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क्या है नाम बदलने की राजनीति? बीजेपी के साथ कांग्रेस भी नहीं है पीछे!

मासूम और भोलेभाले लोग, जो की किसी खास विचारधारा के मानसिक गुलाम होते है, उन्हें लगता है कि सरकार से जुड़े लोग उनकी भावनाओं के लिये कोई ऐसा कोई काम करते है… सोचने विचारने वाली बात है कि जो आपकी निजी रूचि के विषय धर्म, जाति, समाज को राजनैतिक मुद्दा बनाकर सत्ता सुख की सीढ़ियों पर चढ़ जाते है, उनसे इतनी पवित्रता की उम्मीद कुछ ज्यादा अपेक्षित तो नही हो गया…

शेक्सपियर के नाटक रोमियो ऐंड जूलियट का एक मशहूर संवाद है- ‘नाम में क्या रखा है? गुलाब को कुछ भी पुकारो, उसकी सुंदरता और सुगंध वैसी ही रहेगी।’ ऐसा लगता है कि अपने देश के नेता शेक्सपियर के इस संवाद से बहुत प्रभावित हैं। इसलिए जब भी उन्हें कोई मौका मिलता है, वे किसी शहर, अस्पताल, कॉलेज, सड़क या चौराहे का नाम बदलने की मुहिम शुरू कर देते हैं। उन्हें लगता है कि नाम का क्या, जब चाहो बदल लो। लेकिन दुर्भाग्य से यह सच नहीं है। किसी शहर, जिले, सड़क, स्टेशन का नाम बदलने पर सरकारी खजाने से भारी रकम खर्च होती है, लाखों, करोडो के ठेके नेताओ के सगे-संबंधियों, रिश्तेदारों, अनुयाइयों में बांटा जाता है…

आज नाम इसलिए प्रासंगिक हो उठा है, क्योंकि केंद्र सरकार ने उत्तरप्रदेश की बहुत ही ख्यातिप्राप्त चिर-परिचित जगह का नया नामकरण किया गया है। मुगलसराय एक ऐसा ही नाम है जिससे देशी ही नहीं, विदेशी भी भली-भांति परिचित हैं, क्योंकि यहां से न सिर्फ उनके लिए काशी का रास्ता जाता है बल्कि सारनाथ की ख्याति इसे दूर-दूर तक लोकप्रिय करती है। इसका नाम अब ‘दीनदयाल स्टेशन’ कर दिया गया है।

इलाहाबाद का नाम 444 साल बाद फिर से प्रयागराज होने जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को इसकी घोषणा कर दी है। उनके मुताबिक राज्यपाल ने भी इस पर अपनी सहमति दी है। घोषणा से संत समाज उत्साहित है। दरअसल पुराणों में इसका नाम प्रयागराज ही था। अकबर के शासनकाल में इसे इलाहाबाद कर दिया गया था।

ऐसा नहीं है कि पहली बार कोई नाम बदला गया हो। नाम बदलने का लंबा इतिहास है। कभी राज्यों, तो कभी शहरों का। सड़क-मुहल्लों की गिनती नहीं कर पा रहा नगर निगम का जो भी आका होता है, वो मनमानी करता रहता है। आसपास नजर दौड़ाएंगे तो तमाम पार्षदों के मां-बाप, रिश्तेदारों के नाम पर सड़कें मिल जाएंगी। राज्यों या शहरों का नाम बदलने के लिए केंद्र की स्वीकृति लेनी होती है।

स्वतंत्र भारत में साल 1950 में सबसे पहले पूर्वी पंजाब का नाम पंजाब रखा गया। 1956 में हैदराबाद से आंध्रप्रदेश, 1959 में मध्यभारत से मध्यप्रदेश नामकरण हुआ। सिलसिला यहीं नहीं खत्म हुआ। 1969 में मद्रास से तमिलनाडु, 1973 में मैसूर से कर्नाटक, इसके बाद पुडुचेरी, उत्तरांचल से उत्तराखंड, 2011 में उड़ीसा से ओडिशा नाम किया गया। लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती। मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, शिमला, कानपुर, जबलपुर लगभग 15 शहरों के नाम बदले गए। सिर्फ इतना ही नहीं, जुलाई 2016 में मद्रास, बंबई और कलकत्ता उच्च न्यायालय का नाम भी बदल गया।

लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इससे मिलते-जुलते नामों से बदलाव किया गया है। अब तक शहरों का नाम नेताओं के नामों पर करने की कवायद नहीं की गई।
नामों में ज्यादातर बदलाव राजनीतिक कारणों से होता है लेकिन कुतर्क ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त करने की दी जाती है या कभी साम्राज्यवादी विरासत से बाहर निकलने की दी जाती है। नाम बदलने से सरकारों को फायदा ये होता है कि उन्हें कम समय में सुर्खियां बटोरने को मिल जाती है, दूसरा गंभीर विषयों से जनता का ध्यान बाहर निकालना होता है।

कांग्रेस भी नहीं है नाम बदलने में पीछे
आपको याद होगा कि यूपीए सरकार के समय में कनाट प्लेस और कनाट सर्कस का नाम बदलकर राजीव चौक और इंदिरा चौक हुआ था। इस बात को एक दशक से भी ज्यादा हो चुका है लेकिन आज भी लोग कनाट प्लेस ही जाते हैं। अगर कनाट प्लेस का नाम बदल जाने से कांग्रेस को फायदा होना होता तो वो आज हाशिये पर नहीं होती।
बहुत से लोगों का ये तर्क है कि कांग्रेस ने किया तो भाजपा भी क्यों न करे? लेकिन मैं यही कहना चाहूंगा कि किसी भी सरकार का काम गलतियां दोहराने का नहीं बल्कि उन गलतियों से सबक लेने का होना चाहिए। दिल्ली के रेसकोर्स का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग हुआ। कितनों को याद हुआ होगा? अगर मेट्रो स्टेशन वहां नहीं होता तो ये नाम भी शायद सिर्फ कागजों पर होता।

नाम बदलने में सरकारी खजाना होता है खाली
सत्ता में आते ही पार्टियां नाम बदलने की राजनीति शुरू कर देती हैं। लोगों को लगता है कि चलो इनको अपना शौक पूरा कर लेने दो, इससे हमें क्या नुकसान है? लेकिन नाम बदलने की यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होती। केंद्र से लेकर प्रदेश के खजाने के साथ-साथ सरकारी व गैर सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों व आम जनता को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। किसी भी जिले या संस्थान का नाम बदलने के लिए पहले प्रदेश कैबिनेट की मंजूरी जरूरी है। वहां प्रस्ताव पास होने के बाद शासन एक गजट प्रकाशित करता है। इसकी एक कॉपी सरकारी डाक से संबंधित जिले के डीएम को भेजी जाती है। कॉपी मिलने के बाद डीएम नए नाम की सूचना अपने अधीन सभी विभागों के विभागाध्यक्ष को पत्र लिखकर देते हैं। एक जिले में 70 से 90 तक सरकारी डिपार्टमेंट होते हैं। सूचना मिलते ही इन सभी विभागों के चालू दस्तावेजों में नाम बदलने का काम शुरू हो जाता है। सभी सरकारी बोर्डों पर नया नाम लिखवाया जाता है। सरकारी-गैर सरकारी संस्थानों को अपने साइन बोर्ड बदलवाने पड़ते हैं। जिले में स्थित सभी बैंक, थाने, बस अड्डे, स्कूलों-कॉलेजों को अपनी स्टेशनरी व बोर्ड में लिखे पते पर जिले का नाम बदलना पड़ता है। पुरानी स्टेशनरी और मोहरें बेकार हो जाती हैं।

अनेक जगह होता है परिवर्तन
यह सारा काम तो जिले स्तर पर होता है। दूसरी ओर राज्य सचिवालय को भी उस जिले के बारे में अपने रिकार्ड बदलने पड़ते हैं। केंद्र सरकार, रेलवे और चुनाव आयोग को सूचना भेजनी होती है। हालांकि रेलवे और निर्वाचन आयोग अपनी सूची में इतनी जल्दी बदलाव नहीं करते। यदि कोई जिला या शहर अंतरराष्ट्रीय नक्शे पर हो, तब तो और मुश्किलें आती हैं। बॉम्बे भले ही मुंबई हो गया हो लेकिन बैंक ऑफ अमेरिका या लुफ्तहांसा एयरलाइंस के यहां इसकी स्पेलिंग वही पुरानी है। इसकी अपनी जटिलताएं हैं। आप रेलवे टाइमटेबल में पंचशील नगर खोज रहे हैं, जो उसमें कहीं है ही नहीं। कुल मिलाकर इस पूरी प्रक्रिया में उसी तरह से धन और श्रम खर्च होता है, जिस तरह हम बेवजह गड्ढा खोदकर उसे पाटने में खर्च कर सकते हैं।

बहरहाल, नामकरण की राजनीति बंद होनी चाहिए। यदि आवश्यक भी हो तो एक गैर राजनीतिक कमेटी होनी चाहिए, जो नाम बदले जाने के पीछे वाजिब तर्क दे सके।

 

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