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कानूनी प्रक्रिया का सरलीकरण कर समय सीमा की प्रतिबंधता लागू करना आवश्यक

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लोकतंत्र को मजबूत करने एवं बनाने वाले भारतीय संविधान में न्यायपालिका का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की महती व्यवस्था का निर्वाह न्यायपालिका संविधान के द्वारा प्रदत्त शक्तियों का क्रियान्वयन कर समाज में सुव्यवस्था की स्थापना न्यायपालिका प्रदत्त शक्तियों का उपयोग कर सुशासन-सुप्रशासन को चुस्त दुरूस्त रखने में अपना हस्तक्षेप कर विधि सम्मत कार्य की रूपरेखा परोक्ष अपरोक्ष रूप से विधि अनुसार अपने कार्यों का विभाजन कर न्यायप्रणाली अपना योगदान देती रही है लेकिन हमारे देश की न्यायपालिका की बेहद लचर व्यवस्था होने से लंबित मामलों का समय सीमा में निराकरण नहीं होना कहीं न कहीं न्यायिक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाये हुए है। इसका नतीजा यह होता है कि न्याय की गुहार लगाये व्यक्ति को लम्बे अंतराल का इंतजार करना पड़ता है लेकिन न्याय की दहलीज पर न्याय के इंतजार में उसकी आखरी सांस भी कम पड़ जाती है। न्यायपालिका अंधी व्यवस्था में हमको न्यायिक व्यवस्था का गुलाम बना दिया है। हमारे देश की शीर्ष अदालतों में 350 सौ करोड़ लंबित मामले पड़े हुए है। लेकिन सुनवाई/फैसले के नाम पर कुछ नहीं होता है। आन्ध्रप्रदेश के न्यायाधीश वी.वी. राव ने एक बार कहा था कि देश में लंबित प्रकरणों को निपटाने में देश की अदालतों को 320 साल का समय लग सकता है। आजादी के बाद हमारे देश में कई सुधार हुए, संविधान में संशोधन हुए लेकिन कानूनी प्रक्रिया को सरलीकरण की युक्ति में कोई संशोधन नहीं हुआ। हमने धरती से चांद तक की दूरी तय कर ली, लेकिन न्याय के मामले में आज भी हमारा देश दूसरे देशों की तुलना में काफी पिछड़ा हुआ हैं। अदालती कार्यवाही के चक्कर में एक दूसरे पक्ष को न्याय के लिये लम्बी अदालती कार्यवाही से गुजरना पड़ता है। बावजूद न्याय नहीं मिल पाता है। निचली अदालतों से लेकर शीर्ष अदालतों में पहुंचते-पहुंचते पीड़ित पक्ष को अपना सर्वस्व बलिदान करना पड़ जाता है। इसके बावजूद भी न्याय की अपेक्षा में खड़े व्यक्ति को न्याय नहीं मिल पाता है। विधि विशेषज्ञों ने इस बात की आशंका प्रकट की है कि न्यायतंत्र से जनता का भरोसा उठता जा रहा है। इसी की वजह से अराजकता, हिंसा व अपराध करने वाले लोगों की प्रवृत्तियां दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। न्याय में विलम्ब होने का सबसे बड़ा मुख्य कारण जजों की नियुक्तियां भी है। देश में 44 प्रतिशत जजों की आज भी कमी है।
विधि आयोग की रिपोर्ट में इस बात की ओर संकेत दिया है कि भारत में आबादी एवं न्यायाधीशों के बीच सबसे कम अनुपात वाले देशों में से एक है। अमेरिका और ब्रिटेन में 10 लाख आबादी वाले क्षेत्रों में 150 न्यायाधीशों की नियुक्तियां है। जबकि भारत में 10 लाख लोगों पर 10 न्यायाधीश है। विधि आयोग की कानूनी न्यायिक जटिल प्रक्रिया को सरलीकरण कर समय सीमा की प्रतिबंधता लागू कर न्याय प्रणाली को सुदृढ़ बनाना होगा, जिससे न्याय में मिल रही विलम्बता समाप्त हो सके। फिल्म दामिनी की पटकथा वर्तमान में तारीख पे तारीख मिलने से किस तरह न्यायपालिका की धज्जियां उठाते दिखलाया गया है। देश के विधि विशेषज्ञों को न्याय प्रक्रिया में बदलाव कर समय सीमा में लंबित प्रकरणों को सामूहिक जजों की बेच बनाकर न्याय के लिये विधि सम्मत फैसले के निर्णय से ही न्याय के मार्ग का रास्ता प्रशस्त होगा।

Post source : कमल कोठारी -मंदसौर

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