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जाने बाहुबली फिल्म का रतलाम से सीधा कनेक्शन क्या हैं?

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  • फिल्म 'बाहुबली: द बिगनिंग' को हिंदी में लाने का श्रेय रतलाम को जाता है।
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रतलाम। राजमौली की फिल्म ‘बाहुबली: द बिगनिंग’ को हिंदी में विशेष रूप से पसंद किया गया था। यह बात कम लोग जानते हैं कि बाहुबली फिल्म का मध्यप्रदेश के मालवा से सीधा कनेक्शन हैं। रतलाम में पली-बढ़ी अल्पना उपाध्याय ही इस फिल्म को करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शन के बैनर तले हिंदी में लेकर आई थी। वे बाहुबली-1 में डबिंग क्रिएटर रही हैं।

गौरतलब है कि इस फिल्म को हिंदी भाषा में लाने का श्रेय मध्यप्रदेश के रतलाम की अल्पना उपाध्याय को जाता है। वे इस फिल्म में बतौर डबिंग कॉआर्डिनेटर काम कर रही हैं। अल्पना उपाध्याय रतलाम में पली-पढ़ी है। उनकी स्कूली शिक्षा रतलाम के गुजराती समाज विद्यालय से हुई है। स्कूल के बाद उन्होंने शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय से बीएससी में ग्रेजुएशन किया। 1982 में मुंबई में एमबीए करने गई और वहीं थियेटर से जुड़ गईं। इसके बाद बालीवुड में यह सिलसिला चल पड़ा। बाहुबली में बतौर डबिंग कॉआर्डिनेटर काम कर रही थीं। हम सभी मालवा वासियों के लिए गर्व की बात है कि हिंदी भाषा में यह अब तक की सबसे अधिक इंतजार की जाने वाली फिल्म बन गई है। और उसकी डबिंग रतलाम की अल्‍पना उपाध्‍याय ने की है।
अल्पना ने बताया कि यह सभी को पता है कि बाहुबली: द बिगनिंग एक बहुत बड़ी हिट फिल्म थी। इस फिल्म को कई परिवारों ने साथ बैठकर देखा था। इसके फैंस इस सीरिज की अगले पार्ट का लंबे समय से बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

ऐसे आई थी हिंदी में लाने की योजना
इस फिल्म को हिंदी में लाने की योजना कैसे बनी यह कहानी भी दिलचस्प है। इस फिल्म के प्रोड्यूसर शोभु यरलगड्डा, करण जौहर व अल्पना एक पार्टी में थे। यहां केक खाते हुए बात की लंबे समय से कोई बेहतरी ऐसी फिल्म नहीं आई जो परिवार के साथ बैठकर देखी जा सके व जिसको देखने के लिए परिवार में बच्चें भी जीद करे। इसके बाद ही अल्पना ने सुझाव दिया कि baahubali का हिंदी वर्जन जारी होना चाहिए। इसके बाद कई भाषाओं में यह फिल्म डब होने के बाद हिन्दी भाषी प्रदेशों में भी धूम मचा चुकी है।

चार माह लगे थे सही हिंदी की तलाश में
अल्पना ने अपने अनुभव के साथ बताया की देश को भले हिंदी भाषी कहा जाता हो, लेकिन इस फिल्म में तेलुगु से हिंदी में सही उच्चारण के लिए डब करने वाले कलाकारों की तलाश में चार माह लग गए थे। इसके बाद भी जब डबिंग शुरू हुई तो कई बार ऐसे अवसर आए की किसी कलाकार की आवाज मुल फिल्म के कलाकार से मैच नहीं हो रही थी। ऐसे में ताबड़तोड़ नए डबिंग आर्टिस्ट की तलाश शुरू की जाती थी।

रोना आ जाता था
अल्पना के अनुसार लगातार काम 8 से 10 घंटे की डबिंग के बाद भी जब कोई कलाकार की आवाज को लेकर परेशानी आती थी तो रोना आ जाता था। ऐसे में तेलगु संस्करण के निदेशक व प्रोड्यूसर हौसला बढ़ाते थे। फिल्म का दूसरा पार्ट आने के बारे में अधिकृत घोषणा करण जौहर ने कर दी है।

यह है रतलाम की अल्पना उपाध्याय
अल्पना उपाध्याय रतलाम में पली-पढ़ी है। उनकी स्कूली शिक्षा रतलाम के गुजराती समाज विद्यालय से हुई है। स्कूल के बाद उन्होंने शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय से बीएससी में ग्रेजुएशन किया। 1982 में मुंबई में एमबीए करने गई और वहीं थियेटर से जुड़ गईं। इसके बाद बालीवुड में यह सिलसिला चल पड़ा।

