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कालिदास समारोह में आषाढ़ का एक दिन नाटक का मंचन हुआ

यह बात कालिदास अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ. मिथिलाप्रसाद ने कही। वे पशुपतिनाथ मंदिर सभागृह में दो दिनी कालिदास समारोह में रविवार को कालिदास की कलाकृति विषय पर व्याख्यान में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रकृति को समझने का प्रयास हर साहित्यकार करता है। इसके बाद भी शब्दों का बोध और उसे बताने की कला कालिदास के साहित्य में ऐसी है कि वह हर किसी के लिए प्रेरणा है। कालिदास के हर शब्द हर तरह का संदेश प्रभावी तरीके से देते हैं। उनका साहित्य मानव को बोध देने के साथ मोक्ष भी प्रदान करता है। कालिदास ने अपने साहित्य में प्रकृति को उकेरने के साथ संस्कृति का भी संरक्षण किया है। साहित्यकार नर्मदाप्रसाद उपाध्याय ने कहा कालिदास के नाटक, काव्य संग्रह में भारत देश की विभिन्न विधाओं और कलाओं काे समेटा है। प्राचीन भारत की हर विधा के दर्शन कालिदास के साहित्य में होते हैं। चाहे कालिदास का मेघदूतम हो ऋतुसंहारम, हर साहित्य में प्रकृति को प्रभावी तरीके से बताया गया तो विरह, प्रेम, स्नेह, पर्यावरण को लेकर भी उन्होंने बेहतर रचना तैयार की। दिल्ली से आए संगम पांडे ने कहा कि कालिदास का साहित्य पर देश के लिए नई पहचान बन गया है। प्रकृति, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ी विश्व धरोहर उनका साहित्य है। कालिदास के साहित्य पर अब कई तरह शोध हो रहे हैं। व्याख्यान सुबह 11.30 बजे शुरू हुआ जो दोपहर 1.30 बजे तक चला। समारोह में विधायक यशपालसिंह सिसौदिया, पूर्व मंत्री नरेंद्र नाहटा सहित विभिन्न साहित्य व कलाप्रेमी मौजूद थे। मंदसौर के शिक्षाविद मोहनलाल भटनागर की पुस्तक उत्थान का विमोचन भी किया गया। संचालन ब्रजेश जोशी ने किया। आभार घनश्याम बटवाल ने माना।

कालिदास समारोह में आषाढ़ का एक दिन नाटक का मंचन करते कलाकार।
पशुपतिनाथ मंदिर सभागृह में आयोजित दाे दिनी कालिदास समारोह में रविवार रात कालिदास के साहित्य पर आधारित नाटक की प्रस्तुति हुई। राकेश मोहन द्वारा रचित नाटक आषाढ़ का एक दिन अभिषेक पंडित के निर्देशन में तैयार हुआ। आजमगढ़ यूपी की संस्था सूत्रधार के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत नाटक में कालिदास की प्रेयसी मल्लिका के प्रसंग काे बताया। कालिदास के प्रति उनके समर्पण की कहानी पर आधारित नाटक में प्रेम, विरह वेदना, समर्पण की प्रभावी प्रस्तुति दी गई। बड़ी संख्या में साहित्यकार, कलाप्रेम मंदिर सभागृह में मौजूद थे। इतिहास के पुर्नवलोकन करें तो कालिदास को अवश्य पाएंगे
मंदिर परिसर में रविवार की सुबह कालिदास की कलादृष्टि विषय पर व्याख्यान का आयोजन हुआ। इसमें वक्ताओं ने कहा कि भूत, भविष्य तथा वर्तमान में सबसे महत्वपूर्ण भूतकाल के यथार्थ को वर्तमान पीढ़ी के संज्ञान में लाना आवश्यक है। इतिहास के पन्नों में हजारों साल पुरानी हमारी संस्कृति, सभ्यता के चिन्ह आज भी सुरक्षित है आवश्यकता है पुन: उन्हें संवारने, संजोने की जिससे आने वाली पीढ़ी के लिए वह मार्गदर्शक बन सके। अतिथियों कहा कि पुराने घरों, रजवाड़ों की विरासत, पुरातत्वीय सम्पदा हमारे गौरवमयी इतिहास को ताजा कर देती है। यदि हम इतिहास के पुर्नवलोकन करें तो वहां कालिदास को अवश्य पाएंगे। कार्यक्रम को इंदौर के नर्मदाप्रसाद उपाध्याय, संगम पांडे, शिवकेश मिश्र ने संबोधित किया।

कालिदास की कलादृष्टि पर लोकप्रिय व्याख्यान में विद्वतजनों के हुए व्याख्यान
मन्दसौर। कालिदास समारोह की लोकप्रिय व्याख्यान माला विधायक श्री यशपालसिंह सिसौदिया के मुख्य आतिथ्य तथा श्री मिथिलाप्रसाद त्रिपाठी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। व्याख्यान माला के मुख्य वक्ता श्री नर्मदाप्रसाद उपाध्याय इन्दौर, डाॅ. संगम पाण्डे नई दिल्ली थे।
अतिथियों का पुष्पहारों से बहुमान कालिदास संस्कृत अकादमी उज्जैन के निदेशक आनन्द सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश जोशी, डाॅ. घनश्याम बटवाल, बंशीलाल टांक, सचिन पारिख आदि ने किया।
इस अवसर पर डाॅ.घनश्याम बटवाल द्वारा सम्पादित श्री मोहनलाल भटनागर द्वारा लिखित तथा शिवना की पुकार द्वारा प्रकाशित पुस्तक उत्थान का विमोचन मंचासीन अतिथियों एवं पूर्व मंत्री श्री नरेन्द्र नाहटा द्वारा किया गया।
वक्ताओं के हुए व्याख्यान-
कला समीक्षक श्री संगम पाण्डे- भारतीय सभ्यता विश्व की अन्य 25 सभ्यताओं से विशेष होकर भारतीय सभ्यता अन्य सभी सभ्यताओं पर हावी है। कालिदास की समीक्षा को आपने आसान नहीं बताया, इसके लिये संस्कृत का ज्ञान होना आवश्यक है।
श्री नर्मदा प्रसाद उपाध्याय- भारतीय कला दृष्टि वहीं है जो कालिदास की कलादृष्टि रही है। समग्रता अर्थात सबसे जोड़ने की विशेष कला भारतीय दर्शन में ही है जो कि अन्यत्र नहीं पाई जाती। भारत प्राकृतिक दृष्टि से सौंदर्य प्रधान हैं कालिदास के ग्रंथों में प्रकृति के समस्त भावों का दिग्दर्शन होता है।
श्री मिथिलाप्रसाद त्रिपाठी- भारतीय संस्कृति का लक्ष्य भोग नहीं मोक्ष है। भोगों का आसक्ती, उपभोग नहीं बल्कि विवेकपूर्ण अनासक्त होकर सदुपयोग करते हुए अंतिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करना कालिदास का ध्येय रहा है।
उपस्थित रहे- महाविद्यालय पूर्व प्राचार्य ज्ञानचंद खिमेसरा, श्याम चैधरी, स्टेट बैंक प्रबंधक महेश हलधर, शिक्षाविद् मोहनलाल भटनागर, राव विजयसिंह, जयेश नागर, सचिन पारिख, एड. कांतिलाल राठौर, गोपाल पंचारिया, दिनेश तिवारी, नागुलाल परमार, भंवरसिंह भटनागर आदि।
संचालन ब्रजेश जोशी ने किया आभार डाॅ. घनश्याम बटवाल ने माना।

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