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कृषि एवं जलवायु

भारत एक कृषि प्रधान देश है। 70% भारतीय लोग किसान है व देश के रीढ़ की हड्डी के समान है। कृषि के क्षैत्र में मन्‍दसौर का स्‍थान प्रदेश ही नहीं देश में भी चर्चा में रहता है यहां पर पैदा होने वाली अ‍फीम की पूरे देश में चर्चा होती है। मन्‍दसौर का लहसून व सोयाबीन की देश ही नही विदेश में भी मांग है। इस दृष्टि से मन्‍दसौर कृषि के द्वारा देश की अर्थ व्‍यवस्‍था में अपनी अलग पहचान बनाएं हुए है। मन्‍दसौर जिले की जलवायु कृषि के लिए बहुत ही अनुकुल है।

काली मिट्टी का क्षेत्र होने के कारण मन्‍दसौर जिला कृषि के लिए उपयुक्‍त है। यहाँ का किसान प्रगतिशील है। उन्‍नत बीजों का उपयोग कर किसान अपनी उपज बढ़ाने का निरन्‍तर प्रयास करते है। साथ ही कीटनाशक, रासायनिक खाद, पौध संरक्षण व बीजोपचार के द्वारा उन्‍नत खेती में मन्‍दसौर व सीतामऊ तहसील के किसान अग्रणी है। इस प्रयास में भानपुरा तहसील के लोग सबसे निचली पायदान पर है।
मन्‍दसौर जिले में सबसे अधिक उत्‍पादन क्रमश: मक्‍का, ज्‍वार व गेहूँ का होता है। गेहूँ उत्‍पादन में मन्‍दसौर तहसील अग्रणी है। मक्‍का उत्‍पादन में गरेाठ तहसील सर्वप्रथम है। ज्‍वार उत्‍पादन में भानपुरा तहसील का स्‍थान सर्वोच्‍च है। दलहन में उड़द, चना, तुअर का सबसे अधिक उत्‍पादन होता है। उड़द, चने व तुअर के उत्‍पादन में गरोठ तहसील सबसे अग्रणी है। खाद्यान्न तेलों के उत्‍पादन के लिए सोयाबीन, राई-सरसों, मूंगफली, अलसी व तिल का उत्‍पादन किया जाता है। इनसे तेल निकालने के कारखाने भी जिले में है। मध्‍य प्रदेश सोयाबीन राज्‍य है। देश की 87% सोयाबीन का उत्‍पादन हमारे प्रदेश में होता है। सोयाबीन उत्‍पादन में मन्‍दसौर जिले का प्रदेश में प्रथम स्‍थान है। सरसों के उत्‍पादन में भारत का विश्‍व में दूसरा स्‍थान है। भारत में मध्‍य प्रदेश का दूसरा व म.प्र. में हमारे जिले का चौथा स्‍थान है।
मादक प्रदार्थ में अफीम के उत्‍पादन में हमारे जिले का देश में पहला स्‍थान है। देश के 60% अफीम का उत्‍पादन इस जिले में होता है। इसके निर्यात में हमारे देश को विदेशी मुद्रा मिलती है। इसका उपयोग औषधियों के निर्माण में होता है। अफीम का वैज्ञानिक नाम ‘पैपविर सोम्‍नीफेरम’ (Papaver Somniferum) है। इसमें 16 रासायनिक प्रदार्थ पाए जाते हैं। इनमें मारफीन, कोडीन, नार्सीन, थीवेन प्रमुख है। भारत के अलावा अफीम तुर्की, ग्रीस, ईरान, चीन, आस्‍ट्रेलिया, स्‍पेन व फ्रांस में बोया जाता है। इस फसल में लाभ कम हानि अधिक है। कर्नल जेम्‍स टाड ने लिखा था – ”धान्‍य के बदले में अफिम की खेती क्रमश : बढती जा रही है। प्रबल कानून के द्वारा इसकी गति को रोकना आवश्‍यक कर्तव्‍य है। मैंने सिंहासन पर विराजमान महाराणा से लेकर सामान्‍य दरजे के मनुष्‍य तक से इस बात की शपथ करा ली है कि वह कभी भी अपनी प्‍यारी संतान को इस प्राणनाश करने वाली अफीम का सेवन न कराएँ, किन्‍तु केवल शपथ करा लेने से ही क्‍या होगा, जब तक कि वह अफीम की खेती को करना न छोड़ेंगे”। टाड ने जो बात लगभग 175 वर्ष पहले सोची थी वह अब प्रमाणित हो रही है। अफीम की बढ़ोतरी व इसके उत्‍पादन-स्‍मैक, हेरोइन आदि ने इस क्षेत्र की युवा पीढ़ी को अपराधी बना दिया है।
सन् 1971-72 में नारकोटिक्‍स विभाग द्वारा अफीम की फसल पर अनुसंधान की दृष्टि से म.प्र. के जोनल रिसर्च स्‍टेशन के रूप में मन्‍दसौर के बहादरी फार्म को चुना गया। यहाँ अफीम की जवाहर 16 किस्‍म विकसित की गई जो हर दृष्टि से इस पूरे क्षेत्र के कृष्‍कों के लिए श्रेष्‍ठतम किस्‍म बनी रही। इसके जनक डॉ. बी. के. निगम इस किस्‍म की खोज के लिए सम्‍मानित भी किये गये। पहले जिले में रंगीन फूलों वाली अफीम की देशी किस्‍में बोई जाती थी जिनमें अफीम और खसखस दोनों ही कम आती थी। अब सर्वश्रेष्‍ठ सफेद फूलों वाली किस्‍में ही दिखती है।
अ‍फीम के स्‍थान पर अब औषधीय फसलों की खेती पर भी बल दिया जा रहा है। तारामिरा, ईसबगोल, कलौंजी, प्‍याज, असगंध, सफेद मूसली, असालिया (चन्‍द्रशुर), सुवा, जीरा, सौंफ, लहसुन का रकबा धीरे-धीरे बढ़ रहा है। प्रदेश की लगभग 55% लहसुन जिले में होती है। गुजरात के जामनगर क्षेत्र के बाद लहसुन की खेती में जिले का दूसरा स्‍थान है। यहाँ लहसुन का तेल, फ्लैक्‍स व चूर्ण आदि निमार्ण के कारखाने भी है।
इस क्षेत्र में कृषि के विकास के लिए मन्‍दसौर (बहादरी) में प्रदेश के प्रथम उद्यानिकी महाविद्यालय की स्‍थापना की गई है। अब किसानों का ध्‍यान मिर्च-मसाले की फसलों की ओर केन्द्रित हुआ है। मिर्च के उत्‍पादन में जिले की गरोठ, मन्‍दसौर व सितामऊ तहसीलें अग्रणी है। प्रदेश के कुल उत्‍पादनों की 10 % मिर्च हमरे जिले में होती है। धनिये का 33 % उत्‍पादन हमारे जिले में होता है। इसके अलावा अजवाइन की खेती भी होती है। जिले में भानपुरा तहसील में पान की खेती भी होती है। यहाँ का पान भारत के अलावा पाकिस्‍तान व खाड़ी के देशों को निर्यात किया जाता है। जिले में अब मशरूम (छत्रक) व कुसूम का उत्‍पादन भी लोकप्रिय हो रहा है।
फल उत्‍पादन एवं सब्जियों के उत्‍पादन में भी इस जिले का महत्‍वपूर्ण स्‍थान होता है। संतरा, मौसम्‍बी उत्‍पादन में गरोठ व भानपुरा तहसील अग्रणी है जामफल के उत्‍पादन में मन्‍दसौर तहसील प्रथम है। इनके अलावा आँवला, पपीता, अनार के बागों की वृद्धि हो रही है। फलों व सब्जियों को कोल्‍ड स्‍टोरेज में रखने की सुविधा जिला मुख्‍यालय पर उपलब्‍ध है।

