Breaking News

जानिए कैसे वास्तु अनुसार सीढ़ियों की संख्या भी डालती है घर के वास्तु पर असर

Story Highlights

  • सीढ़ियां कहां तथा किस दिशा में होनी चाहिए? 
  • इसके गलत स्थान व दिशा में होने से घर में लोगों को क्या समस्याएं हो सकती हैं? 
  • इसको ठीक करने में प्रभावी उपाय क्या हो सकते हैं?
Hello MDS Android App
प्रिय पाठकों/मित्रों, वास्तुशास्त्र में बताया गया है की हमारे घर की बनावट हमारी सुख और स्मृद्धि पर बहुत असर डालती है.वास्तु में बताया गया है की घर में बनी सीढ़ियां और इनकी दिशा, भी घर की पाजिटिविटी और नेगेटिविटी का कारन बन सकती है. पर अगर आप अपने घर की सीढ़ियों का निर्माण वास्तु के अनुसार करवाते है तो आपके घर में सुख-स्मृद्धि और खुशियां बनी रहती है |वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वास्तु में सीढ़ियां महत्वाकांक्षा, उपलब्धि, प्रगति एवं सफलता का प्रतीक हं। रावण, स्वर्ग तक सीढ़ियां बनाना चाहता था, यह रामायण में उल्लेखित है। उपरोक्त प्रतीक होने के कारण इन्हें सदैव सुंदर एवं स्वच्छ रखें। यदि सीढ़ियों में कोई टूट-फूट हो रही है तो वह प्रगति के मार्ग को अवरूद्ध करती है, अतः इसकी मरम्मत कर इन्हें ठीक करवायें ताकि प्रगति होती रहे
सीढ़ियां  जीवन में ऊपर उठने की ओर इशारा करती हैं, फिर चाहे यह भौतिक विषय में हो या आध्यात्मिक विषय में। इसलिए सीढ़ियों के निर्माण में विशेष सावधानी बरतें | घर में सीढ़ियों के लिए सर्वोत्तम दिशा दक्षिण, पश्चिम या दक्षिण-पश्चिम है। अगर सीढ़ियां सही स्थान पर बनी हों तो जीवन के बहुत से उतार-चढ़ाव व कठिनाइयों से बचा जा सकता है। सीढ़ियां कई प्रकार की होती हैं- लकड़ी की, लोहे की, पत्थर की।
वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार उत्तर पूर्व यानी ईशान कोण में सीढ़ियों का निर्माण नहीं करना चाहिए। इससे आर्थिक नुकसान, स्वास्थ्य की हानि, नौकरी एवं व्यवसाय में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस दिशा में सीढ़ी का होना अवनति का प्रतीक माना गया है। दक्षिण पूर्व में सीढ़ियों का होना भी वास्तु के अनुसार नुकसानदेय होता है। इससे बच्चों के स्वास्थ्य उतार-चढ़ाव बना रहता है।वास्तु विज्ञान के अनुसार घर की सीढ़ियों से तरक्की की ऊंचाई पर भी पहुंचा जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि घर की सीढ़ी वास्तु के नियमों के अनुसार बनी हो। सीढ़ी में वास्तु दोष होने पर तरक्की की बजाय नुकसान उठाना पड़ सकता है।
जो लोग खुद ग्राउंड फ्लोर पर रहते हैं और किरायेदारों को ऊपरी मंजिल पर रखते हैं उन्हें मुख्य द्वार के सामने सीढ़ियों का निर्माण नहीं करना चाहिए। वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वास्तु विज्ञान के अनुसार इससे किरायेदार दिनोदिन उन्नति करते और मालिक मालिक की परेशानी बढ़ती रहती है।
भवन चाहे आवासीय हो या व्यावसायिक भवन में भवन की छत पर पहुँचने के लिए या भवन में भूमिगत कक्षों का निर्माण हो तो आने-जाने के लिए सीढ़ियाँ बनाना आवश्यक है। सीढ़ियों को अगर सही दिशा में न बनाया गया हो, तो यह एक गंभीर वास्तुदोष माना जाता है। इस दोष के कारण मनुष्य को अनावश्यक आर्थिक व निजी जीवन में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इसका उचित उपाय तो सीढ़ियों का सही दिशा में स्थित होना ही है, किंतु यदि सीढ़ियां गलत दिशा में बनी हों और उन्हें अन्यत्र स्थानांतरित करना संभव न हो तो बिना तोड़-फोड़ के भी इस वास्तु दोष का निवारण किया जा सकता है।  वास्तु शास्त्र में सीढ़ियाँ बनाने के लिए भी सिद्धांत बनाए गये हैं।
वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वास्तु अनुसार सीढ़ियाँ सदैव भवन के दक्षिण व पश्चिम के दायीं ओर हो तो उत्तम है। उत्तरी-ईशान, पूर्वी-ईशान और ईशान कोण में सीढ़ी भूलकर भी नहीं बनायें। इससे विपरीत प्रभाव रोग, आर्थिक संकट, स्त्रियों का वर्चस्व कारोबारी नुकसान एवं बच्चों में मानसिक रोग तथा गृहस्वामी के लिए दुर्घटना व मृत्यु का कारण भी ईशान की सीढ़ियाँ बनती हैं। सीढिया कभी भी ईशान (उ. पू.) अथवा पूर्व या उत्तर दिशा में नहीं बनवानी चाहिए नहीं तो गृहस्वामी (मुखिया) के लिये हानिकारक होती है। इसके अलावा यह अड़चनें, धननाश, व्यापार में हानि, नौकरी में परेशानी एवं कलह का कारण बनती है। संतान पक्ष भी प्रभावित होता है। धन संपत्ति में बाधा व परिवार में अशांति बनी रहती है। पुत्र संतान प्राप्ति की संभावना कम हो जाती है। बच्चों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। पेशेगत परेशानी, धनहानि तथा कर्ज वृद्धि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। उत्तर एवं पूर्वी दीवार का स्पर्श करती हुई सीढ़ियाँ न बनावें, यदि बनाना आवश्यक ही है तो दीवार से कम से कम तीन इंच दूर हो। वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की आग्नेय कोण के दक्षिण में सीढ़ी हो सकती है, परन्तु पूर्वी दीवार का स्पर्श न हो। वायव्य कोण में भी सीढ़ी बनायी जा सकती है, किन्तु उत्तरी दीवार का स्पर्श न हो। दक्षिण-नैर्ऋत्य व उत्तर पश्चिम का पश्चिम सीढ़ियों के
लिए श्रेष्ठ स्थान है। सीढ़ियाँ घुमावदार बनायें। जिन का घुमाव चढ़ते में बांयी से दांयी ओर होनी चाहिए।
वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि अगर आपके घर में सीढ़ियों का दरवाजा पूर्व और दक्षिण दिशा की ओर बना हुआ है तो इससे घर में साकारात्मक उर्जा का प्रवेश होता है. इसके अलावा सीढ़ियों का घर की दक्षिण या फिर पश्चिम दिशा की दाईं ओर होना भी अच्छा होता है.
  • सीढि़यां कभी ईशान में न बनाएं।
  • प्रारंभ में कभी त्रिकोण सीढि़यां (Steps) न बनावें।
  • सीढ़ी के नीचे पूजा गृह कभी न बनाएं।
  • सीढ़ी के नीचे शौचालय नहीं बनाना चाहिए, वर्ना कब्जी, मस्सी एवं बदहजमी की शिकायतें होंगी।
  • आपत्ति काल सीढ़ी के नीचे में स्नान गृह (Bath-room) बना सकते है।
  • सीढ़ियों की ऊंचाई व चौड़ाई इस आकार में हो कि बच्चा व बूढ़ा आसानी से बिना थके चढ़ सके।
  • सीढ़ी के नीचे गोदाम बना सकते है।
  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की आजकल बहुत लोग अपने घरो में  घुमावदार सीढ़ियां बनवाना पसंद करते हैं. पर अगर आप इस तरह की सीढ़ियों का निर्माण अपने घर में करवा रहे है तो इस बात का ध्यान रखे की सीढिया हमेशा दाई तरफ मुड़नी चाहिए।
  • सीढि़यां हमेशा घर के नैर्ऋत्य कोण में बनाएं, जो दक्षिण से पश्चिम की ओर जाएं। सीढ़ी मकान के पश्चिम या उत्तर भाग में भी हो सकती है।
  • ऊपर की ओर जाने वाली सीढि़यों की संख्या सदैव एकी (odd) नंबर में होनी चाहिए, यथा 5-7-9-11 इत्यादि।
  • घर में घुसते ही सीढि़यां नहीं दिखनी चाहिए।
  • सीढ़ी का पहला पायदान कभी गोलाई में नहीं हो।
  • मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर सीढ़ी नहीं होनी चाहिए।
  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की घर के बीचों-बीच एवं दरवाजे के सामने सीढ़ी नहीं होनी चाहिए।
  • सीढ़ी कभी भी टेड़ी – मेड़ी नहीं बनानी चाहिए।
  • सीढि़यां सदैव दायीं तरफ (Anti-clock-wise) होनी चाहिए।
  • जहां तक हो सके, सीढि़यां चिकनी नहीं होनी चाहिए।
  • सीढ़ी में कभी भी लाल रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी के मध्य 9‘‘ इंच का अंतर आदर्श अंतर है। इससे अधिक अंतर ठीक नहीं।
  • जहां तक हो सके, सीढि़यों के दोनों ओर हत्था लगाएं।
  • सीढि़यों के नीचे (Sloping) शयन कक्ष या बैठक नहीं होने चाहिए।
