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क्षरण के कारण सैंकड़ों वर्ष प्राचीन महाकाल की पूजा पद्धति हुई संशोधित- ऐसा ही श्री पशुपतिनाथ मंदसौर में भी होना चाहिये पालन

अनादिकाल से अवन्तिका (उज्जैन) में स्थित पौराणिक महाकाल की वर्तमान में सुरसा की मुख की तरह फैलते जा रहे प्रदूषित पर्यावरण के दुष्प्रभाव से जल, वायु तथा रासायनिक उर्वरकों की पैदा की गई सामग्री आदि के प्रयोग से महाकाल लिंग के हो रहे क्षरण को रोकने के लिये प्रतिदिन प्रातः 3 बजे ब्रह्म मुहूर्त में उपलो-कण्डों की राख से होने वाली भस्म आरती की पूजा पद्धति में संशोधन के साथ जलाभिषेक में प्रयुक्त होने वाले जल की मात्रा में कमी की जाकर शुद्ध जल आर.ओ. जल से ही अभिषेक तथा शुद्ध पूजा सामग्री निश्चित-सीमित मात्रा में करने का उच्चतम न्यायालय द्वारा आदेश दिया गया है। शास्त्रों में वर्णित प्रतिष्ठापित सैकड़ों वर्ष प्राचीन बारह ज्योर्तिलिंगों में एक ज्योर्तिलिंग महाकाल शिवलिंग होते हुए भी क्षरण के मद्देनजर जब पूजा पद्धति संशोधित हो सकती है तो फिर त्रयोदश (अघोषित) ज्योर्तिलिंगों में माने जाने वाले विश्व की एक मात्र दिव्य-अलौकिक-विशाल-भव्य प्रतिमा श्री पशुपतिनाथ लिंग न होकर प्रतिमा है जिसे पुरातत्व विशेषज्ञों द्वारा निरीक्षणोंपरांत क्षरण का कारण अभिषेक को बताये जाने से महाकाल की तर्ज पर भगवान श्री पशुपतिनाथ में भी यदि लागू किया जाता है तो इसमें किसी भी शिवभक्त को एतराज नहीं होना चाहिये।

यद्यपि भक्त की भावना सर्वाेपरी होती है परन्तु यदि जिन भगवान की आराधना हम कर रहे है, क्षरण के कारण यदि वै ही नहीं रहेंगे तो फिर अभिषेक पूजा किसकी करेंगे।  अपने इष्ट- श्री विग्रह की सुन्दरता-भव्यता अनन्तकाल तक अक्षुण्य बनी रहे और हम उनके दर्शन कर धन्य-धन्य होते रहे इस ओर हमारा लक्ष्य होना चाहिये। अपने प्रेमी भगवान की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता, खुशी समझकर भक्तों द्वारा बड़े से बड़ा त्याग करने के उदाहरण शास्त्रों में भरे पड़े है।  गोपियों का उदाहरण अनकुरणीय है मथुरा और गौकुल की दूरी पैदल चलकर कुछ घण्टों में सवेरे जाकर शाम को घर लोटकर आ सकते है। परन्तु जब भगवान श्री कृष्ण रोती-बिलखती गोपिकाओं को छोड़कर मथुरा चले गये और फिर कभी लौटकर नहीं आये, उस अवस्था में गोपियां प्रतिदिन मथुरा जाकर कृष्ण से मिल सकती थी परन्तु श्री कृष्ण से एक मिनिट का भी वियोग सहन नहीं करने वाली गोपियां जीवन पर्यन्त कृष्ण से मिलने मथुरा इसलिये नहीं गई कि मथुरा जाते समय कृष्ण ने मिलने के लिये मथुरा आते-जाते रहने की नहीं कहा था और गोपियों ने इसे भगवान श्री कृष्ण की इच्छा को अपनी भक्ति भावना से अधिक समझकर वियोग जनित दुःख को बर्दाश्त करना स्वीकार कर लिया। परन्तु अति समीप होते हुए भी कृष्ण से मिलने  मथुरा कभी नहीं गई। भगवान श्री पशुपतिनाथ का क्षरण और अधिक नहीं हो। यदि समय-परिस्थिति की मांग अनुसार श्री पशुपतिनाथ मंदिर प्रबंध समिति यदि कोई उचित निर्णय लेती है तो उसे सहर्ष शिरोधार्य स्वीकार करना उचित ही नहीं होगा बल्कि  भगवान श्री  पशुपतिनाथ के चरणो ंमें यह हमारी उपासना भक्ति ही होगी।

Post source :  बंशीलाल टांक

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