जलवायु

किसी स्‍थान की गर्मी, ठण्‍ड, वर्षा हवा की गति आदि के औसत परिणाम को जलवायु कहते हैं । मन्‍दसौर जिले की जलवायु मानसूनी कहलाती है । यहाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून के कारण वर्षा होती है वर्षा, जिले के अलग-अलग भागों में कम-ज्‍यादा होती रहती है । जिले की औसत वर्षा 732 मि.मी. से 900 मि.मी. है । 90 प्रतिशत वर्षा जून से सितम्‍बर तक होती है । शेष वर्षा ठण्‍ड व गर्मी के महीनों में बँट जाती है ।

राजस्‍थान का समीपवर्ती जिला होने के कारण मई-जून माह में तेज गरम हवाएँ (लू) चलती है । इन महीनों में तापमान 44° सेण्‍टीग्रेट तक पहुँच जाता है । ठंड के दिनों में शीत लहर का प्रकोप रहता है । दिसम्‍बर तथा जनवरी में खूब ठंड पड़ती है व तापमान 5° सेण्‍टीग्रेट तक हो जाता है ।

तापमान

जिले का तापमान फरवरी के बाद से ही बढ़ना शुरू हो जाता है। मई में सामान्यतः सबसे अधिक गर्मी रहती है। दिन का औसत अधिकतम तापमान 39.80 डिग्री सेल्सियस तथा न्यूनतम तापमान 25.40 डिग्री से. रहता है। ग्रीष्म में दिन में गर्म और धूल भरी हवाएं चलती हैं। जून में मानसून से पूर्व तापमान 45 डि.से. तक पहुंच जाता है। जनवरी मौसम का सबसे सर्द महीना होता है। शहर का अधिकतम तापमान 35 डि.से. तथा न्यूनतम तापमान 9.30 डि.से. तक रहता है।