  • सीढि़यां कभी ईशान में न बनाएं।
  • प्रारंभ में कभी त्रिकोण सीढि़यां (Steps) न बनावें।
  • सीढ़ी के नीचे पूजा गृह कभी न बनाएं।
  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की सीढ़ियों के नीचे कोई महत्वपूर्ण कार्य नही करना चाहिए। जैसे रसोई, शौचालय, स्नानघर नहीं बनाना चाहिए। यदि आवश्यकतावश बनाना ही है तो इसकी छत सीढ़ियों के आधार से भिन्न होनी चाहिए, यानि छत और सीढ़ी के मध्य खाली स्थान रहें।सीढ़ी के नीचे भूलकर भी शौचालय नहीं बनायें | शौचालय बनवाने से स्वास्थ्य खराब होता है। बवासीर भी हो सकता है। पूजाघर या तिजोरी बनवाने से भारी विपत्तियों आदि का सामना करना पड़ता है। सीढ़ियों के नीचे दुकानें आदि भी नहीं बनानी चाहिये अन्यथा चल नहीं पाती।
  • क्या आप जानते है की सीढ़ियों की संख्या भी सकारात्मक उर्जा पर बहुत असर डालती हैं. अपने घर में सीढिया बनवाते समय इस बात का ध्यान हमेशा रखे की सीढ़ियों की संख्या  5, 11, 17, 23, 29, 32 या फिर 36 के हिसाब से होनी चाहिए।
  • सीढ़ियों को कभी खुला नहीं छोड़ना चाहिए,इसके दरवाजे को हमेशा बंद करके रखे.इसके अलावा सीढ़ियों की सफाई का भी पूरी तरह से ध्यान रखना चाहिए.अपने घर की सीढ़ियों के नीचे कभी जूता-चप्पल,फालतू सामान या फिर कूड़ा-करकट नहीं रखना चाहिए.सीढ़ियों के नीचे रखा कूड़ा करकट या जूते चप्पल घर के मुखिया के लिए अशुभ मानी जाती हैं।
  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि किसी पुराने घर में सीढ़ियाँ उत्तर-पूर्वी भाग में बनी हो तो उसके वास्तुदोष को दूर करने के लिए सीढ़ी के द्वार पर आदमकद काँच लगाना चाहिए  या छत पर नैर्ऋत्य में एक कमरा बनाना चाहिए।
  • भूलकर भी सीढ़ियां उत्तर-पूर्व में न बनवाएं। यह धननाश व व्यापार में हानि तथा कर्जो का कारण बन सकती हैं। इससे संतान पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की ब्रह्मस्थान (मध्य या केंद्र स्थान) इसे सदैव खुला रखना चाहिये क्योंकि यह ब्रह्माजी का स्थान है। इस पर सीढ़ियां नहीं बनवानी चाहिये, नहीं तो मानसिक तनाव आदि कई प्रकार के कष्ट मिलते हैं।
  • यदि ऐसा कोई दोष घर में हो तो ऐसी स्थिति में सीढ़ियों के  नीचे मिट्टी के बर्तन में बरसात का जल भरकर उसे मिट्टी के ढक्कन से ढंक दें। इसे सीढ़ी के नीचे मिट्टी में दबा दें।
  • घुमावदार सीढ़ियों में बाजार की बनी बनाई स्टील या एल्यूमीनियम धातु की सीढ़ियों का उपयोग मुख्यतः आग्नेय या वायव्य कोण में नहीं करना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही धातुएं इन दोनों कोणों में वास्तुदोष उत्पन्न करती है। इन कोणों में ईंट व सीमेंट की सीढ़ियां ही वास्तु अनुसार अनुकूल एवं शुभ रहता है।
  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की उत्तरमुखी द्वार वाले दुकान या भवन की सीढ़ियां ईशान में बना सकते हैं। वायव्य से ईशान तक पूरे में सीढ़ियां बना सकते हैं। यदि संभव हो तो वायव्य से बीच तक चबूतरे बनवाकर ईशान में सीढ़ियां बनानी चाहिए।
  • दक्षिणी मुख वाले दुकान या भवन की सीढ़ियां दक्षिण, आग्नेय में बनानी चाहिये अथवा दक्षिण-आग्नेय से दक्षिणी र्नैत्य तक पूरे में सीढ़ियां बना सकते हैं। यदि संभव हो तो बीच में अर्धचंद्राकार सीढ़ियां भी बना सकते हैं।
  • उत्तरमुखी और दक्षिणमुखी भवनों में सीढ़ियां घर के बाहर पूर्वी या पश्चिमी दीवार को छूते हुए बनायें।
  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की ईशान कोण में उत्तरी और पूर्वी दिशा में, आग्नेय कोण में दक्षिण दिशा में तथा वायव्य कोण में पश्चिमी दिशा में सीढ़ियां घर के बाहर बनाना शुभ रहता है। यहीं से प्राणिक ऊर्जा का प्रवेश होता है तथा साथ ही लक्ष्मी जी (धन) का भी आगमन होता है।

