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गायत्री परिवार द्वारा 8 अक्टुबर को सर्वपितृ अमावस्या पर किया जायेगा

श्राद्ध तर्पण व पिण्डदान संस्कार का  निःशुल्क आयोजन।

मंदसौर। पितरों के लिये श्रद्धा से किये गये मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋशियों या पितरों को सुगंधित द्रव्य मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। वेदों के अनुसार इससे पितृऋण चुकता है। तर्पण, पिण्डदान और घूप देने से आत्मा की तृप्ति होती है। तृप्त आत्माऐं ही प्रेत नहीं बनती। श्राद्ध पक्ष की विवेचना करते हुए गायत्री परिवार के केषव राव षिन्दे ने बताया कि पुराणों के अनुसार श्रद्धायुक्त होकर श्राद्धकर्म करने से पितृगण ही तृप्त नहीं होते अपितु देवगण, ऋशिगण, पषु पक्षी, सरीसृप आदि समस्त भूतप्राणी भी तृप्त होते हैं। ये क्रिया कर्म ही आत्मा को पितृलोक तक पहुंचने की ताकत देते है और वहां पहुंचकर आत्मा दूसरे जन्म की प्रक्रिया में षामिल हो पाती है। जो परिजन अपने मृतकों का श्राद्ध कर्म नहीं करते उनके प्रियजन भटकते रहते हैं। यह कर्म एक ऐसी विधि है जिसके माध्यम ये आत्मा को सही मुकाम मिल जाता है और वह भटकाव से बचकर मुक्त हो जाती है। पितृ हमारे अदृष्य सहायक होते हैं, संतुश्ट होकर पितर मनुश्यों के लिये आयु, पुत्र, यष, स्वर्ग, कीर्ति, पुश्टि, बल, वैभव, पषु, सुख, धन और धान्य देते हैं। सूर्य की सहस्त्रों किरणों में जो सबसे प्रमुख है उसका नाम अमा है। उस अमा नामक प्रधान किरण के तेज से सूर्य त्रैलोक्य को प्रकाषमान करते हैं। उसी अमा में तिथि विषेश को चन्द्र का भ्रमण होता है, तब उक्त किरण के माध्यम से चंद्रमा के उर्ध्व भाग से पितर धरती पर उतर आते हैं इसीलिए श्राद्धपक्ष की अमावस्या तिथि का महत्व है और इस तिथि में समस्त पितरों को श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध तर्पण, पिण्डदान आदि कर उन्हें संतुश्ट किया जाता है। श्री षिन्दे ने बताया कि प्रतिदिन निःषुल्क तर्पण व पिण्डदान गायत्री षक्तिपीठ पर करवाया जा रहा है, 8 अक्टुबर सोमवार को सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर श्राद्ध कर्म पिण्डदान व तर्पण संस्कार पषुपतिनाथ मंदिर हॉल में प्रातः 8 बजे से निःषुल्क करवाया जायेगा। श्री षिन्दे ने निवेदन किया कि संस्कार हेतु अपने घर से दो स्टील के बड़े धामें साथ लेकर भारतीय वेशभूशा में आऐं। भारतीय संस्कृति के इस विषिश्ट संस्कार में अधिक से अधिक संख्या में भागीदारी कर अपने पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर उनके आषीर्वाद व अनुदानों के भागीदार बनें।

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