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क्या कर्ज माफी ही अब चुनावों में राजनैतिक दलों का रहेगा मुद्दा

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(महावीर अग्रवाल)

जनाधार वाले जनप्रतिनिधियों किसानों से बातचीत से क्यों रहे नदारद

यूं देखा जाए तो वर्षों से किसानों की मांग और कर्ज माफी का काम चला आ रहा हैं। राजनीति दलों के लिये यह वोट बैंक लाभ का भी रहा है तो कभी नकारा भी गया है। मंदसौर जिले में जून 2017 के किसान आंदोजलन के पूर्व की पृष्ठ भूमि में देखा जाए तो इन 5 वर्षाें में भाजपा समर्थित किसान संघों ने कितनी बार मंदसौर की मंडी में किसानों के साथ उनकी  मांगों को लेकर बैठके की। क्यों क्या वे आंदोलन के पूर्व की स्थिति के लिये पर्याप्त नहीं थी। एक और घटना यह कि तत्कालीन कलेक्टर द्वारा किये जा रहे कार्यो और मनमाने निर्णयों पर नाराजगी जाहिर करते हुए भाजयुमो ने तो उनका पूतला दहन तक कर दिया था। नाराजगी के स्वर भोपाल तक पहुंच गये थे लेकिन संवेदनशील मुख्यमंत्रीजी ने स्थानांतर नहीं किया और जिस दिन 6 जून 2017 को किसान आंदोलन पर गोली चल रही थी उस दिन बताया जाता है कि मंदसौर के महत्वपूर्ण जलस्त्रोत तेलिया तालाब को छोटा करने पर हस्ताक्षर हुए। मंदसौर का नया कलेक्टर भवन ग्रीन बेल्ट क्षेत्र में बना दिया। यह भी प्रश्न हमेशा खड़ा रहेगा कि क्या उस समय कलेक्टर का स्थानांतरण कर दिया जाता तो किसान आंदोलन की उग्रता को बातचीत से बदला जा सकता था। कोई जनाधार वाला जनप्रतिनिधि भी किसानों के बीच नहीं पहुंचा क्यों और मुख्यमंत्री तथा भाजपा हाईकमान ने इस दिशा मंे क्या कदम उठाये अभी तक तो जनता के सामने नहीं है। यह स्थिति आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिये क्या शुभ संकेत है।
चलो बैठकें की, आंदोलनों हुआ तो भाजपा का एक नेता या एक ऐसा जनप्रतिनिधि खुद मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान बताये जो किसानों के बीच उनकी समस्या जानने गया हो या जिसकी पैठ किसानों के बीच हो। खैर चलो वो घटना हो गई लेकिन इस वर्ष में भी भाजपा के किसी जनप्रतिनिधि का जनाधार किसी एक गांव में ही सही किन्तु व्यापक हुआ हो ऐसा हुआ क्या? मंदसौर संसदीय क्षेत्र में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व तो ठीक अब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ही बता दे कि उनकी खुफिया रिपोर्ट में कोई एक जनप्रतिनिधि व्यापक जनाधार वाला उभरकर सामने आया क्या ? भाजपा संगठन पूरी तरह से काम के बजाये चेहरे से चुनाव जितने की लालसा में भाजपा के ही जनाधार वाले नेतृत्व को अनदेखा करता चला आ रहा है।
किसान आंदोलन  कि इतनी बड़ी घटना के बाद मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान दो बार मंदसौर आए। दूसरी बार 30 मई 2018 को आए इस बार खुद मुख्यमंत्री अपने दौरे का दृश्य देख ले। उनकी स्थिति ऐसी रही मानों मंदसौर क्षेत्र का हर वरिष्ठ भाजपा नेता उनसे दूरी बनाकर रखना चाहता हो। इस माहौल में वे अपना या नरेंद्र मोदी का चेहरा बताकर संसदीय क्षेत्र की सभी 8 तो ठीक 4  सीटे भी जीत सकते हैं ? भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री कैलाश चावला जिनकी राजनीति और जनाधार में दमखम है क्यों मुख्यमंत्री के साथ शोभा नहीं देते? मुख्यमंत्री