अपने घर में सीढ़ियों  का निर्माण कराते समय निम्नलिखित बिन्दुओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिए-

(१) यदि घर में पूर्व से पश्चिम की तरफ चढ़ने वाली सीढ़ियाँ हों तो भवन मालिक को लोकप्रियता और यश की प्राप्ति होती है।
(२) यदि घर में उत्तर से दक्षिण की तरफ चढ़ने वाली सीढ़ियाँ हों तो घर के मालिक को धन की प्राप्ति होती है।
(३) घर की दक्षिण दीवार के सहारे सीढ़ियाँ धनदायक होती हैं।
(४) घर की सीढ़ियाँ प्रकाशमान और चौड़ी होनी चाहिए। सीढ़ियों की विषम संख्या शुभ मानी जाती है।
(५) घर की घुमावदार सीढ़ियाँ श्रेष्ठ मानी जाती हैं। सीढ़ियों का घुमाव घड़ी की परिक्रमा-गति के अनुसार होना चाहिए।
(६) यदि घर की सीढ़ियाँ सीधी हों तो दाहिनी ओर ऊपर जाना चाहिए।
(७) घर के मध्य भाग में भूलकर भी सीढ़ी न बनाएँ अन्यथा हानि हो सकती है।
(८) घर के पूर्व दिशा में सीढ़ियाँ हों, तो हृदय रोग होने की सम्भावना रहती है।
(९) यदि घर की सीढ़ियाँ चक्राकार सर्पिल हों, तो हमारी एक विशेष ऊर्जा ऊपर की ओर प्रवाहित नहीं हो पाती, जिससे भवन मालिक को अनेकों परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
(१०) घर के ईशान कोण में बनी सीढ़ी पुत्र संतान के विकास में बाधक होती है।
(११) घर के मुख्य दरवाजे के सामने बनी सीढ़ी आर्थिक अवसरों को समाप्त कर देती है।
(१२)घर की सीढ़ियों के नीचे पूजाघर का निर्माण नहीं करना चाहिए।
(१३) घर को बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि मुख्य दरवाजे पर खड़े व्यक्ति को घर की सीढ़ियाँ दिखाई नहीं देना चाहिए।

