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 कहाँ रुका काला धन और कहाँ रुकी बयानबाजी- डॉ . घनश्याम बटवाल, मंदसौर

विदेश से देश में कालेधन की वापिसी जुमलेबाज़ी साबित हो चुकी है | सरकार सूचना के अधिकार पर भी कोई साफ़ बात न कहकर दायें-बाएं हो रही है | इसके विपरीत   अमेरिका स्थित थिंक टैंक ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी (जीएफआई) के एक अध्ययन में दिये गये एक अनुमान के मुताबिक वर्ष २००५ से २०१४ के बीच भारत में ७७० अरब अमेरिकी डॉलर का कालाधन पहुंचा है। वैश्विक वित्तीय निगरानी संस्था ने बताया कि इसी समयावधि के दौरान देश से करीब १६५  अरब अमेरिकी डॉलर की अवैध राशि बाहर भेजी गई है|  इस जानकारी के साथ स्विस सरकार द्वारा जारी उस अधिसूचना की जानकारी भी जिसमे उसने भारत सरकार को सहयोग की पेशकश की है | स्विस राजपत्रित अधिसूचना के मुताबिक, स्विस सरकार का संघीय कर विभाग जियोडेसिक लिमिटेड और आधी एंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड के बारे में किए गए अनुरोधों पर भारत को ‘प्रशासनिक सहायता’ देने के लिए तैयार हो गया है। जियोडेसिक लिमिटेड से जुड़े तीन लोगों, पंकज कुमार ओंकार श्रीवास्तव, प्रशांत शरद मुलेकर और किरन कुलकर्णी- के मामले में विभाग ने इसी तरह के अनुरोध पर सहमति जताई है। हालांकि स्विस सरकार ने दोनों कंपनियों और तीनों व्यक्तियों के बारे में भारतीय एजेंसियों द्वारा मांगी गई जानकारी
और मदद से जुड़े विशेष विवरणों का खुलासा नहीं किया है। इस तरह की ‘प्रशासनिक सहायता’ में वित्तीय और टैक्स संबंधित गड़बड़ियों के बारे सबूत पेश करने होते हैं और बैंक खातों और अन्य वित्तीयआंकड़े से जुड़ी जानकारियों शामिल होती हैं।

अब सवाल  विदेश से अब तक कितना कालाधन आया ?भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम के लिए चर्चित आईएफएस अफसर संजीव चतुर्वेदी ने जब पीएमओ से यह सवाल पूछा तो बताने से इनकार कर दिया गया| आरटीआई पर जवाब देने से बचने के लिए पीएमओ ने कानून की धारा ८  (१ )  (एच) के तहत दी गई छूट को ढाल बनाया| पीएमओ ने जानकारी देने से इनकार करते हुए आरटीआई के उस प्रावधान का हवाला दिया जिसमें सूचना का खुलासा करने से जांच और दोषियों के खिलाफ मुकदमा चलाने में बाधा उत्पन्न हो सकती है| यह हाल तबहै , जबकि केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने १६ अक्टूबर को एक आदेश में पीएमओ को १५ दिनों के भीतर काले धन का ब्यौरा मुहैया कराने के लिए कहा गया था|

दूसरी और सरकार का दावा है कि वो कालेधन के खिलाफ सख्ती देश में काम कर रही है |16 लाख से भी ज्यादा देशी और विदेशी कंपनियों पर निगाह बनाए हुए है। आतंकी फंडिंग या फिर कालेधन को सफेद करने की कारगुजारी पर अंकुश लगाने को केंद्रीय एजेंसियां लगातार राजस्व विभाग के संपर्क में रहती हैं। हकीकत काले धन की तरह काली है |

यह केवल दावा ही रहा कि काला धन बाहर आएगा । हालिया विधानसभा चुनावों को ही लें बम्पर वोटिंग के साथ सुपर बम्पर  ” धन ” लगाया गया। सारे पुराने आंकड़ों को धता बताते हुए ” खुले हाथों ” रुपया बहा और प्रलोभन में मतदाता – मशीनरी – मीडिया – कार्यकर्ता  ने ” छक ” कर डुबकी लगाई। अधिकृत विवरण के मुताबिक मंदसौर संसदीय क्षेत्र की जावरा विधानसभा के चार प्रमुख उम्मीवारों ने ही 73 लाख से अधिक राशि व्यय की है। अंतिम आंकड़े आना बाकी है । प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों के लिये लगभग 3000 ने भाग्य आजमाया, कितना अधिकृत और उससे अधिक अनधिकृत ” धन ” व्यय किया, यह बता पाना सम्भव नहीं लगता। निश्चित ही बहुत बड़ा भाग काला धन इन चुनावों में खपाया गया।

निवर्तमान मुख्य निर्वाचन अधिकारी  ओ पी रावत स्वयं हैरान हो गये जब रेकॉर्ड नकदी जप्ती , बड़ी मात्रा में शराब , अवैध हथियार , बिना नम्बरों के वाहनों, अंतरप्रांतीय सीमाओं की धरपकड़ , बाहुबल का उपयोग मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ , राजस्थान आदि हिंदी भाषी प्रान्तों में सामने आया ।

कालाधन के बरास्ते कारगुजारियों से देश – प्रदेश का समूचा तंत्र गिरफ्त में है । यह दावा हवाई ही सिद्ध हुआ कि  स्वच्छ शासन – प्रशासन मिलेगा ।
एक बहुत छोटे से उदाहरण से समझें  मान्यता प्राप्त प्रमुख राजनीतिक दलों ने पेम्पलेट – पोस्टर – वचन पत्र – दृष्टि पत्र  – वोट अपील पत्र आदि छपवाये । रंगीन और ऑफसेट छपाई संख्या मात्र 1000 से 10000 तक बताई ?

अत्यंत आश्चर्यजनक है ? जब एक विधानसभा में मतदाताओं की संख्या ही औसतन 2 लाख से कम नहीं है तब मात्र इतनी कम प्रचार सामग्री छापना और बाँटना ? गंगोत्री से ही भ्रष्टाचार आकार लेता सामने आता है। मजेदार बात यह कि यह प्रचार सामग्री एक से अधिक बार बांटी गई, मंदसौर – नीमच – जावरा – रतलाम – खाचरौद – नागदा – उज्जैन – महिदपुर में तो यही हुआ ।

चुनाव तो सत्ता प्राप्ति का माध्यम भर है , फिर बदस्तूर चालू रहता है, काला धन का सिलसिला ? कहाँ जाकर रुकेगा ? किसी के पास कोई जवाब नहीं ?
आमजन सिर्फ़ कल्पना ही करते रहें ? कालाधन और उसके उपयोगकर्ता बढ़ते ही जारहे ।

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