की दशा की मंदसौर यात्रा की छाप कैसी रही नहीं बदली तो चुनाव नजदीक है ही यही देख ले कि भाजपा के किस जनप्रतिनिधि किसान आंदोलन के बाद किसानों के बीच पहुंच कर भाजपा का विश्वास जीता है। वे केवल चुनाव में उम्मीदवार बनकर शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र मोदी की छवि से चुनाव जीतना चाहते हैं। लोकसभा विधानसभा चुनाव जीतने का दृश्य तो बिल्कुल स्पष्ट है। जनाधार मायनस चेहरे प्लस ने भुलावे में डाल दिया है।
फसल  के वाजिब मूल्य की मांग को लेकर ऐसा  नहीं है कि रात गई बात गई आंदोलन हो गया। किन्तु  भाजपा का एक भी जनाधार वाला प्रतिनिधि किसानों के बीच अपनी गहरी साख जमाने में अब तक भी सफल हुआ हो तो खुद भाजपा ही बताएं। लेकिन यह बात तो बहुत ही मंथन के बाद जनता के बीच उभरकर सामने आई है। एक जिम्मेदार नागरिक ने चर्चा के दौरान मुझे सही सवाल किया कि यह बताएं कि कितने व्यापारी-उद्योगपति और अन्य किसान बने हुए। उनका तो यहां तक कहना था कि 50 प्रतिशत से अधिक और इनकी खेती की उपज आयकर विभाग में कितने लाभ में है जरा भारत सरकार देश के हर जिले की स्थिति आयकर विभाग से ही स्पष्ट कराएं। अरे भाई जब 50 प्रतिशत से अधिक खेती व्यापारियों-उद्योगपतियों अन्य की है और इनकी खेती लाभ में है तो फिर घाटे कि किसके यहां और कैसे है ? आयकर विभाग पर उंगली उठेगी तो हो सकता है देश में नई ऊर्जा का संचार होगा। राजनैतिक दल चौक जाएंगे और फिर शायद नई पैंतरेबाजी होगी शुरू।
किसानों को वाजिब दाम उनकी उपज का मिले और मिलना भी चाहिए। लेकिन उनके लाभ को क्यों नकली दवाई, खाद, बीज उन्हें घाटा नहीं पहुंचा रहे है। किसानों के शुभचिंतक नेता देश में ऐसी नकली फैक्ट्रीयां-कारखाने को बंद करवाने का मांग क्यों नहीं कर रहे है। दूसरा प्रश्न यह है कि कर्ज के कारण किसान आत्महत्या कर रहा है तो किसानों के शुभचिंतक यह बताये कि देश में कितने रासायनिक खाद, कृषि दवाई, जैविक खाद, बीज का बढ़ा देते है और किसान लेने के लिये मजबूर रहता है तो किसानों के शुभ चिंतकों ने इन फैक्ट्री मालिकों और सरकार के खिलाफ आवाज उठाकर इनके दाम कम क्यों नहीं करवाए। एक व्यापारी का कहना था कि व्यापार में यदि व्यापारी को घाटा जाता है तो क्या सरकार भावांतर या समर्थन मूल्य देगी। बाजार में सामान की कीमत सरकार तय करेगी ? आयकर विभाग से यह स्पष्ट करना चाहिये कि कितने किसान उनके यहां लाभ की खेती के है। जिन्हें आयकर में छूट मिली। यह ज्यादा नहीं तो 20 वर्षों का ही हाल चाल जान जनता की टेबल पर रख दे।
मंदसौर संसदीय क्षेत्र में भाजपा का जो ताना-बाना बुना गया था वह आज छिन्न-भिन्न तो नहीं हो गया है। भाजपा की वरिष्ठ नेताओं की जो पहुंच गांवों और किसानों तक थी क्या आज उसके जनप्रतिनिधि उसे पुरी कर रहे है। भाजपा का नेतृत्व आज भी गुटबाजी से उभरकर बाहर आया हो ऐसा प्रतीत होना जनता के बीच नहीं लगता है। इस संसदीय क्षेत्र की भाजपा के कार्यकर्ताओं की साख को और अधिक बल देने के लिये अब उपलब्ध है तो भाजपा के वरिष्ठ विधायक एवं पूर्व मंत्री श्री कैलाश चावला पर अभी तक तो इस संसदीय क्षेत्र में भाजपा द्वारा उनका उपयोग किस तरह किया जाना चाहिये यह वह तय नहीं कर पाई। यह सारी बाते उभरकर आ रही है आमजन की चौपाल से।

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