी ने अपना आदर्श मानकर 2 अक्टूबर को गांधीजी का जन्मदिवस और 30 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि खूब जोर-शोर-उत्साह से क्यों न मनाती आ रही हो परन्तु जिन गांधीजी ने आजादी के बाद जब तक देश से गोहत्या का कलंक नहीं मिटेगा, आजादी अधूरी रहेगी कहा था का पालन केन्द्र की किसी भी पार्टी द्वारा नहं किये जाने से गांधी जयंती महोत्सव अथवा पुण्यतिथि पर गांधीजी की आत्मा को श्रद्धांजली देना क्या कहा जायेगा, नाटक ढकोसला अथवा मात्र औचारिकता ?
बड़ा दुःख वेदना होती है कि नववर्ष के इस पावन अवसर पर भगवान सूर्य की प्रथम रश्मि को जहां गंगा-जमुना-नर्मदा-कावेरी-क्षिप्रा-गोदावरी-सरजू आदि मॉ सलिलाओं की पवित्र धारा में खड़े होकर अर्ध्य दे रहे होंगे वहीं दूसरी ओर जन्मदात्री माँ से बढ़कर हमारा पालन पोशण करने वाली हजारों गौ माताओं का रक्त भी धरती माँ को लाल कर चुका होगा।
आईये, गोपालक भगवान कृष्ण, राम, अहिंसा के अवतार भगवान महावीर गौतम की इस भारतीय नववर्ष पर हम दृढ़ इच्छा शक्ति से यह संकल्प ले कि आगामी नववर्ष पर प्रातःकालीन शुभ बेला में  जब भगवान सूर्य को जल से अर्ध्य दे रहे होंगे तब यह धरती माँ गौमाता के एक बूंद रक्त से भी अभिशप्त नहीं होगी और तब हमारा मात्र दो हजार अठारह नहीं बल्कि लाखों वर्षों प्राचीन सनातन नववर्ष मनाना सार्थक हो जावेगा।
नववर्ष के इस पावन अवसर पर नवचिन्तन, नवीन विचार, नवीन भाव के साथ हम राष्ट्र की सुख-शांति-समृद्धि के लिये सहभागी बने।
शुभमस्तु।

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