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केशव सत्संग भवन में अपूर्व सन्त सम्मेलन सम्पन्न

मन्दसौर। केशव सत्संग भवन मन्दसौर मंे चल रहे चातुर्मास प्रवचन के दूसरे दिन भव्य संत सम्मेलन का आयोजन सन्त रमणानन्दपुरी के प्रयत्नों में सत्संग भवन की कार्यकारिणी सदस्यों के प्रयासों के फल स्वरूप देश के विभिन्न स्थानों से विद्वान सन्तों का आगमन हुआ। सन्तों की कुल संख्या अठारह थी। जिनमें उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, मुंबई, ऋषिकेश, औंकारेश्वर, अमरकंटक तथा म.प्र. के विभिन्न अंचलों जैसे रतलाम, खरगौन, खाचरोद, मन्दसौर तथा फतेहगढ़ आदि स्थानों से सन्तों का पदार्पण हुआ। एक तरह से सन्त सम्मेलन का स्वरूप अखिल भारतीय जैसा हो गया था। सर्वप्रथम प्रातः साढ़े आठ बजे सन्तों का पुष्पमाला से स्वागत चातुर्मास समिति के अध्यक्ष श्री सत्यनारायण गर्ग तथा कार्यकारिणी सदस्यों अध्यक्ष श्री जगदीश सेठिया, श्री कारूलाल सोनी, श्री प्रहलाद काबरा, राधेश्याम गर्ग, जयप्रकाश गर्ग, कल्याण अग्रवाल, बालकिशन चौधरी, संतोष जोशी, नन्दलाल गुप्ता, विनोद गर्ग आदि के अतिरिक्त रामगोपाल शर्मा ‘बाल’ एवं घनश्याम बटवाल, पं. दशरथ भाई, मदनलाल ने किया। इसके बाद ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री जगदीश सेठिया ने स्वागत भाषण में सत्संग भवन के कार्यक्रमों की जानकारी दी। सम्मेलन में श्रोताओं की अच्छी खासी भीड़ थी।
सन्त सम्मेलन का विषय था ‘आत्म कल्याण’। अध्यक्षता स्वामी रमणानन्दपुरी महाराज ने की। सर्वप्रथम शुभारंभ वैदिक प्रार्थना से हुआ। विषय का प्रतिपादन रतलाम से पधारे सन्त देवस्वरूप महाराज ने प्रभावशाली ढंग से आत्मकल्याण की व्याख्या की। उन्होंने बताया सन्त सुप्तजनों को जगाने का कार्य करते है। जीव आत्म तत्व से नहीं समझता इसलिये सन्तों की आवश्यकता होती है। तत्पश्चात् अमरकंटक से पधारे सन्त जगदीशानन्द ने आत्मकल्याण के लिये मनुष्य को अध्यात्म तत्व की बढ़ने की प्रेरणा दी। खाचरोद से पधारे सन्त कृष्णानन्द ने चातुर्मास को ऋषि प्रणाली का पर्व बताया और आत्म कल्याण के लिये रामचरित मानस के स्वाध्याय की चर्चा की। उड़ीसा से पधारे सन्त अखण्डानन्द ने बताया कि जीव कर्म को अकर्म और अकर्म को कर्म समझता है। इसलिये सत्संग की अपेक्षा है। सन्त राजेश्वरानन्द (उ.प्र.), पुरूषोत्तम महाराज मुम्बई, चैतन्यगिरी खरगौन, नित्यानंद महाराज, धीरेशानन्द महाराज, सन्त सोमानन्द मंदसौर का उद्बोधन हुआ। इनके अतिरिक्त सन्त आत्मविद्यानन्द, सन्त देवानन्द, सन्त मोहनानन्द, सन्त भागवतानन्द, सन्त मुकुन्द चैतन्य, सन्त राजेश्वर चैतन्य, सन्त जगदीश स्वरूप ने भाग लिया। अन्त में अध्यक्षीय उद्बोधन में सन्त रमणानन्दपुरी ने बताया कि सन्त परमात्मा को ज्ञान प्राप्त करके सबकुछ छोड़ देते है। सन्तों को सत्य एवं धर्म का पक्ष लेना चाहिये। निवेदन पर पधारे सन्तों का उन्होनंे सन्तों का आभार माना। ट्रस्ट के सचिव श्री कारूलाल सोनी ने आभार व्यक्त करते हुए प्रतिवर्ष सन्त सम्मेलन की कामना की। कार्यक्रम में श्री दिनेश शर्मा, श्री शंकरलाल त्रिवेदी, श्री रेवाशंकर चौधरी, प्रवीण देवड़ा, नन्दलाल गुप्ता, प्रेम पाटीदार, ओमप्रकाश पोरवाल आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन बंशीलाल टांक ने किया।
जगदीशचन्द्र सेठिया

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