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किसी एक पंथ, परिवार, जाति, समुदाय के नहीं, समग्र मानव समाज के लिये सद्गुणों-सद्विचारों के प्रेरक-प्रेरणास्त्रोत रहे गौलोकवासी पं. मदनलालजी जोशी शास्त्री -बंशीलाल टांक

महापुरूषों का जन्म प्रारब्धानुसार चाहे जिस कुल-जाति-सम्प्रदाय में हो परन्तु वै इन सब बंधनों से उपर उठकर अपने आचरण-व्यवहार-सद्गुणों से जीते जी उस उच्च स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाते है जहां सभी धर्म जाति सम्प्रदाय उनके अपने होकर वै मानव मात्र के कल्याण हेतु पथ प्रदर्शक-प्रेरणास्त्रोत बनकर सभी के श्रद्धास्पद बनकर हृदय में स्थान बना लेते है, जिससे संसार से विदा होने के पश्चात् भी स्मृति पटल पर सदैव अंकित रहते है। वैसे भी महापुरूष किसी एक जाति-परिवार की धरोहर नहीं होकर समग्र मानव समाज उनका परिवार हो जाता है।

गौलोकवासी पं. श्री मदनलालजी जोशी शास्त्री (गुरूजी) अन्तर्राष्ट्रीय भागवत प्रवक्ता का आज पावन स्मृति दिवस है। श्री जोशीजी की प्रसिद्धी उनकी पहचान आध्यात्मिक क्षेत्र में यद्यपि एक मूर्धन्य मनीषी श्रीमद् भागवत् के परम् तत्ववेत्ता के रूप में जानी जाती रही है, परन्तु साहित्य जगत में राष्ट्र मातृभाषा हिन्दी में जो सर्वोच्च स्थान श्री जोशी ने प्राप्त किया था उसी का प्रमाण रहा कि सनातनी वैदिक हिन्दू संस्कृति के प्रतिपादक एक निष्ठावान वैष्णव होने के नाते जहां वल्लभ सम्प्रदाय आदि हिन्दू आध्यात्मिक संगठनों के संत, महंत, महामण्डलेश्वर, आचार्यों, विद्वानों महापुरूषों के साथ उनका शास्त्रीय विचार-विमर्श, शंका-समाधान होता ही रहता था, इसके अतिरिक्त जैन समाज आदि अन्य सम्प्रदायों के विद्वतजन संत, मुनिश्री के भी आप स्नेहभाजन रहे।

श्री जोशीजी भागवत के परम् मर्मज्ञ प्रवक्ता थे और यही कारण था कि एक बार जो उनकी कथा में आकर बैठ जाता था फिर उठकर जाने का नाम नहीं लेता था। बिना संगीत के व्यास पीठ पर एक आसन से विराजित होकर लगातार आठ घण्टे तक विशुद्ध रूप से भागवत कथा श्रवण कराना आपकी कठिन साधना का ही प्रतिफल था। भागवत का परम् गूढ़़ रहस्य जो जोशीजी द्वारा प्रकट होता था वह अब मात्र 3-4 घण्टा भागवत कथा और उसमें भी आधे से अधिक समय संगीत के गायन वादन में पूरा हो जाता हो, कहां मिल पायेगा ? श्री जोशीजी की साहित्यिक प्रतिभा का लोहा तत्कालीन सभी दिग्गज साहित्यकार मानते थे और इसका प्रमाण समय-समय पर नगर में होने वाली कवि गोष्ठियों में स्पष्ट दिखाई देता था।

उच्च ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद श्री जोशीजी ने कभी जाति भेद नहीं किया। चाहे किसी भी समाज का बालक, युवा, वृद्ध कोई क्यों न हो, सभी के साथ आपका स्नेह प्रसन्न मुद्रा में मिलना आपका स्वाभाविक गुण तो था ही, अपनी विद्वतता तथा उच्च कुल में जन्म लेने का लेश मात्र भी अभिमान आपको छू नहीं पाया था।

सर्वगुण सम्पन्न अलौकिक  प्रतिभा के धनी होने के बावजूद जहां जोशीजी परम् मृदुुभाषी, सहज, सरल स्वभाव के धनी थे, वहीं उन्होंने अपने जीवन में मूलभूत सिद्धांतों के प्रति कभी समझौता नहीं किया। पद-प्रतिष्ठा-सम्पन्नता में चाहे कोई कितना भी वी.आय.पी. अथवा वी.वी.आय.पी क्यों न हो, अपने आध्यात्मिक सनातन संस्कारों के विपरीत जहां भी कोई कार्य देखा, बिना संकोच निर्भय होकर उसी वक्त उसका प्रतिरोध किया। भागवत कथा का ही एक प्रसंग है। एक स्थान पर (नाम का उल्लेख उचित नहीं) काफी सम्पन्न धनाढ्य व्यक्ती जिसकी सेवा में रात-दिन अनेकों नौकर चाकर हाथ जोड़े खड़े रहते थे। जिसका आदेश पत्थर की लकीर के समान मानकर पालन किया जाता था। उनके द्वारा आपकी भागवत कथा का आयोजन रखा गया है। उनके द्वारा आपकी भागवत कथा का आयोजन रखा गया। आयोजक महोदय यथासमय कथा में आकर विराजित हो गये उस समय मोबाईल युग नहीं था। टेलीफोन व्यवस्था थी। आयोजक महोदय टेलीफोन साथ में लेकर बैठ गये। कथा प्रारंभ होने के कुछ ही देर बाद उनका फोन आया। आयोजक ने जैसे ही रिसिवर उठाकर फोन पर चर्चा करनी चाही उसी वक्त जोशीजी ने उन्हें टोकते हुए स्पष्ट कहा कि बुरा न माने आपको यदि भागवत कथा सुनना है तो कृपया 7 दिन तक कथा समाप्ति तक फोन का मोह छोड़कर इसे साथ नहीं लाना ही उचित रहेगा। आयोजनकर्ता महाशय को उनकी इच्छा के विपरित जवाब देना तो दूर कोई चूं तक नहीं कर सकता था। उन्हें इस प्रकार जवाब देना सुनकर कथा में सभी उपस्थित श्रोतागण स्तब्ध रह गये। आयोजक महोदय कुछ बोल नहीं सके और फोन को अपने निवास पर भिजवा दिया। परन्तु कथा सुनने के पश्चात् कथा समापन पर वे भाव विभोर होकर जोशीजी के पांव पर गिर पड़े। सात दिन तक फिर कथा के समय कभी फोन नहीं उठाया।

ऐसे गौलोकवासी परम् श्रद्धेय श्री जोशीजी के पावन स्मृति दिवस पर सादर हार्दिक वंदन।

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