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कैलिफोर्निया के अप्रवासी भारतीयों की बडी सफलता

हम भारतीयों को कैलिफोर्निया में बसे अप्रवासी भारतीयों को साधुवाद देना चाहिये क्योंकि उन्होने लम्बी लडाई के बाद ऐसी सफलता विदेश में रहकर भी प्राप्त की है जिसे हम भारतवासी भारत में रहकर भी प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। जी हॉं, कैलिफोर्निया के अप्रवासी भारतीयों ने वहॉं स्कूल, कॉलेजों में पढाए जा रहे पाठ्यक्रमों में भारतीय इतिहास से सम्बन्धित तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत करने के बाद अपना विरोध दर्ज किया था और कई वर्षो तक चले इस संघर्ष के बाद वहॉं की सरकार अपने पाठ्यक्रमों में भारतीय इतिहास से सम्बन्धित तथ्यों को भारतीयों के अनुसार परिवर्तित करने को तैयार हो गई है और इतना ही नहीं वहॉं की सरकार ने इस सम्बन्ध में आदेश भी जारी कर दिए हैं। यह कार्य इतना आसान भी नहीं था। लेकिन अप्रवासी भारतीयों ने लगातार अमेरिकी प्रशासन के सामने उचित मंचों पर अपनी बात दृढता से रखी और उसी का यह सुखद परिणाम उन्हे मिला है। जहॉं तक खुश होने का अवसर है तो हमारे अपने देश में ऐसी खुशी के अवसर हमें कब मिलेंगे कह नहीं सकते जब इतिहास के वास्तविक तथ्यों को पाठ्यक्रमों में पढाया जाएगा। क्योंकि जहॉं देश के बडे दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में यह पढाया जाता हो कि सीता रावण की पुत्री थी और हनुमान एक कामुक व्यक्ति था जो लंका के शयनकक्षों में तॉंकझॉंक किया करता था वहॉं हम कैसे खुशी के अवसर तलाश सकते हैं, जहॉं 1857 के स्वाधीनता संग्राम को सैनिक विद्रोह पढाया जाता हो, जहॉं शिवाजी और भगतसिंह सहित अन्य महापुरूशों के बारे में अनर्गल तथ्य लिखे जाते हों, जहॉं भरतीय संस्कृति और सभ्यता के गौरवशाली अवसरों को तोड मरोडकर लिखा जा रहा हो और पढाया जा रहा हों वहॉं हमें खुश होने का अवसर कैसे मिलेगा? ये तो कुछ उदाहरण थे लेकिन हमारे भारत में इतिहास व अन्य विशयों की पुस्तकें ऐसे हजारों तथ्यहीन उद्धरणों से भरी पडी हैं जो सोची समझी साजिश के तहत कम्युनिस्ट विचारधारा से ओतप्रोत इतिहासकारों ने जानबूझकर लिखी है। दुर्भाग्य कि बात यह है कि भारत में पढाए जाने वाले इन गलत ऐतिहासिक तथ्यों को ठीक करने की बात करने के लिये कैलिफोर्निया जैसे भारतीय नहीं है और है भी तो कुछ गिने-चुने हैं। इस विषय पर पहल इसलिए भी नहीं हो सकी कि देश की शिक्षा पर जिन लोगों का नियंत्रण था उन्होंने हमेशा वामपंथी इतिहासकारों को राजनैतिक संरक्षण दिया इसलिए वे अपनी मनमानी कर सके। विश्वविद्यालय अनुसंधान आयोग हो या राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान संगठन सभी जगह इन अभारतीय मानसिकता वाले इतिहासकारों ने अपनी कुत्सित मानसिकता पुस्तको में थोपी और जिसे मजबूरी में हमने पढा भी, लिखा भी, पास भी हुए और बाद में पढाने भी लगे। शिक्षा बचाओ आंदोलन और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, विद्या प्रतिश्ठान जैसे संगठनों ने इन पाठ्यक्रम सम्बन्धी विसंगतियों को दूर करने संबंधी प्रस्ताव राज्य सरकाओं और केन्द्रीय सरकार को प्रेशित किए हैं। लेकिन उन पर अमल करने में राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को भी कठिनाईयां आ रही हैं या ऐसा अमल में लाना व्यावहारिक रूप से कठिनाइ्रयों से भरा है। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न हमारे सामने खडा हो जाता है कि जब कैलिफोर्निया के भारतीय अमेरिकी प्रशासन को इतिहास की विसंगतियों को ठीक करने के लिये बाध्य कर सकते हैं तो इस मामले में भारतीय समाज की चेतना जागृत होने में इतनी देर क्यों हो रही है। यदि भावी पीढियों को सुधारना है तो पहले अपने इतिहास में जानबूझकर खडी की गई विसंगतियों को दूर करने की आवश्यकता है और इस मामले में कैलिफोर्निया के अप्रवासी भारतीय निश्चित बधाई के पात्र है।

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