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ऐतिहासिक स्‍थल

ऐतिहासिक स्‍थल

मन्‍दसौर शिवना नदि के उत्तरी किनारे पर स्थित प्राचीन ताम्राश्‍मयुगीन टीले पर बसा है। इसका प्राचीन नाम दशपुर है जिसका अभिलेखिक प्रमाण ईसा की दूसरी शताब्‍दी पूर्व का है। मत्‍स्‍यमहापुराण में इसे ‘दशपुर’ तथा कुमारगुप्‍त बन्‍धुवर्मन के अभिलेख में ‘पश्चिमपुर’ कहा गया है। इस नगर को 5 वीं – 6 ठी शबाब्‍दी में महान औलिकर सम्राटों के साम्राज्‍य की राजधानी होने का सौभाग्‍य मिला है। 7 वीं शबाब्‍दी से 14 वीं शताब्‍दी तक दशपुर का इतिहास अन्‍धकारमय व अटकलों पर ही टिका है।

मन्‍दसौर किला

मन्‍दसौर दुर्ग को लोग अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित मानते हैं जो त्रुटिपूर्ण है। वास्‍तव में इस दुर्ग का निर्माण हुशंगशाह गौरी (1405-1434 ई.) ने अपने राज्‍य की उत्तर-पश्चिमी सीमा को सुरक्षित रखने हेतु करवाया था। तब से यह माण्‍डू के शासकों की गतिविधियों का केन्‍द्र रहा। गियासशाह (1469-1500 ई.) के सैनिक अधिकारी मुकबिलखान ने 7 अप्रैल, 1498 को इस किले के दक्षिण-पूर्व में स्थित सिंहद्वार (नदी-दरवाजा) का निर्माण कराया। 1519 में राणा साँगा ने इस किले पर अधिकार कर अशोकमल राजपूत को इसका किलेदार नियुक्त किया था। मार्च-अप्रैल, 1535 में बहादुरशाह गुजराती पर आक्रमण करने आए हुमायूँ ने इसमें लगभग 1 माह 10 दिन तक निवास किया था। हुमायूँ के पतन के बाद 1542 में यह किला शेरशाह सूरी के कब्‍जे में आ गया तो उसने सदरखाँ को इसका किलेदार बनाया। 1561 में अकबर ने बाजबहादुर को पराजित कर इस पर कब्‍जा कर यहाँ सादिकखाँ को नियुक्त किया। 1580 में अकबर ने अपने साम्राज्‍य-संगठन को सुव्‍यवस्थित किया और प्रत्‍येक सूबे को अनेकानेक सरकारों में विभक्त कर प्रत्‍येक सरकार के अंतर्गत कई एक महलों या परगनों को संगठित किया तब मन्‍दसौर नगर इस क्षेत्र की सरकार का मुख्‍य स्‍थान बना। इस समय मन्‍दसौर सरकार में सत्रह महल थे। इस समय उजड़ा हुआ मन्‍दसौर पुन: बसना प्रारम्‍भ हुआ। इस समय श्रीमाल महाराज मानसिंह ने इस क्षेत्र को आबाद करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा की इसलिये अकबर ने उसे ग्राम ग्रानपुरा (ज्ञानपुरा) प्रदान किया। इनके वंशजों में अमरसिंह श्रीमाल, श्रृंगारगली, मन्‍दसौर मौजूद है। 1597 में अकबर के मुरीद वहीदउद्दीन काजी ने खिलचीपुरा में परकोटे का निर्माण कराकर इसे सँवारा। शाहजहाँ के समय माथुर कायस्‍थ नाजरमल की कानूनगो के पद पर मन्‍दसौर में नियुक्ति सन् 1596 में हुई व उन्‍हें करनाखेड़ी की जागीर दी गई। इनके वंशज अब भी हवेली वाले कहलाते हैं। इनमें रतनसिंह माथूर व इनका परिवार है। किले में पक्‍की व स्‍वतंत्र जामी मस्जिद शाहजहाँ के समय मन्‍दसौर सरकार के प्रमुख सैय्यदशाह अली ने सन् 1653 में डेर मिस्‍मात कर बनवायी। वर्तमान के सराफा बाज़ार की नींव 1672-73 में बनीदास की प्रार्थना पर औरंगजेब के सेनापति सरबलन्‍दखान के एक अधिकारी मिर्जा मोमिन ने डाली। इसी समय खिलचीपुरा में नेमातखान अफगान पदस्‍थ था उसने 1670-71 में एक बुर्ज व हवेली का निर्माण कराया था। इसी वर्ष मिर्जा मोमिन ने धर्मान्‍तरित कुंजड़ों की मस्जिद का निर्माण कराया। यह मस्जिद बाद में टूट गई थी, जिसे 2 दिसम्‍बर, 1801 में कुंजडों ने पुन: निर्मित करवाया था। इस किले पर जोधपुर के किशोरसिंह के अधिकारी का भी उल्‍लेख मिलता है। जिसमें कालूखेड़ा के चन्‍द्रावत सूरतसिंह से निकाल भगया था। इस वहज से देहली दरबार ने उसे तालीदाना, सेमलिया, नाथा लसुड़िया, चकलाना, भगराला, जड़वासा, आदि ग्राम प्रदान किये थे। महाराजकुमार डॉ. रघुबीरसिंह की धारणा थी कि औरंगजेब कभी मन्‍दसौर नहीं आया, परंतु औरंगजेब द्वारा प्रताबगढ़ के महारावत प्रतापसिंह को हिजरी 1090 (1769 ई.) के पत्र से डॉ. रघुबीरसिंह की धारणा का खण्‍डन होता है। मन्‍दसौर संग्रहालय में औरंगजेब के काल का खण्डित फारसी