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खिलचीपुरा के कुबेर मंदिर में श्रृद्धालुओं ने किये दर्शन

शहर से सटे खिलचीपुरा में स्थित धौलागढ़ महादेव मंदिर में भगवान कुबेर की प्रतिमा के दर्शनों के लिए सुबह से ही भक्तों का तांता लग गया। लंबी कतार में लगकर भक्तों ने दर्शनों का लाभ लिया। सुबह 9.30 बजे से महाभिषेक, हवन और पूजन किया गया। इसके बाद महाआरती कर भोग लगाकर प्रसादी का वितरण किया गया।
शहर से 5 किलोमीटर दूर खिलचीपुरा के कुबेर मंदिर में धनतेरस पर श्रद्धालुओं का तांता लगा। 1400 साल पुराने शिव-कुबेर मंदिर में दिनभर में 15 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किए। वे पहले झुके इसके बाद ही उन्हें कुबेरजी के दर्शन हो सके। पशुपतिनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित ग्राम खिलचीपुरा स्थित धौलागढ़ महादेव मंदिर के पुजारी हेमंत गिरि गोस्वामी की मानें तो यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। विश्व में दो ही स्थान ऐसे हैं, जहां शिव पंचायत में कुबेर भी शामिल हैं। एक देश के चार धामों में शामिल केदारनाथ में तथा दूसरी प्रतिमा गुप्तकाल के 1400 साल पुराने धौलागढ़ महादेव मंदिर में हैं। इतिहासविद् डॉ. कैलाश पांडेय के अनुसार कुबेर की प्रतिमा उत्तर गुप्तकाल 7 वीं शताब्दी में निर्मित है। मराठा काल में धोलागिरी महादेव मंदिर के निर्माण के दौरान इसे गर्भगृह में स्थापित किया गया। इस मंदिर में भगवान गणेश व माता पार्वती की प्रतिमा भी है। डॉ. पांडेय बताते हैं कि 1978 में इस प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में देखा गया। प्रतिमा में कुबेर बड़े पेट वाले, चतुर्भुजाधारी सीधे हाथ में धन की थैली और तो दूसरे में प्याला धारण किए हुए है। नर वाहन पर सवार इस प्रतिमा की ऊंचाई लगभग तीन फीट है।

मंदिर के पट सुबह 5 बजे पंडित हेमंतगिरी गोस्वामी ने पूजन कर खोले। शिव प्रतिमा के समीप स्थित पश्चिममुखी कुबेर भगवान के दर्शन के लिए सुबह से ही 200 से अधिक श्रद्धालुओं की कतार लगी थी। दर्शनों का सिलसिला देररात तक चला। पुजारी ने बताया कुबेर प्रतिमा केदारेश्वर मंदिर के बाद मंदसौर में ही है। कुबेर को धन का देवता कहा जाता है। धनतेरस पर मंदिर में पूजन और दर्शन विशेष फलदायी होता है। इसके चलते बड़ी संख्या में श्रद्धालु हर साल आते हैं।

प्राचीन कुबेर मंदिर में धनतेरस पर शुक्रवार को भक्तों ने समृद्धि की कामना के साथ पूजन किया। धन के देवता के पूजन के लिए दिनभर कतार लगी। दूरदराज के श्रद्धालु भी पूजन के लिए आए। खिलचीपुरा स्थित पश्चिममुखी प्राचीन कुबेर मंदिर में धनतेरस पर पूजन के लिए आस्था का मेला लगा। मंदिर की बनावट ऐसी है कि हर भक्त को सिर झुकाकर दर्शन के लिए जाना पड़ता है। शिव मंदिर में छोटा सा दरवाजा है। इसमें एक साथ दो भक्त प्रवेश नहीं कर सकते।
डेढ़ हजार साल पुरानी है मूर्ति- पुजारी कन्हैयालाल गिरी ने बताया दुर्लभ कुबेर प्रतिमा डेढ़ हजार साल पुरानी है। इसे गुप्तकाल की माना जाता है। प्रतिमा पहले अन्य किसी स्थान पर थी, जहां से इसे खिलचीपुरा स्थित शिव मंदिर में विराजित किया था। कुबेर की सबसे बड़ी प्रतिमा व प्रसिद्धि के चलते लोग इसे कुबेर मंदिर के नाम से जानने लगे। धनतेरस पर भगवान कुबेर के दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी।
इसमें कई साधकों ने भागीदारी की। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में अनुष्ठान शुरू हुआ। इसमें धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए आहुति दी गई।

प्राचीन कुबेर मंदिर में आने वाले हर श्रद्धालु को भगवान के दर्शन करने से पहले झुकना पड़ता है। मुख्य मंदिर में प्रवेश के लिए बने द्वार की बनावट ऐसी है कि झुके बगैर मंदिर में प्रवेश नहीं हो सकता। 3 फीट ऊंचाई वाले दरवाजे से प्रवेश के बाद कुबेर दर्शन करने वाले श्रद्धालु को झुककर उसी दरवाजे से वापस लौटते हैं। धनतेरस पर मंदिर में गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों के श्रद्धालु आए।

शिवलिंग के समीप पश्चिममुखी कुबेर प्रतिमा है। धनतेरस पर शिव पूजन से पहले श्रद्धालु कुबेर पूजन करते हैं। संभवत: पश्चिममुखी कुबेर प्रतिमा केदारनाथ के बाद मंदसौर में ही स्थापित है। मंदिर की बनावट ऐसी है कि गर्भगृह में प्रवेश के लिए हर श्रद्धालु को झुककर जाना पड़ता है। दरवाजे की ऊंचाई करीब तीन फिट है।

पहले पूजते हैं कुबेर, वंश पंरपरा से है पुजारी – मंदिरके पुजारी हेमंत गिरी गोस्वामी ने बताया धनतेरस पर मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश के बाद पहले कुबेर का पूजन करते हैं। इसके बाद शिव का पूजन कर जलाभिषेक करते हैं। वंश परंपरानुसार मंदिर की पूजन व्यवस्था पहले उनके पिता कन्हैयालाल गिरी और उनके दादा नंद गिरी ने संभाली। अब वे मंदिर की पूजन व्यवस्था संभाल रहे हैं। धरतेरस पर मंदिर में गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रांतों के श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। खास बात यह है कि गर्भगृह का प्रवेश द्वार करीब तीन फीट ऊंचा है इसलिए श्रद्धालुओं को झुककर या फिर बैठकर ही मंदिर में प्रवेश करना होता है।

गर्भगृह में ताला नहीं लगता आज भी– मंदिरके गर्भगृह में तीन फीट के दरवाजे में ताला नहीं लगाया जाता है। मंदिर के पट बंद नहीं करने की परंपरा आज भी निभाई जा रही है। मंदिर की सुरक्षा के लिए 20 साल पूर्व नंदीगृह में सुरक्षा दीवार बनाई थी। सुरक्षा बतौर जाली के दरवाजे लगाए लेकिन गर्भगृह को आज भी खुला रखा है।

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