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घटना के बाद जागा प्रशासन, फिर कहीं न सो जावें,परिवहन अधिकारियों पर भी हो आपराधिक मामला दर्ज

मंदसौर। रविवार को शामगढ के निकट धामनिया दिवान में हुआ बस हादसा और उसके बाद आनन फानन में परिवहन कार्यालय और यातायात पुलिस प्रशासन दोनों हरकत में आया और ओवर लोड बसों पर कार्यवाही की। अब प्रश्न यह उठता है कि यह कार्यवाही जिम्मेदार लोग हादसों के पहले क्यों नहीं करते है।

हादसे के ठीक बाद जिस तरह से मंदसौर जिले के सभी थाना क्षेत्रों में ओवर लोडिंग बसों के खिलाफ एक मुहिम शुरू की है। जो एक अच्छी खबर है। लेकिन किसी हादसे के बाद ही इस तरह की कार्यवाही कर फिर वापस पुराने रवैये पर आने के कारण हादसे घटित होते रहते है। मंदसौर से भानपुर की ओर जाने वाली अधिकांश बसों की छत पर कई टन लगेज चढ़ाया जाता है और यही हादसों का कारण होता है। यही नहीं यहॉ से जाने वाला माल बिल का है या बिना बिल का कोई देखने वाला नहीं। व्यापारीगण टैक्स बचाने के चक्क्र में अपने माल को ट्रांसपोर्ट से भेजने के बजाए बसों से भेजना ज्यादा उचित समझते है।

हादसों के बाद परिवहन विभाग के अधिकारी भी कुछ दिनों बसों के परमिट व फिटनेस की जॉच करने में लग जाते है। कार्यवाही भी कि जाती है। लेकिन कार्यवाही के बाद बस मालिकों पर क्या कार्यवाही हुई कितना जुर्माना किया, किन बसों के परमिट निरस्त किए, कौन से मोटर मालिकों को दोषी माना यह नहीं बताया जाता जो कहीं कहीं शंका को जन्म देता है। वेसे भी परिवहन विभाग के जिम्मेदारी अधिकारी या तो ऑफिस आते ही नहीं और आ भी जाते है तो गर्मी में एसी रूम के बाहर निकलना नहीं चाहते है। हालांकि कौन सी बस जिले में बिना परमिट, बिना फिटनेस के दौड़ रही है यह जानकारी विभाग को नहीं हो ऐसा संभव नहीं है। लेकिन आर्थिक कारणों को लेकर कहीं न कहीं परिवहन विभाग यात्रियो के साथ मौत का सौदा कर ही देते है। हालांकि घटना के बाद राज्य शासन ने क्षेत्रिय परिवहन प्रभारी अधिकारी रंजना कुशवाह को निलंबित कर मामले को शांत करने का प्रयास जरूर किया है। लेकिन विभाग की अनदेखी के चलते बस हादसे में नौ लोगोें की मौत होना कोई छोटी बात नहीं है। घटना के बाद जिला प्रशासन द्वारा बस मालिक परिचालक एवं चालक के विरूद्ध मामला दर्ज करने की बात कही गई है। लेकिन इस बस हादसे में जिम्मेदारी तो क्षेत्रिय परिवहन कार्यालय अधिकारियों की भी बनती है। अगर इनके विरूद्ध भी आपराधिक प्रकरण दर्ज होता तो शायद मरने वालों के साथ न्याय हो जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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