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 चाल – चरित्र और चेहरा – बदला भाजपा का – – – – ?

( डॉ. घनश्याम बटवाल , मंदसौर )

गर्मी बहुत है, भाजपा में पार्टी के पुरखे जिन्होंने जनसंघ से भाजपा बनाई आज कहाँ है ? आज एक विचारणीय बिंदु है। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, के एन गोविन्दाचार्य, सुमित्रा महाजन, करियामुंडा, कलराज मिश्र, संजय जोशी, उमा भारती, यशवंत सिन्हा, जनसंघ के बाद भाजपा से जुडी सुषमा स्वराज, मध्यप्रदेश में जनसंघ से भाजपा तक की यात्रा के साथी सरताज सिंह (अब कांग्रेस में) राघव जी और बाबूलाल गौर जैसे कई नाम आज नेपथ्य में हैं। या तो ये चुनाव नहीं लड़ रहे हैं या इन्हें किसी न किसी बहाने पर्दे के पीछे धकेल दिया गया है। पार्टी के नये अलमबरदार लोक सभा चुनाव में कई सीटों पर फैसला नहीं कर सकें हैं। जो फैसले लिए भी गये वे भाजपा की समग्र विचार की नीति से बहुत दूर है। पानी पिलाना एक मुहावरा है, पुरखों को पानी पिलाने के अलग अर्थ हैं, आज भाजपा में तो जिन्दा पुरखों को पानी पिला कर नहीं दिखा कर अपने कर्तव्य को पूरा किया जा रहा है।

भाजपा के पुरखे भाजपा के सैद्धांतिक क्षरण को देख रहे हैं। सब सह रहे हैं, इतने मजबूर हैं कि इसके  बावजूद कुछ कह नहीं रहे हैं। आज संजय जोशी का जन्मदिन  भी है। के एन गोविन्दाचार्य की तरह तो नहीं उससे कुछ भिन्न तरीके से इन्हें भी नेपथ्य तो क्या पूरे दृष्टिपटल से बाहर किया गया। गोविन्दाचार्य की बात अलग है उन्होंने जो सीखा था, उसे समाज में कई लोगों को बाँट दिया और बाँट रहे हैं। अपनी पीड़ा को छोडकर। डॉ मुरली मनोहर जोशी और सुमित्रा महाजन ने पीड़ा को पत्र बनाया। ये पत्र चर्चा में हैं। बिहारी बाबु शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई लोग आये गये, भाजपा अपने प्रवाह में बहती रही, अब रुकी सी  मालूम हो रही है। पुरखे अपने लोक से आशीर्वाद देते हैं। भाजपा में जिन्दा पुरखो का एक लोक तैयार हो गया है, जिन्हें नई पीढ़ी अपनी तरह से पानी दे रही है।

सन्गठन में पदों के नाम वही है काम बदल गया है। पहले हर राय का कोई अर्थ होता था और सारी राय का एक ही अर्थ है “बॉस इज आलवेज राईट”। एक अजीब सी गंध भर गई है, भाजपा के निर्णयों में। अब भाजपा में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री और प्रदेश सन्गठन  मंत्री की हैसियत “यस मैन” की हो गई है। अब न तो कोई गोविदाचार्य की तरह विरार बैठक पर चलने और निर्णयों को तरजीह देने की बात कर  सकता है और न संजय जोशी की तरह तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी  से जिन्ना की मजार पर जाने के बदले इस्तीफा की मांग कर सकता है। गुजरात माडल के शिल्पकार भी ऐसी मिटटी के बने थे, जिन्हें आज नेपथ्य में शामिल बड़े नामों ने  यहाँ- वहां बिखेर दिया। कर्म फल का भुगतान  यही होता है, ऐसी अवधारणा हिन्दू समाज में है, भाजपा हिन्दूवादी  पार्टी है कर्मफल भुगतना होता है और भुगतान आगे भी करना होगा।

आज हाल यह  है कि भाजपा के नीव के पत्थर कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी ,मुरलीमनोहर जोशी राजनाथ सिंह सुषमा स्वराज नितिन गडकरी रामलाल  वंसुधरा राजे रमन सिंह शिवराज सिंह चौहान सभी को उस शीर्ष की ओर देखना अनिवार्य है जहाँ मोदी और शाह कायम हैं। हाँ में हाँ मिलाना मजबूरी है। यही  हाल मोहन जी भागवत भेया जी जोशी और सुरेश जी सोनी और दत्ता जी का है। शीर्ष इनकी भी नहीं सुन रहा है।  फिर भी स्थापना दिवस की   बधाई और  भविष्य के लिए शुभकामना भी।

दिवस स्थापना का और दावा रहा कि भाजपा ” पार्टी इन डिफरेंस ” है ? पर यह सब कुछ हवा लगता है । आज तो ” पार्टी इन डिफरेंट ”

प्रतीत होती है ?

एनडीए गठबंधन की बात दरकिनार कर भी दें तब भी भाजपा में केंद्रीय करण बढ़ा है ।

पार्टी के ही बड़े नेताओं के मुताबिक सामुहिक नेतृत्व की बात हवा हुई अब व्यक्ति केंद्रित नेतृत्व आकार ले चुका है , और वह व्यवहार में  ” क्रूर ” नजर आरहा है ।

जिले क्या , संभाग क्या , प्रदेश क्या , केंद्र क्या हर स्तर पर केंद्रित नेतृत्व का ही बोलबाला है । सत्ता पर सवार नेतृत्व के विकल्प की कमी का दंश वर्तमान में तो है पर यह कब तक रहेगा , सम्भवतः लोकसभा चुनाव और साथ होरहे विधानसभा चुनावों के परिणामों पर निर्भर करेगा।

भाजपा नेतृत्व यह मानकर चल रहा है , सत्तारूढ़ हम हैं और क़ायम भी रहेंगे ? विपक्षी दलों की दाल पतली है , क्षेत्रवार गठबंधन किये गए पर वे नाकाफ़ी लगते हैं।

विगत3 माह में बदले सुर देश भर में ऐकजैसे हो गये इससे भाजपा को जैसे प्राणवायु मिल गई । राष्ट्रीय सुरक्षा पहले पायदान पर होगई , बेरोजगारी , किसान , गरीबी अभी पीछे धकेल दी गई है । नारों – भाषणों – रैलियों में समूचे स्वर राष्ट्रवाद पर केंद्रित होगये है।

बिखरा विपक्ष आरोप – प्रत्यारोप में ही जुटा है , भाजपा चाहती भी यही है।कई स्वनामधन्य पार्टी नेता असहाय नजर आये।

नाम संगठन का लेकर कई निर्णय पार्टी नेतृत्व द्वारा ,  मोदी – शाह की जोड़ी द्वारा लिए गए हैं , किये जारहे हैं। पार्टी में भी भीतर विरोध के बावजूद “रुको और देखो” की तर्ज़ पर काम हो रहा है । चाल – चरित्र और चेहरा पूरी तरह बदलने का प्रयास होरहा है।

केंद्रीय नेतृत्व का मानना है कि जो किया जा रहा है , वह ठीक है । अब इनके निर्णयों की तो 23 मई तक प्रतीक्षा करना होगी।

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