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1 Comment

  1. Shyam

    तीन घंटे की फिल्म में यदि 30 बार रोंगटे खड़े हो जाएं, तो लगता है कि निर्देशक ने फिल्म नहीं, इतिहास बनाया है। फिल्म देखते समय आदमी सोचने लगता है कि निर्देशक ने भारतीय इतिहास का कितना गहन अध्ययन किया है। अगर भव्यता की बात करें तो बाहुबली भारतीय सिनेमा की अबतक की सबसे भव्य फिल्म ‘मुगलेआजम’ को बहुत पीछे छोड़ देती है। तीन घंटे की फिल्म देखते समय आप तीन सेकेण्ड के लिए भी परदे से आँख नही हटा सकते। पिछले दो साल के सबसे चर्चित सवाल “कंटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा” का उत्तर ले कर आयी फिल्म प्रारम्भ में ही दर्शक को ऐसा बांध देती है कि वह पल भर के लिए भी परदे से नजर नही हटा पाता। नायक के रणकौशल को देख कर आपके मुह से अनायास ही निकल पड़ता है- वाह! यही था हमारा इतिहास। ऐसे ही रहे होंगे महाराणा प्रताप और उनके भील, आदिवासी साथी, पिर्थवि राज चौहान, स्कन्दगुप्त, ऐसे ही रहे होंगे विक्रमादित्य और शिवा, ऐसा ही रहा होगा बाजीराव। एक साथ धनुष से चार चार बाण चलाते बाहुबली और देवसेना का शौर्य आपको झूमने पर विवश कर देता है। इस फ़िल्म में हमारा इतिहास दिखता है जिसके नाम पर आज तक भांड बॉलीबुड ने अनाप शनाप दिखाया है इस फिल्म में साक्षात् दीखते हैं। युद्ध के समय हवा में उड़ते सैनिकों का कौशल अकल्पनीय भले लगे, पर अतार्किक नही लगते बल्कि उसे देख कर आपको पुराणों में बर्णित अद्भुत युद्धकला पर विश्वास हो जाता है। युगों बाद भारतीय सिनेमा के परदे पर कोई संस्कृत बोलता योद्धा दिखा है। युगों बाद परदे पर अपने रक्त से रुद्राभिषेक करता योद्धा दिखा है। युगों बाद भारतीय सिनेमा में भारत दिखा है। आपने विश्व सिनेमा में स्त्री सौंदर्य के अनेकों प्रतिमान देखे होंगे, पर आप देवसेना के रूप में अनुष्का को देखिये, मैं दावे के साथ कहता हूँ आप कह उठेंगे- ऐसा कभी नही देखा। स्त्री को सदैव भोग्या के रूप में दिखाने वाले भारतीय फिल्मोद्योग के इतिहास की यह पहली फिल्म है जिसमे स्त्री अपनी पूरी गरिमा के साथ खड़ी दिखती है। यह पहली फिल्म है जिसमे प्रेम के दृश्योँ में भी स्त्री पुरुष का खिलौना नही दिखती। यहां महेश भट्ट जैसे देह व्यपारियों द्वारा परोसा जाने वाला प्रेम नहीं, बल्कि असित कुमार मिश्र की कहानियों वाला प्रेम दीखता है। यह पहली फिल्म है जिसने एक स्त्री की गरिमा के साथ न्याय किया है। यह पहली फिल्म है जिसने एक राजकुमारी की गरिमा के साथ न्याय किया है। देवसेना को उसके गौरव और मर्यादा की रक्षा के वचन के साथ महिष्मति ले आता बाहुबली जब पानी में उतर कर अपने कंधों और बाहुओं से रास्ता बनाता है और उसके कंधों पर चल कर देवसेना नाव पर चढ़ती है, तो बाहुबली एक पूर्ण पुरुष लगता है और दर्शक को अपने पुरुष होने पर गर्व होता है। देवसेना जब पुरे गर्व के साथ महिष्मति की सत्ता से टकराती है तो उसके गर्व को देख कर गर्व होता है। प्रभास के रूप में फिल्मोद्योग को एक ऐसा नायक मिला है जो सचमुच महानायक लगता है, और राजमौली तो भारत के सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मकार साबित हो ही चुके। और अनुष्का, उसे यह एक फिल्म ही अबतक की सभी अभिनेत्रियों की रानी बना चुकी है। बाहुबली में यदि कुछ कमजोर है, तो वह है संगीत। पर इसमें राजमौली का कोई दोष नहीं, फ़िल्मी दुनिया में आज कोई ऐसा संगीतकार बचा ही नहीं जो इस फिल्म लायक संगीत बना पाता। मैं सोच रहा हूँ कि काश! नौशाद या रवि जी रहे होते। पर सबके बावजूद मैं इस फिल्म को दस में ग्यारह नम्बर दूंगा। बाहुबली सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि प्राचीन भारत की गौरव गाथा है। आपको समय निकाल कर बड़े परदे पर यह फिल्म जरूर देखनी ही चाहिए।

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