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चलचित्रों (सिनेमा) में सेंसर बोर्ड द्वारा सिगरेट (धू्रमपान), शराब दृष्यों को प्रतिबंधित करने के समाचार, स्वस्थ्य-स्वच्छ जीवन के लिये सुनहरा संदेश

फिल्मों में स्मोकिंग (धूम्रपान) और ड्रिंक (शराब) के दृष्य बेन के समाचार स्वस्थ एवं उन्नत जीवन के लिये जनहित-राष्ट्रहित में सुकूनभरा-सुनहरा-सुखद संदेश है।

वर्तमान में युवा ही नहीं नाबालिग बच्चों पर एक तरफ मोबाईल पर व्हाट्सअप, फेसबुक, परिवारों के तोड़ने वाले झगड़ालू धारावाहिक तो दूसरी तरफ फिल्मों में दिखाये जाने वाले हिंसात्मक, भद्दे, अश्लील दृष्य और उस पर भी हीरों द्वारा एक हाथ में सिगरेट से पर्यावरण को प्रदूषित करना, आकाश में उड़ता जहरीला धुंआ, दूसरे हाथ से मंुह में उड़ेलते बीयर (शराब) की बाटल-गिलोय और वह भी नीम चढ़ी, यह सब देखकर कैसे बचेगा। सिनेमा देखने वाला विशेषकर वह युवा पीढ़ी जिसने शराब और सिगरेट के जाल में फंसकर मजबूत हाथों में आजादी की मशाल थाम कर तथा मुहं से इंकलाब के नारों से अंग्रेजों की रूह कंपाकर देश को आजादी दिलाई थी, उन्हें भूलती जा रही है।

सिनेमा के हिंसक, शराब, धूम्रपान के बेहूदे-बेढंग, बदरंग दृष्यों ने सिनेमा हाॅल में बैठे युवाओं को मानसिक मनाव का अभिशाप देकर उन्हें शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शान्ति दोनों से कंगाल कर दिया है। धूम्रपान और शराब की लत से ग्रसित होकर युवावस्था में स्वर्णीम आभा से चमकते चेहरे मुरझाये फूल की तरह मायूस-उदास-निराश-हताश दिखाई देने लगते है। रोगों से ग्रसित बीमार शरीर को भार की तरह ढोते हुए जैसे तैसे जीवन की गाड़ी को हांकने को मजबूर हो रहे है।

भारत के जिन युवाओं के लिये कहा जाता था ‘‘जहां पांव धरे वहां पानी निकल जाये’’ उस युवा का जब पैर उठे ही नहीं लख-खड़ाने लगे तो पानी कहां से निकलेगा अर्थात् वह राष्ट्र सेवा क्या कर पायेगा ? ऐसी विषम-विपरित परिस्थिति में उज्जवल भविष्य को बचाने के लिये सर्वप्रथम उसके स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान देने के लिये उन सभी टीवी, सिनेमा दृष्यों को बंधित करना होगा जो युवाओं के मन मस्तिष्क पर कुप्रभाव डाल रहे हो। असमय बर्बाद होने से बचा जा सके, इसके लिये सिनेमा-फिल्मों में सिगरेट अर्थात् धूम्रपान और शराब पर प्रतिबंध शुरूआती अच्छी पहल तो है परन्तु सार्थक तो तब होगी जब प्रतिबंध स्थायी तौर पर लागू रहे। कारण कि जनहित में केन्द्र हो चाहे राज्य सरकारे, जब सरकारे ही एक तरफ धू्रमपान, मद्य निषेध सप्ताह- दिवस आयोजित तो करती है नशा नहीं करने, धू्रमपान सिगरेट नहीं पीने, गुटका तम्बाकु नहीं खाने स्वास्थ्य के लिये हानिकारक बताकर त्याग करने के लिये लम्बे-चैड़े भाषण, विज्ञापन, रैलियांे पर लाखों करोड़ों रूपये प्रतिवर्ष खर्च कर दिये जाते है परन्तु हकीकत में सब प्रदर्शन तक ही सीमित रह जाते है, कारण जब सरकारे शराब से प्राप्त राजस्व से अपना खजाना भरने को शराब, गुटखा, तम्बाकू की फेक्ट्रीयां को बैन नहीं करेगी, शराब के ठेके देना जारी रहेंगे फिर तो यह वही होगा कि गंदे नाले का मुहाना तो बंद नहीं किया और फिर सड़क पर चाहे दिन भर स्वच्छ पानी क्यों न उड़ेलते रहे, क्या वह स्वच्छ रह पायेगी। जिन्दगी आबाद नहीं बर्बाद करने को सिगरेट, शराब, गुटका से जब बाजार सजे और जब सरकारे इनके उत्पादन की फेक्ट्रीया बंद करने के लिये ठोस कदम नहीं उठा रही हो तब तक कैसे सिगरेट अथवा शराब पीना कोई छोड़ सकेगा। यह अवश्य है कि सिनेमा में फिल्मायें गये दृष्यों का जीवन पर सीधा असर पड़ता हैं सेंसर बोर्ड द्वारा इन पर प्रतिबंध लगाने के समाचार एक अच्छा कदम है परन्तु इसमें कानून आड़े नहीं आना चाहिये, क्योंकि महाराष्ट्र सरकार द्वारा भारतीय संस्कृति में पूज्यनीय नारी को बार-बाला जैसी घृणित जिंदगी से निकालकर इज्जत की जिंदगी के सुनहरी जिंदगी मंे जिने के लिये जब प्रतिबंध लगाया तो इसे न्यायालय द्वारा मंजूर नहीं किया गया था।

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I am Brajesh Arya

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