अभिलेख है। औरंगजेब में अपने एक मुकाम के दौरान मन्‍दसौर में खाकी सम्‍प्रदाय के महंत को जागीर देने का प्रमाण मिलता है। औरंगजेब के उत्तराधिकारी बहादुरशाह (1707-1712 ई.) के काल में 26 अगस्‍त, 1709 को मन्‍दसौर का फौजदार दिलावर खान नियुक्त किया गया। इस समय तक मन्‍दसौर का सरकार के रूप में अस्तित्‍व समाप्‍त हो चुका था और यह अब उज्‍जैनी सरकार के 32 महलों में से एक रह गया। फरवरी, 1733 में मालवा के मुगल सूबेदार आम्‍बेर महाराजा सवाई जयसिंह ने इस किले में डेरा किया किन्‍तु मराठों के हाथों पराजित होने के कारण यह किला मुगलों के हाथ से निकलकर मराठों के पास पहुँच गया। मराठों के समय में भी यहाँ मुस्लिम अधिकारी ही पदस्‍थ रहे। सन् 1752 में यहाँ अब्‍दुल बेग पदस्‍था था। सन् 1958 में नाजरमल माथुर के वंशज गजपतराय ने महादजी के पुत्र जनकोजीराव के नाम से जनकपुर बसाया जो अब जनकूपुरा कहलाता है। 1761 में प्रख्‍यात पानीपत की तीसरी लड़ाई लड़ी गयी इसमें उसके इस अधिकृत क्षेत्र से बेहपुर के देवड़ा ठाकुर उगरजी ने भाग लिया व वीरगति प्राप्‍त की। सन् 1763 में महाराणा उदयपुर ने मन्‍दसौर पर चढ़ाई की तब यहाँ के लोगों ने राजपूत-मराठा संघर्ष झेला। 1769-70 र्इ. में इस किले में पीरखाँ नियुक्त था जिसने नदी दरवाजे के पास एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। 1778 में मेवाड़ी सेना से पराजित होकर जावद का मराठा अधिकारी नाना सदशिवराव ने भाग कर इसी दुर्ग में शरण ली थी। जब यह समाचार अहिल्‍याबाई व महादजी के पास पहुँचा तो उन्‍होंने अपनी संयुक्त सेनाओं को मन्‍दसौर भेजा जिसकी मदद से नाना चल्‍दू का युद्ध जीता।
मन्‍दसौर में महादजी सिंधिया के समय में प्रख्‍यात मराठा सेनापति जीबवा दादा बक्षी (1775-90) भी यहाँ पदस्‍थ रहा जिसने इस क्षेत्र से अपार सम्‍पत्ति अर्जित कर गोवा के पास अपने पैतृक गाँव में बाँध बनवाया।
यशवंतराव होल्‍कर ने मन्‍दसौर को कई बार लूटा परन्‍तु स्‍वयं सिन्धिया की सहमति से उसने सबसे बड़ी लूट मन्‍दसौर में 1804 में की। अत्‍यधिक व्‍यवस्थित लूट करने बाबत होल्‍कर ने किले के 12 दरवाजों व अन्‍य नाजुक स्‍थानों पर 20 तोपें लगा दी। लूट के लिये प्रत्‍येक गली में अफसर, बेलदार व गणक की नियुक्ति कर प्रत्‍येक को लूटा। केबल सूबे के घर को छोड़कर मराठों ने कोई घर न छोड़ा। इस लूट में नगद रूपये, जवाहरात आदि सब मिलाकर 60 लाख रूपये की लूट की। मल्‍हारराव होल्‍कर द्वितीय के सेनापति ‘तांतिया जोग’ व सर जान माल्‍कम के बीच इसी दुर्ग में इतिहास प्रसिद्ध 1818 की सन्धि हुई।
1857 के प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजों के अधीनस्‍थ से यह किला मुगल वंश के शाहजादा फिरोज ने छीन लिया। इसी दुर्ग में 26 अगस्‍त, 1857 को उसका राज्‍यारोहण आयोजित किया गया। 24 अक्‍टूबर, 1857 को उसकी सेना ने जीरन में अंग्रेजों को पराजित कर दो अंग्रेज अधिकारी केप्‍टन रीड व टक्‍कर की मुण्डियाँ किले के पश्चिमी द्वार पर टाँग दी थीं। जिसके बाद में इस दरवाजे का नाम मुण्‍डी दरवाजा पड़ा, जो अब मण्‍डी दरवाजा कहलाता है। फिरोज ने 92 दिन तक मन्‍दसौर पर राज्‍य किया। संग्राम की समाप्‍ति के बाद अंग्रेजों ने मण्‍डी दरवाजे के सामने ही देशभक्तों कासे फाँसी दी। अंग्रेजों के आदेश से इस किले के दरवाजे निकाल लिए गए , दीवारें उड़वा दी गई।
दुर्भाग्‍य से किले में कोई दर्शनीय स्‍मारक नहीं बचा है शक्‍कर बावड़ी, जनानी बावड़ी का जल अनुपयोगी है। शाही हमाम अब शौचालय के रूप में प्रयुक्‍त होता है। कलेक्‍टरेट, न्‍यायालय आदि अनेक कार्यालयों के अलावा दूरदर्शन केन्‍द्र स्थित है। कलेक्‍टर उद्यान में परशुधारी शिव की 12 फीट 6 इंच ऊँची प्रतिमा तथा तोरण द्वार दर्शनीय है। मन्‍दसौर शहर में अनेक जैन मन्दिर, नरसिंह मन्दिर, चिन्‍तामण गणेश मन्दिर, जगदीश मन्दिर, पंचमुखी हनुमान, गोवर्धननाथ मन्दिर, टोड़े वाले बाबा की दरगाह, नाहर सैय्यद की दरगाह हादि दर्शनीय है।

अष्‍टमुखी शिव (पशुपतिनाथ)

यह प्रतिमा सोमवार 10 जून 1940 में शिवना के गर्भ से उदाजी धोबी को प्राप्‍त हुई थी। बाबू शिवदर्शनलाल जी अग्रवाल ने इसे घाट पर लाकर रखवाया। पुज्‍य प्रत्‍यक्षानन्‍दजी ने अपने अथक प्रयासों से 24 नवम्‍बर 1961 में इसे प्रतिष्ठित कराकर इसे ‘पशुपतिनाथ’ नाम प्रदान किया व मन्दिर निर्माण का श्रीगणेश किया।
पशुपतिनाथ की यह दुर्लभ प्रतिमा 7.25 फीट ऊँची, गोलाई में 11.25 फीट तथा वजन में 125 मन (पक्‍का) या 46 क्विंटल 65 किलो 525 ग्राम है। शिल्‍पशास्‍त्र के अध्‍येताओं के अनुसार यह प्रतिमा गुप्‍त औलिकर युग में निर्मित जान पड़ती है। (अर्द्धनिर्मित मूल प्रतिमा) सम्‍पूर्ण विश्‍व में अष्‍टमुखी शिव की यह एक मात्र प्रतिमा है जो इतनी विशाल, अलंकृत, प्रभावोत्‍पादक व प्राचीन है।
इस मन्दिर के समीप अनेक देवालयों का का निर्माण हो चुका है। इनमें राम मन्दिर, दुर्गा मन्दिर, गायत्री मन्दिर, हनुमान मन्दिर एवं गणपति मन्दिर आदि प्रमुख है। प्र‍त्‍येक कार्तिक माह में यहाँ 10 दिवसीय मेला भरता है। जिसमें लाखों श्रद्धालु दर्शन कर पुण्‍य अर्जित करते हैं। दर्शनार्थियों के लिए मन्दिर प्रांगण में ही धर्मशाला एवं भोजन की सुविधा उपलब्‍ध है।