“वास्तु शास्त्र के अनुसार सीढ़ी के टप्पे विषम क्यों  रखना चाहिए ??”

  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के हर फ्लोर में दरवाजे, खिड़की, वेंटिलेटर और कालम की संख्या सम रखने का विधान है जबकि सीढ़ी के टप्पों की संख्या विषम रखी जाती है।
  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की सम संख्या को पूर्ण संख्या कहा जाता है इससे पूर्णता आती है इसीलिए दरवाजे ,खिड़की ,वेंटिलेटर और कालम की संख्या सम रखने का विधान है।
  • लेकिन सीढ़ी के टप्पों को विषम रखने का विधान है ,इस पर ही सबको संदेह होता है।
  • जब भी हम लोग अपना पहला कदम बढ़ाते हैं तब हमारा दाहिना पैर ही आगे बढ़ता है।
  • दाहिने पैर को शुभ माना गया है यह शुभता का प्रतिक है।
  • दाहिना पैर मजबूती देता है, दाहिना पैर स्थायित्व का भी प्रतिक है।
  • जब भी शादी के फेरे पड़ते है तब वधु दाहिना पैर को ही आगे बढ़ाती है।
  • फेरे के दौरान और सारे वैवाहिक कार्यक्रम में वधु दाहिने पैर से सम्पन्न करती है।
  • फेरे के बाद लडकी जब अपने ससुराल आती है तो घर के अंदर प्रवेश करते समय दाहिना पैर को आगे करती है।
  • सीढ़ी में हम जैसे ही पैर रखते हैं हमारा दाहिना पैर ही आगे बढ़ता है।
  • अगर सीढ़ी के टप्पे विषम हुए को प्रथम तल में पहुँचने पर हमारा दाहिना पैर ही पहुंचेगा जो की शुभता का प्रतिक है।
  • अगर सीढ़ी के टप्पे सम हुए तो प्रथम तल में पहुँचने पर हमारा बाया पैर ही पहुंचेगा।
  • इसीलिए ऋषी मुनियों ने जब वास्तु शास्त्र की नियमावली बनाई तब खिड़की ,दरवाजे ,वेंटिलेटर,कालम को तो सम संख्या में रखने को कहा लेकिन सीढ़ी के टप्पों को विषम संख्या में रखने को कहा हैं।
  • वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की मुझे नही लगता कि सीढ़ियों की संख्या सम और विषम के पीछे कोई अन्धविश्वास है।

Post source : वास्तुविद पंडित दयानन्द शास्त्री

About The Author

I am Brajesh Arya

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *