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किसान आंदोलन शासन व किसानों को बदनाम करने का षड्यंत्र

किसान भाईयों से बहिष्कार की अपील  – श्री राठौर

मंदसौर। मैंने मंदसौर जिले के चार विधानसभा क्षेत्रों मल्हारगढ, मंदसौर, सीतामऊ, व गरोठ के ग्रामीण क्षेत्रों में कथित किसान आंदोलन के बाद के दिनों 50 गांवों में निरन्तर भ्रमण किया जिनमें वे गांव भी सम्मिलित थें जिनके निवासी किसान दिवंगत हुए। सभी स्थानों पर किसान इस तथ्य से आक्रोशित थे कि कांग्रेसी नेताओं ने अपनी षड्यंत्रकारी भूमिका के माध्यम से असामाजिक तत्वों को प्रायोजित करके किसानों के नाम पर काला धब्बा लगाने में कोई कोर-कसर शेष नहीं छोड़ी। ट्रकों को जलाना, टोल जलाना और लूटना, दुकानों को जलाना, रेल्वे पटरियों को उखाड़ना, रेल्वे का अन्य नुकसान करना, पुलिस चौकी जलाना, थाने में आग लगाने व मकानों में आग लगाने जैसी घिनौनी हरकतंे की गई जिसके कारण करोड़ों रूपयों का नुकसान हुआ। किसान तोड़ फोड़, आगजनी व लूट जैसे घृणित कार्य नहीं कर सकता।

क्या प्रषासन से अनुमति ली थी ? यह प्रश्न आता है कि तथाकथित किसान आंदोलन के संबंध में विधि अनुरूप प्रशासन को अनुमति संबंधी पूर्व सूचना दी गई थी ? यदि एस.डी.एम. को मेमोरण्डम दिया गया था तो क्या प्रशासन से इसकी उपयुक्त अनुमति प्राप्त करने के पश्चात आंदोलन किया गया था ? अनुमति के आवेदन में या यदि अनुमति मिली हो तो उसमें आंदोलन का स्थान क्या दर्षित किया गया था

पिपल्यामंडी सम्मेलन का रहस्य क्या था ? यह प्रष्न आता है कि तथाकथित किसान आंदोलन के पूर्व पिपल्यामंडी के कृषि उपजमंडी समिति प्रांगण में एक सम्मेलन आयोजित हुआ था। इस सम्मेलन के संबोधनकर्ता कौन-कौन थे ? सम्मेलन में विचारार्थ विषय क्या थे ? क्या इस सम्मेलन की मंडी प्रषासन से अनुमति प्राप्त की गई थी ? यदि अनुमति थी तो वह किस आधार पर थी ? यदि अनुमति नहीं दी गई थी तो फिर सम्मेलन का आयोजन क्यों किया गया ?   आंदोलन का नेता कौन ? किसानों द्वारा यह प्रश्न किया जा रहा है कि तथाकथित किसान आंदोलन का नेता कौन था ? चर्चा में इसका उत्तर आता है कि कोई नेता नहीं था। स्थान-स्थान पर कांग्रेसी नेताओं के संकेत पर उनके द्वारा प्रायोजित असामाजिक तत्व इकठ्ठे हुए और उन्हांेने हिंसा व उत्पात मचा दिया। इसे किसान आंदोलन का नाम दे दिया। आंदोलन के मुद्दे क्या थे ? यह प्रश्न आता है कि तथाकथित किसान आंदोलन के मुद्दे क्या थे ? वर्तमान में मूल मुद्दा फसलों के उचित मूल्य से संबंधित था जिस पर सभी स्तरों पर चर्चा के माध्यम से समाधान निकाला जा सकता था। इस मुद्दे को गौण कर दिया गया और कांग्रेसी नेताओं द्वारा अन्य लोंगो को हायर करकेे मुद्दा विहीन उत्पात मचाया।

गांवों में बैठक नहीं ? किसानों द्वारा यह प्रश्न किया जा रहा है कि तथाकथित किसान आंदोलन से पूर्व आंदोलन की भूमिका बनाने के लिये गांवों में किसानों की बैठकों का आयोजन नहीं किया गया। कोई पेम्पलेट या फोल्डर गांव में नहीं बांटें गये और न ही किसी भी प्रकार का एनाउंसमेन्ट करवाया गया जिससे प्रतीत होता हो कि कोई व्यवस्थित आंदोलन किया जा रहा हैं। दूध का व्यवसाय करने वाले एवं सब्जी का व्यवसाय करने वाले ग्रामिणों की संख्या भी दोनों जिलों में हजारों में है जिनमें से किसी से भी कोई संपर्क नहीं किया गया और न ही इन्हें किसी बैठक की सूचना दी गई। ऐसी स्थिति में न तो कोई रूप-रेखा बन सकी और न ही कोई मर्यादा निश्चित हो सकी।
कांग्रेसी सामने आते तो दोष मुख्यमंत्री पर कैसे मढ़ते ?

कांग्रेस विपक्ष में है। कांग्रेस तथाकथित किसान आंदोलन में खुलकर सामने आ सकती थी पर ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस पर्दे के पीछे क्यों रही ? यह एक सुनियोजित षड्यन्त्र था कि यह विषुद्व किसान आंदोलन है जबकि ऐसा नहीं था। गांधी जी के सिद्धांतों को मानने वालों को खुलकर सामने आना था। शांतिपूर्ण आंदोलन करना था। उन्होंने ऐसा नहीं किया। मुंह पर कपड़ा बांधे असामाजिक तत्वों को आगे कर दिया जिन्होंनें तोड़-फोड़ व आगजनी की और निर्दोष किसानों को आगे करके मौके से भाग गए। मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के समय दिनांक 12 जून 1998 को बैतूल जिले के मुलताई में हुए गोली कांड में 24 किसानों की हत्या हुई थी। उस घटना और इस घटना के संदर्भ में किसान कांग्रेस से पूछ रहे हैं कि कांग्रेस बताए कि उसका वास्तविक चरित्र क्या है। विधायक करैरा श्रीमति शकुंतला खटीक, विधायक राऊ जीतू पटवारी , जिला पंचायत उपाध्यक्ष बी.पी. धाकड , पूर्व विधायक मनासा विजयेन्द्र सिंह मालाहेडा, रतलाम जिले के कांग्रेस पदाधिकारी श्री गुर्जर जो जेल में बंदी रहें आदि कांग्रेसी नेताओं ने संपति नष्ट करने, आग लगाने व रेल्वे पटरी उखाड़ने जैसे उत्तेजित वक्तव्य दिए। अपने उत्पाती साथियों को आगे करके भोले-भाले किसानों को भ्रमित किया। क्या पूर्व सांसद सुश्री मीनाक्षी नटराजन ने बड़वन क्षेत्र में बैठक ली थी ? यदि ली थी तो बैठक के विषय और मुद्दे क्या थे ? ये प्रष्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि इस बैठक के दो दिन बाद ही यह कांड हो गया।घनष्याम धाकड़ के पिताजी का वक्तव्य है कि मेरा पुत्र कांग्रेस के लिए शहीद हो गया। उन्हांेने यह नहीं कहा कि वह किसानों के लिए शहीद हुआ।

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