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ऋषियानन्द आश्रम पर मनाया गया दशहरा पर्व

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  • गंगाजी के श्री विग्रह का हुआ पूजन अभिषेक, संतों के हुए प्रवचन

मन्दसौर। तेलिया तालाब टेकरी स्थित श्री ऋषियानन्द आश्रम पर 4 जून को गंगा दशमी (गंगा अवतरण) महोत्सव मनाया गया। प्रारंभ में क्षेत्र में एक मात्र आश्रम स्थित गंगा मंदिर में गंगाजी के श्री विग्रह का पूजन अभिषेक आरती की गई।
पूज्य संत श्री आत्मविद्यानन्दजी महाराज फतेहगढ़, चैतन्य आश्रम मेनपुरिया के संत श्री नित्यानंदजी महाराज, मन्नुपूरीजी महाराज हरिद्वार, देवस्वरूपजी महाराज रतलाम का सानिध्य प्राप्त होकर सभी संतों ने गंगाजी की महिमा पर प्रकाश डालते हुए गंगा जल को ओर नदियों की तरह जल नहीं बताते हुए उसे अमृत बताया। देवासुर संग्राम मे समुद्र मंथन के समय जो अमृत निकला था वह तो देवताओं और दैत्यों में बट गया परन्तु कलयुग में गंगाजल प्रत्यक्ष अमृत के समान है। गंगा केवल पाप ही नहीं धोती, मन के विकारों और शरीर के रोगों को भी दूर कर देती है।
उल्लेखनीय है कि गंगाजी ब्रह्मलीन, ब्रह्मनिष्ठ, सिद्धसंत श्री ऋषियानंदजी महाराज की परम् आराध्या और इष्ट थी, इसलिये स्वामीजी ने मंदसौर में जीवागंज में कुटिया के पश्चात् तेलिया टेंक पर जो आश्रम बनाया। माँ गंगाजी के श्रीविग्रह की भी प्रतिष्ठापना की। स्वामीजी का वृद्धावस्था में जब आश्रम पर विराजित थे और शरीर से हरिद्वार जाने में असमर्थ हो गये थे तो स्वामीजी के लिये नगर के ही एक भक्त द्वारा रेल से गंगाजल टीन के डिब्बे में मंगवाया जाता था जिसे स्वामीजी स्नान करते थे और गंगाजल का भी पान करते थे।
गंगाजी द्वारा एक महिला का रूप धारण कर प्रत्यक्ष रूप से जंगल में स्वामीजी और अन्य संतों को भोजन कराने की प्रत्यक्ष घटना का उल्लेख करते हुए स्वामीजी ने स्वयं बताया था कि जब युवा अवस्था में सन्यास धर्म की दीक्षा लेकर गंगाजी के किनारे तीन महात्माओं के साथ विचरण करते हुए जंगल में बहुत दूर निकल गये तब दिन के 12 बजे का समय हो गया था। आसपास कोई बस्ती नहीं थी और जब भूख सताने लगी तब जब स्वामीजी ने गंगाजी का स्मरण किया तो पीछे से दूर से एक वृद्ध महिला अपने सर पर भोजन जिसमें रोटी सब्जी तथा छाछ का मटका था टोकरे में रखकर पीछे से आवाज लगाकर संतों को रोका और अपने हाथ से भोजन कराया। सतों द्वारा परिचय पूछने पर उसने थोड़ी दूर पर चपरों (तीन-चार कच्चे घरों के मकान) में रहना बताया और वहां से थोड़ी दूर जाकर ओंझल हो गई। महात्माओं को बड़ा आश्रय हुआ कि अचानक यह माई जंगल में कहा से आ गई और उसको कैसे मालूम था कि हम भूखे है और इस रास्ते से जा रहे है। महात्माओं ने जब जिधर से महिला ने आने का इशारा किया था वहां जाकर देखा तो कोई बस्ती नहीं थे, तीन-चार झोपड़े थे जिनमें किसान अपनी खेती के औंजार आदी रखते थे जिनको फसल की देखरेख के लिये गंगा के पार बहुत दूर से आते थे और शाम को वापस चले जाते थे। उन्होंने कभी किसी ऐसी महिला को नहीं देखा जो संतों को भोजन कराने के लिये आती हो। तब स्वामीजी ने संतों से कहा कि देखों वो माई और कोई नहंी थी । साक्षात गंगामाई ही थी जिसने हमें भोजन कराया। इस घटना से सिद्ध होता है कि, मन चंगा तो कटोती में गंगा वाला प्रसंग असत्य नहीं है।
उपस्थित रहे- ट्रस्ट अध्यक्ष ओमप्रकाश पोरवाल, सचिव ओमप्रकाश सोनी, भेरूलाल पाटीदार, कन्हैयालाल पण्ड्या, मदनलाल सोनी, बंशीलाल टांक, भेरूलाल जायसवाल, पं. शंकरलाल त्रिवेदी आदि बड़ी संख्या में महिला पुरूष उपस्थित थे। महेश गेहलोत तथा कैलाश डांगी ने गंगा परक भजन प्रस्तुत किये। संचालन ओमप्रकाश सोनी ने किया। आभार ओमप्रकाश पोरवाल ने माना। अंत में महाप्रसादी हुई।

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