गांधी सागर बांध

प्राचीन स्‍मारकों से भरपूर इस जिले में आधुनिक तीर्थ स्‍थल गॉधीसागर बॉध भी विद्यमान हैं। जो प्राकृतिक सौन्‍दर्य से युक्‍त हैं। विज्ञान एवं तकनीक में रूचि रखने वालो के लिये विद्युतगृह देखने की व्‍यवस्‍था भी यहॉ हैं । सुन्‍दर विद्यमान में स्थित चम्‍बल माता की प्रतिमा आर्कषण का केन्‍द्र हैं, जिसे प्रतीकात्‍मक ढंग से राजस्‍थान व मध्‍यप्रदेश की जीवनदायिनी के रूप में अंकित किया गया हैं। बरसात में समस्‍त जिले से पर्यटक यहॉ आते हैं। यहॉ स्थित वन्‍य क्षेत्र में अभ्‍यारण्‍य के रूप में विकसित होने की पूर्ण क्षमता निहित हैं अभी भी कई लोग वन्‍य जीव देखने यहॉ आते हैं।
देश की आजादी के बाद डॉ. कैलाशनाथ काटजू (मुख्‍यमंत्री, म.प्र.) के प्रयासों से भारत की प्रथम विद्युत परियोजनान्‍तर्गत गांधीसागर बांध का निर्माण किया गया। बांध निर्माण के कारण यह नदी एक विशाल जलाशय में बदल गयी है। यह जलाशय गांधीसागर के नाम से जाना जाता है।
13.30 करोड़ की लागत से बने गांधीसागर बांध का शिलान्‍यास तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने दिनांक 7 मार्च 1954 को किया था। 63.3 मीटर ऊँचे व 513.6 मीटर लम्‍बे इस बांध का उद्घाटन भी पण्डित नेहरू ने श्रीमती इन्दिरा गांधी के जन्‍म दिवस पर 19 नवम्‍बर 1960 को अपने कर-कमलों से किया। इस बांध के निर्माण से जिले के 59 ग्राम पूर्ण रूप से 196 ग्राम आंशिक रूप से डूब में आये।
गांधी सागर जलाशय 26.1 कि.मी. चौड़ा 67.8 कि.मी. लम्‍बा है। इसकी अधिक गहराई 58.4 मीटर या 191.6 फीट है। विद्युत मण्‍डल गांधी सागर के अनुसार जब जलाशय का जल स्‍तर 1312 फट हो तब प्रतिदिन 27 लाख 60 हजार यूनिट विद्युत उत्‍पादन होता है। जल स्‍तर 1250 फुट होने पर प्रतिदिन 18 लाख यूनिट बिजली पैदा होती है। इस जलाशय का उपयोग केवल विद्युत उत्‍पादन, मछलीपालन तथा जल स्‍तर कम होने पर कृषि करने में किया जाता है। डूब की भूमि छ: क्विंटल प्रति एकड़ के मान से खाद्य का उत्‍पादन होता है। 115 मेगावाट बिजली का उत्‍पादन भी होता है। भानपुरा तहसील के चौरासीगढ़ को पार कर यह नदी राजस्‍थान में प्रवेश करती है। कुल 965 कि.मी. की यात्रा के बाद यह बटेश्‍वर (पंचनद क्षेत्र) जिला इटावा (उत्तर प्रदेश) में यमुना से मिलती है।

खीलचीपुरा

मन्‍दसौर से दक्षिण में कोई 1 कि.मी. दूर स्थित खिलचीपुरा मौर्ययुगीन बस्‍ती है। प्राचीनकाल में इसका नाम क्‍या था यह तो ज्ञान नहीं हो सका। सम्‍भवत: यह दशपुर की एक उपबस्‍ती रही होगी। 14 वीं शताब्‍दी के पूर्वाद्ध में यह नगर मस्लिम आक्रमण के समय उजाड़ दिया गया। 1458 ई. में महमूद खिलजी ने मेवाड़ से लौटते समय खिलचीपुरा में डेरा लगाया था, ऐसा उल्‍लेख मिलता है।

यह औलिकर सम्राट यशोधर्मा के समय महत्‍वपूर्ण नगर था। यहाँ यशोधर्मा ने अभयकूप खुदवाया था, जो वर्तमान में बावड़ी कंला कहलाता है। इस कूप के समीप प्रतिहार राजा महेन्‍द्रसिंह द्वितीय ने संवत् 1004 में एक देवालय बनवाया था जिसका अभिलेखयुक्‍त परिवर्तित स्‍वरूप आज भी देखा जा सकता है। खिलचीपुरा में एक प्रतिहार युगीन शिवालय है, जो सूर्य मन्दिर के नाम से जाना जाता है। गाँव के पूर्व में स्थित धोरेश्‍वर महादेव मन्दिर में तहसील का सबसे बड़ा शिवलिंग प्रतिष्ठित है। अनुश्रुति हे कि यहीं कालीदास का जन्‍म हुआ था। गाँव में एक मकान के समीप बादशाह अकबर के समय का अभिलेख लगा है इससे ज्ञात होता है कि 1562 ई. में वहीदउद्दीन काजी ने इसे सँवारा व इसके चारों तरु परकोटा बनवाया था। धोरेश्‍वर मन्दिर के सामने कभी अफगान नेमातखान की दुमंजिला हवेली थी जो अब नष्‍ट हो गयी है। इसके समीप बना विशाल बुर्ज व उस पर लगा अभिलेख इस बात का प्रमाण है। कि नेमातखान ने औरंगजेब के काल में ई. सन् 1670-71 में यह बुर्ज व हवेली बनाई थी। खिलचीपुरा के पश्चिम में विशाल प्राचीन तालाब है। इसके दूसरे किनारे पर नालछा माता का मन्दिर दर्शनिय है।

अफजलपुर

मन्‍दसौर से दक्षिण-पूर्व में कोई 22 कि.मी. दूर अफजलपुर प्राचीनकाल में ‘मड़’ के नाम से जाना जाता था। यह प्रतिहार व परमार काल में शैव व शक्त सम्‍प्रदाय का विशाल केन्‍द्र था। यहाँ तांत्रिक सम्‍प्रदाय की अनेक दुर्लभ प्रतिमाएँ हैं जिनमें भैरवी, चामुण्‍ड़ा, विनायकी, भेरव, वराही आदि प्रमुख है। भारत की सबसे विशाल (10 फीट लम्‍बी, 46 इंच चौड़ी व 32 इंच मोटी) पंखयुक्त, मुण्‍डों की माला पहिने हनुमान की प्रतिमा यहीं स्थित है।

मड़ का विनाश भी मन्‍दसौर पर हुए मुस्लिम आक्रमण के दौरान हुआ होगा। मीरादाता के झालरे में 14 वीं शताब्‍दी का अरबी का एक अस्‍पष्‍ट लेख लगा है जो इस बात की पुष्टि करता है। मड़ का वर्तमान नाम अफजलपुर है। चन्‍द्रावतों के पटनामें में उल्‍लेख है कि मड़ का ठा. श्‍याम दुरगावत धर्मन्‍त के युद्ध में मारा गया था। सम्‍भवत: अफजलपुर नाम औरंगजेब के समय पड़ा होगा। लखारों की मस्जिद पर संवत् 1863 (1706 ई.) के अभिलेख में यह नाम सर्वप्रथम प्रयोग किया गया है। शाहजादा फिरोज ने (1857 ई. में) यहाँ रूककर शाह करघी की दरगाह देखी थी। वर्तमान में यहाँ मीरा दाता का मजार बना है। यह चिल्‍ला है जो तारागढ़ दुर्ग (अजमेर) के युद्ध में सन् 1202 में मारे गये मीरान सय्यद की स्‍मृति में बनाया गया है। यहाँ भावसारों का मन्दिर एवं शिव मन्दिर दर्शनीय है।

सीतामऊ

स्‍वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व सीतामऊ जोधपुर के राठौर राज्‍यवंश से सम्‍बन्धित एक स्‍वतंत्र राज्‍य की राजधानी था। इस राजवंश द्वारा निर्मित अनेक महल दर्शनीय है। नगर के मुख्‍य मार्ग पर बनी राजपूत शैली की अनेक इमारतें मध्‍ययुगीन वैभव की याद दिलाती है। यहाँ स्‍वर्गीय डॉ. रघुबीरसिंह द्वारा स्‍थापित ‘श्री नटनागर शोध संस्‍थान’ नामक शोध केन्‍द्र है जिसमें सैंकड़ों हस्‍तलिखित व मुद्रित ग्रन्‍थ है।

लदूना

लदुना स्थित सेवाकुजं (विशाल झील के बीच बना एक मंदिर) प्राकृतिक सौन्‍दर्य से युक्‍त एक अत्‍युत्‍तम स्‍थल हैं। शांत, सुरम्‍य, प्राकृतिक सौन्‍दर्य युक्‍त यह स्‍थान काफी अच्‍छा पर्यटन स्‍थल हैं।
सीतामऊ से कोई 3 कि.मी. दूर स्थित लदूना सीतामऊ राज्‍य की प्रारम्भिक राजधानी रहा। लवसागर नामक तालाब के बसने के कारण इसका नाम लदूना पड़ा, ऐसा लोगों का कहना है। अनुश्रुतियों के अनुसार इस तालाब का निर्माण बंजारों ने कराया था। बंजारों के बाद यहाँ मीणों व मीणों के बाद धांदू राजपूतों ने यहाँ राज्‍य किया। 17 वीं शताब्‍दी के पूर्वार्द्ध में रतलाम राज्‍य के प्रथम शासक राव रतनसिंह ने इस ग्राम को धांदू राजपूतों से छीनकर अपने राज्‍य में मिला लिया। रतनसिंह की धर्मन्‍त युद्ध में मृत्‍यु के बाद उसके पाँचवें पुत्र छत्रसाल को यह कस्‍बा प्राप्‍त हुआ। 1767 में छत्रसाल औरंगजेब का मनसबदार बना। उसके बाद उसने अपने निवास के रूप में इस भवन की प्रारम्भिक नींव डाली। धीरे-धीरे परवर्ती शासकों ने इस भवन का विकास किया जिसका परिणाम वर्तमान भवन है, जो दर्शनीय है।
लवसागर के पूर्वी तट पर स्थित इस तिमंजिलें राजप्रसाद में चार कक्ष व दो बड़े हॉल है। प्रवेश द्वार के दाई ओर देवालय है। गढ़ में प्रवेश होत ही सामने प्रांगण में भूल-भुलैया पद्धति की जल प्रणालिकाएँ व फव्‍वारें बने हुए हैं। यह पद्धति माण्‍डू के जहाज महल की भाँति है। तालाब की ओर से देखने पर यह स्‍मारक चित्तौड़गढ़ के रत्‍नेश्‍वर जैसा प्रतित होता है। ऊपर के गुम्‍बज फ्लटेड हैं और 16-17 वीं शताब्‍दी के स्‍थापत्‍य की विशेषता से युक्त है। महराब, कपोतालिकाएँ और गवाक्ष सभी आमेर के राजप्रसादों के अनुरूप है। सीतामऊ के भूतपूर्व महाराज राजसिंह (1802-1867) का मुख्‍य निवास होने के कारण इसे ‘राज निवास’ भी कहा जाता है।

घसोई

पुरातात्त्विक साक्षों से यह नगरी मौर्ययुगीन ज्ञात होती है। यहाँ गधेय्या मुद्राएँ भी काफी मात्रा में मिली है। कहते हैं कि यह गर्दमिल्‍ल राजा की राजधानी थी। यहाँ सन् 1256, 1266 व 1277 के अभिलेख मिले हैं। राजा जयसिंहदेव के शासनकाल के अभिलेख में इसका नाम ‘घोषवती’ कहा है। इस समय में यहाँ दल्‍ला की पत्‍नी के सती होने का भी उल्‍लेख मिलता है। यहाँ से बौद्ध, जैन, शैव व वैष्‍णव सम्‍प्रदाय की अनेक प्रतिमाएँ, द्वार-शाखाएँ आदि मिली हैं, जो अब मन्‍दसौर संग्रहालय में संग्रहित हैं।

घसोई के सामने ‘गणेश मगरा’ नामक स्‍थान पर शैलोत्‍कीर्ण गुफा मन्दिर व समीप में बीघा-बावड़ी व तोरनबर्डा नामक पुरातात्त्विक स्‍थल दर्शनीय है। तोरनबर्डा के स्‍तम्‍भों पर अभिलेख उत्‍कीर्ण है जिसमें मण्‍डप (माण्‍डू) दुर्ग का प्रयोग हुआ है। यहाँ माता मन्दिर पहाड़ को काटकर बनाया गया है जो किसी प्राचीन गुफा का अवशेष प्रतीत होता है।

भानपुरा

इन्‍द्रगढ़ से प्राप्‍त राष्‍ट्रकूट नरेश नण्‍णप के अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने सम्‍भवत: अपने पिता भामान की स्‍मृति में ‘भामानपुर’ बसाया होगा, जो वर्तमान में भानपुरा कहलाता है। यहाँ प्रतिहार कालीन सूर्य मन्दिर के अवशेष मिले हैं जो स्‍व. डॉ. वाकणकर की इस धारणा की पुष्टि करते हैं कि चन्‍द्रावतों से सैंकड़ों वर्ष पूर्व इस नगर की स्‍थापना हो चुकी थी। इसे महेश्‍वर के बाद होल्‍करों की राजधानी के रूप में यशवन्‍तराव होल्‍कर प्रथम ने प्रतिष्ठित किया। यहीं से यशवन्‍तराव ने अंग्रेजों को भारत से भगाने का स्‍वप्‍न देखा व अंत में यहीं से स्‍वर्गारोहण किया।

दर्शनीय स्‍थल :-

1. यशवन्‍तराव प्रथम की छत्री व संग्रहालय : भानपुरा से कोई 1 कि.मी. दूर रेवा नदी के तट पर यशवन्‍तराव होल्‍कर प्रथम की छत्री मराठायुगीन स्‍थापत्‍य कला का उद्भुत नमूना है। ऊँची बुर्जियों युक्त चारदीवारी से घिरी ऊँची जगती पर मन्दिर सदृश, नागर शैली के शिखरयुक्त यह छत्री उसी स्‍थान पर एक स्‍तम्‍भ का निर्माण किया गया है। जहाँ यशवंतराव व उसकी पत्नियों की दाएँ-बाँए प्रतिमाएँ निर्मित है। यशवन्‍तराव की प्रतिमा की दाढ़ी में हीरा जड़ा था।
मन्‍दसौर जिले में स्थित स्‍मारकों की श्रृंखला में सर्वाधिक सुन्‍दर स्‍मारक भानपुरा स्थित होल्‍कर की छत्री है जो मराठायुगीन वास्‍तु – शिल्‍प की अति उत्‍तम अभिव्‍यक्ति है। चारों और उँची दीवारों से घिरी इस छत्री की रचना एक दुर्ग के समान है। दीवारों पर बन्‍दुकें दागने के खॉंचे व बुर्जियॉं बनी है। विशाल परिसर में निर्मित इस छत्री के गर्भगृह में यशवंतराव होल्‍कर की संगमरमर की प्रतिमा है। प्रतिमा की दाडी में लगा हीरा एवं छत्री का बाहरी भाग पर्यटकों के आकर्षण का केन्‍द्र है जो अत्‍यंत सुंदर ढंग से निर्मित है।
दुर्ग सदृश विशाल प्रवेश द्वार के दाईं ओर दरबार हॉल है जिसमें अहिल्‍याबाई का मन्दिर है। इसी के बाई ओर भूमिगत जल का स्‍त्रोत है। इसी ओर निर्मित विशाल बरामदे में म.प्र. पुरातत्त्व विभाग का संग्रहालय है जिसमें आवरा, मनोटी, पसेवा आदि के उत्‍खनन से प्राप्‍त सामग्री व हिंगलाजगढ़, लोटखेड़ी, इन्‍द्रगढ़, केथुली, कालाकोटा, मोड़ी आदि से संग्रहित कलाकृतियाँ प्रदर्शित है। बरामदे के अंत में एक गुप्‍त द्वार से होकर छत्री के ठीक नीचे तक पहुँचा जा सकता है। छत्री के परकोटे में ऊपर बने कक्ष में मराठा युगीन भित्तीचित्र बने हैं। छत्री का निर्माण 1840-41 में पूर्व हो चुका याने 10 वर्ष में निर्मित इस छत्री पर 8 लाख रू. खर्च हुए थे।

2. छोटा महादेव- अहिल्‍याबाई के काल का निर्मित शिव मन्दिर व जैन मन्दिर यहाँ है जहाँ जैन धर्म की अनेक प्रतिमाएँ भी संग्रहित है। यह स्‍थान डेढ़ कि.मी. उत्तर में स्थित है।

3. बड़ा महादेव- छोटा महादेव से आगे चलकर प्राकृतिक स्‍थान पर शिवलिंग प्रतिष्ठित है जहाँ लिंग पर बारहों महीने पानी झरता है।

4. इन्‍द्रगढ़- भानपुरा से पश्चिम में 3 कि.मी. दूर स्थित यह स्‍थल कभी पाशुपत सम्‍प्रदाय का केन्‍द्र था। यहाँ 8 वीं शताब्‍दी में विनीत राशि के पुत्र दान राशि ने विशाल मन्दिर बनवाया था। पहाड़ी पर प्राचीन दुर्ग के खण्‍डहर हैं। यहाँ हनुमानजी की भव्‍य प्रतिमा है। शैलचित्रों से चित्रित शैलाश्रयों वाला यह स्‍थान भानपुरा के सबसे करीब है।

5. कँवला- इस गा्रम का प्राचीन नाम कमलापुर था। यहाँ चन्‍द्रावतों के समय के 2 मंदिर क्रमश: सास-बहू व चारभुजानाथ के हैं। ये क्रमश: 1616 व 1666 के हैं। भगवान वराह का नागर शैली का 11-12 वीं शताब्‍दी का प्राचीन मन्दिर दर्शनीय है। प्रतिमा की चोरी हो चुकी है।

हिंगलाजगढ दुर्ग

अपने प्रतिमा-शिल्‍प की विशिष्‍टता से हिंगलाजबढ़ आज विश्‍व विख्‍यात हो चुका है। यहाँ की प्रतिमाएँ इंग्‍लैण्‍ड, फ्रांस, अमेरिका के भारत महात्‍सवों में धूम मचा चुकी हैं। भानपुरा तहसील के नावली पठार पर गहन वन में हिंगलाजगढ़ स्थित है, जो परमार काल में स्‍थापत्‍य व शिल्‍प का विशिष्‍ट केन्‍द्र था।

इस दुर्ग का निर्माण सम्‍भवत: परमारकाल में प्रारम्‍भ हुआ होगा। तेरहवीं शताब्‍दी के उत्तरार्द्ध में यह हाड़ा बंगदेव के पुत्र देवीसिंह के पोते हालू द्वारा जीता गया था। चन्‍द्रावतों के पाटनामें में उल्‍लेख आता है कि 1688 में गोपालसिंह चन्‍द्रावत के राज्‍य में यहाँ हवेली थी। सत्ता के संघर्ष में (1720-1752 ई.) हिंगलाजगढ़ निर्वासित चन्‍द्रावत राजाओं की राजधानी रहा है। 18 वीं शताब्‍दी के आठवें दशक में यह मराठों के कब्‍जे में आया तब इसका जीर्णोद्धार प्रारम्‍भ हुआ। उन्‍होंने यहाँ हिंगलाजगढ़ मन्दिर, शिव मन्दिर, राम मन्दिर, कचहरी, सूरजपोल आदि का निर्माण कर इसे व्‍यस्थित रूप प्रदान किया। गाँधीसागर अभयारण्‍य में स्थित यह दुर्ग प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का केन्‍द्र हैं।

मन्‍दसौर जिले का हिंगलाजगढ दुर्ग भी वस्‍तु-वैभव की उत्‍कृष्‍टता से यह वन्‍य दुर्ग प्राकृतिक सुषमा से युक्‍त एवं शक्‍टाकार आकार में निर्मित है। इनमें तोपें दागने के लिए बुर्जें एवं बन्‍दूकें दागने के खॉंचे बने है। इस जिले में हिंगलाजगढ के अतिरिक्‍त दशपुर, लदूना, अठाना में भी दुर्ग स्थित है।