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गजब की ये गला लगाई

परस्पर लिपटकर स्नेह जताने की कला का कोई स्थापित नियम नहीं है। इसके लिए देश, काल तथा परिस्थिति जैसे अवयव भी तय नहीं किए गए हैं। बेशक ऐसे आपसी अभिवादन पर आप खुश हो सकते हैं। आपको हैरत हो सकती है। लेकिन मामला वात्स्यायनमयी न हो तो कोई आधार नहीं बनता कि सार्वजनिक तौर पर किए गए ऐसे स्नेह प्रदर्शन को लेकर नाक-भौं सिकोड़ी जाए। लेकिन मामला तो नाक वालों का ही है। प्रदेश सरकार के शरीर में दिग्विजय सिंह का स्थान नाक से कम नहीं है। इधर, इंदौर की सियासत में कैलाश विजयवर्गीय की भी यही भूमिका है। भाई लोगों ने अपने-अपने तरीके से यह अहम मुकाम हासिल किया है। इसलिए आज इंदौर में जब दो नाक यानी दिग्विजय और कैलाश एक-दूसरे से हाथ मिलाते साथ ही लिपट गये तो इसकी सियासी व्याख्या नहीं की जाना चाहिए

न कांग्रेसियों और न ही भाजपाइयों को यह शिकायत हो कि क्यों उनके नेता ने विरोधी गुट की शख्सियत के साथ ऐसा सामीप्य जताया। राजनीति की तो यह खास नीति होती है कि जितना कट्टर विरोधी सामने आए, उतने ही प्रेम से उससे मिलो। हमेशा से यही होता आया है। हां, बिहार में लालू बनाम नीतिश, उत्तरप्रदेश में मायावती बनाम अमर सिंह तथा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी बनाम प्रत्येक विरोधी दल के सदस्य को अपवाद समझकर इस शिष्टाचार से परे रखा जा सकता है। क्योंकि ये विरोधी को लिपटाने नहीं, बल्कि जड़ समेत निपटाने में यकीन रखते हैं। राजनीति का यह नवाचार बीते कुछ वर्षों में खासा लोकप्रिय हुआ है। शनै:-शनै: इसका विस्तार होता दिखने लगा है। लेकिन मध्यप्रदेश ने यह परम्परा कायम रखी है।

बीते साल की ईद पर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके वर्तमान समकक्ष कमलनाथ ईदगाह पर गजब अंदाज में गले मिले थे। उस लिपटन में ऐसी गर्मजोशी थी कि लिप्टन की कड़क से कड़क चाय में भी उसे नहीं पाया जा सकता। उस दिन तो एकबारगी यह तक लगा था कि मामला सियासी बाली-सुग्रीव का नहीं बल्कि राम-भरत का है। आज के घटनाक्रम के बहाने बैठे-ठाले भाइयों की सुविधा का एक प्रबंध हो गया। न दिग्विजय कई दिन से मीडिया की सुर्खियों में थे और न ही विजयवर्गीय किसी सकारात्मक तरीके से यह सौभाग्य हासिल कर पा रहे थे। आज दोनो का चर्चा हर ओर है। सोशल मीडिया पर तो इससे संबंधित वीडियो तथा छायाचित्र इस श्रद्धा से प्रचारित/प्रसारित किया जा रहा है गोया कि यह ओ हेनरी की खुशी से आंख नम कर देने वाली किसी सुखांतिका का हिस्सा हो।

सचमुच तरस उन लोगों पर आ रहा है, जो इस तस्वीर पर कमेंट करते हुए यह याद दिला रहे हैं कि पूर्व में इन नेताओं ने किस-किस तरह से एक-दूसरे के लिए जमकर विष-वमन किया है। इस तरह की नसीहत उस राजनीति में देने का कोई अर्थ नहीं, जो ‘ स्थायी दोस्ती, न स्थायी दुश्मनी’ वाले सिद्धांत पर संचालित की जा रही हो। हां, दुश्मनी की बात चली तो ये बता दें कि इन दोनो नेताओं के बीच संबंधों के इस पक्ष को लेकर फिलहाल एक कॉमन फैक्टर सक्रिय है। ज्योतिरादित्य सिंधिया। सिंधिया महाशय ने बीते साल अक्टूबर में मध्यप्रदेश क्रिकेट संघ के चुनाव में कैलाश विजयवर्गीय को उनकी कर्मभूमि इंदौर में ही मात दे दी थी। एसोसिशन के रसूखदार सचिव पद के लिए मुख्य मुकाबला सिंधिया गुट के संजीव राव और विजयवर्गीय गुट के अमिताभ विजयवर्गीय के बीच था।

इस चुनाव में राव ने विजयवर्गीय को 17 वोट के अंतर से शिकस्त दी थी। इधर, सियासत की पिच पर सिंधिया एंड कंपनी लगातार दिग्विजय की घेराबंदी में सक्रिय है। क्योंकि इस समूह का मानना है कि सिंह के चलते ही उनके नेता को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद नहीं दिया जा रहा है। तो इस आधार पर यह सतही व्याख्या की जा सकती है कि आज की गला-लगाई ‘दुश्मन का दुश्मन, अपना दोस्त’ वाला मामला हो सकती है। इस व्याख्या को सतही इसलिए कह रहे हैं कि इसमें बहुत कम दम है। नेताद्वय अपने-अपने स्तर पर विरोधी को ठिकाने लगाने में सक्षम हैं। इसके लिए उन्हें एक-दूसरे के सहयोग की कोई जरूरत नहीं है। अब मालिनी गौड़ के ताल्लुक से विजयवर्गीय को सिंह की किसी मदद की जरूरत हो तो बात और है। खैर, हमें इससे क्या। वरना तो हम यह भी कह सकते हैं कि ‘बल्लेबाज’ बेटे आकाश विजयवर्गीय के खिलाफ दर्ज आपराधिक प्रकरण में भी सरकार की ओर से दिग्विजय काफी मददगार साबित हो सकते हैं। आज की बात यहीं तक। सिंह तथा विजयवर्गीय को यह भाईचारा मुबारक हो।

 

प्रकाश भटनागर

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